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सुधार की कवायद फेल, 23 फीसदी बदमाशों के लिए जेल ऐशगाह

-जिलेभर में 26 महिला/युवती बदमाश जिन पर तीन से पांच आपराधिक मामले दर्ज-55 फीसदी ने बनाया नशे की तस्करी को पेशा -जिले की जेलों में बंद 173 बंदियों पर तीन से आठ आपराधिक मामले
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कवायद फेल

अपराधियों को मुख्य धारा में लाने की सभी कवायद फेल हो रही है। जेल में चलने वाले सुधार कार्यक्रम असर नहीं दिखा रहे, वहीं सामाजिक रूप से बदनामी का डर भी अब खत्म सा हो गया है।

नागौर. अपराधियों को मुख्य धारा में लाने की सभी कवायद फेल हो रही है। जेल में चलने वाले सुधार कार्यक्रम असर नहीं दिखा रहे, वहीं सामाजिक रूप से बदनामी का डर भी अब खत्म सा हो गया है। एक अनुमान के मुताबिक करीब 23 फीसदी युवा अपराध के दलदल से नहीं निकल पाते। नागौर (डीडवाना-कुचामन) में करीब 26 महिला/युवती अपराधी हैं । इन पर तीन से पांच आपराधिक मामले दर्ज हैं। सिर्फ पैसा कमाने के लिए अपराध करना इनका शगल बन गया है।

सूत्रों के अनुसार जिले में वर्तमान में करीब साढ़े चार सौ हिस्ट्रीशीटर हैं, इनमें 32 फीसदी की उम्र तो 25 साल से कम है। नशे की तस्करी नागौर के युवाओं को भाने लगी है। नागौर जिला जेल में करीब 55 फीसदी बंदी नशे की तस्करी में बंद हैं। चोरी/नकबनी/लूट या फिर नशे की तस्करी जैसे अपराध करने वाला युवा मुख्य धारा में जुड़ नहीं रहा है। परिस्थिति वश अपराध करने वालों में ही सुधार देखा जा रहा है। जेल के साथ पुलिस अधिकारियों से हुई बातचीत में सामने आया कि पहली बार थाने या जेल जाने पर ही डर लगता है, उसके बाद जेल तो बहुतों के लिए ऐशगाह बनती जा रही है।

नागौर जिला जेल के अलावा मेड़ता/परबतसर और डीडवाना जेल में बंद करीब 173 बंदी ऐसे हैं जिन पर तीन से आठ तक आपराधिक मामले दर्ज हैं। 69 बंदी पर दो मामले हैं। जमीन विवाद/बलात्कार अथवा रंजिश पर चलते अपराध करने वालों में से गिने-चुने ही हैं । इन पर थानों में दर्ज मामलों की लम्बी फेहरिस्त है। गैंगस्टर आनंदपाल, सुपारी किलर संदीप उर्फ शेट्टी, राजू नेतड़ जैसे कुछ क्रिमिनल रेकॉर्ड वाले बदमाशों को छोड़ दें तो अधिकांश युवा बेशुमार धन कमाने की लालसा में या तो चोरी/नकबजनी/लूट कर रहे हैं या फिर मादक पदार्थ/शराब की तस्करी।

इसलिए रंग नहीं ला रहे प्रयास: जेलरनागौर जेलर राज महेंद्र का कहना है कि पहला अपराध करने पर जेल में आने वाले बंदी को अलग से रखने का प्रावधान है, ताकि वो आदतन बदमाशों के सम्पर्क से दूर रहे। बावजूद इसके जेल में कम जगह की वजह से ये सब एक-दूसरे से घुल मिल जाते हैं और फिर अपराध की दुनिया में ही अपने पैर जमा लेते हैं। जेल में सुविधा पूरी मिल रही है, बेहतर नाश्ता-खाने के अलावा टीवी, घरवालों से बातचीत समेत अन्य सुविधाएं मिलने लगी हैं। पहली बार जेल में आने पर जरूर इनको अच्छा नहीं लगता, लेकिन काफी मामले ऐसे हैं जिनमें उनका आना-जाना रूटीन हो जाता है। बंदियों को यहां बल्ब बनाने, मोटर रिपेयरिंग समेत अन्य कार्य भी सिखाए जाते हैं ताकि वो मुख्य धारा में आएं, लेकिन दस-बारह फीसदी को छोड़ दें तो शेष पुराने ढर्रे पर चल निकलते हैं। सामाजिक रूप से बहिष्कृत होने जैसी स्थिति अब पहले जैसी नहीं है।