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Lok Sabha Elections 2024: इंडिया गठबंधन के दलों की नाराजगी ने बढ़ाई राहुल गांधी की मुश्किलें, भाजपा का भी दबाव

वायनाड में चुनाव प्रचार परवान पर है। सभी प्रत्याशियों के समर्थक सक्रिय हैं और जोर-शोर से प्रचार में लगे हैं। वायनाड के जिला मुख्यालय पर भले ही मेडिकल कॉलेज नहीं है, लेकिन ऐसी कोई गली नहीं दिखी जहां राहुल गांधी, एनी राजा (भाकपा) और के सुरेंद्रन (भाजपा) के पोस्टर व होर्डिंग नहीं हों। पढ़िए पी.एस. विजयराघवन की विशेष रिपोर्ट...

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Waynad Lok Sabha seat Candidates

पश्चिम घाटी की खूबसूरत वादियों पर समुद्र तल से 700 से 2100 मीटर की ऊंचाई पर बसा वायनाड पिछले आम चुनाव तक पर्यटन, चाय व कॉफी बागान के लिए मशहूर था। फिर कांग्रेस नेता राहुल गांधी का नाम इस जगह से जुड़ गया। अब उसी सीट को बचाने की जद्दोजहद में कांग्रेस है, जो 'इंडिया' गठबंधन के वामदलों के कोपभाजन का शिकार होती हुई प्रतीत हो रही है। बाहरी तौर पर मैदान में वाम नीत एलडीएफ और कांग्रेस नीत यूडीएफ ही है, लेकिन भाजपा की तुलनात्मक रूप से ठोस मौजूदगी ने इन दोनों ही दलों की उलझन को बढ़ा दिया है।

प्रकृति की गोद में बसा वायनाड कर्नाटक और तमिलनाडु की सीमाओं से जुड़ा है। पहाड़ी और हरियाली भरे मार्ग से गुजरने पर अलग ही अहसास होता है। हालांकि राजमार्ग के नाम पर सिंगल और घुमावदार सड़कें बेहद खतरनाक लगती हैं। मैंने कोझीकोड से वायनाड के जिला मुख्यालय कलपेटा के लिए अलसुबह बस पकड़ी। साथी यात्री अली की बातों में केरल की जमीन की खूशबू और ताजगी थी। उसको केरल और खासकर वायनाड पर गुमान था। अली ने अपनी बातों में चाय, कॉफी और मसालों की सुगंध का अहसास करा दिया।

वे 26 अप्रैल को होने वाले मतदान को लेकर उत्सुक दिखाई दिए। अली, वायनाड के लाखों मतदाताओं में से एक था, जिसको न केवल स्वयं की लोकसभा सीट बल्कि आस-पास की सीटों के प्रत्याशियों के बारे में भी गहन जानकारी थी। होगी भी क्यों नहीं? केरल का मतदाता अपेक्षाकृत शिक्षित और बुद्धिजीवी माना जाता है। उसमें मुझे वही अनुशासन दिखाई दिया जो प्रमुख बस टर्मिनस के बाहर कतारबद्ध ऑटोरिक्शा चालकों का था, जो तभी यात्री को लेकर आगे बढ़ते हैं जब उनकी बारी आती है। मेरा सफर भले ही पेट में बल डालने वाला था, लेकिन यहां का मतदाता सीधे-सीधे अपना मन बन चुका है। मतदाताओं की यह मन स्थिति चुनावों में बहुत मायने रखती है। चुनाव का नाम आते ही उनकी जुबान से सबसे पहले राहुल गांधी का नाम ही निकल रहा है, जबकि अन्य पार्टियां उनको खींचने का प्रयास कर रही हैं।

चुनाव प्रचार परवान पर

वायनाड में चुनाव प्रचार परवान पर है। सभी प्रत्याशियों के समर्थक सक्रिय हैं और जोर-शोर से प्रचार में लगे हैं। वायनाड के जिला मुख्यालय पर भले ही मेडिकल कॉलेज नहीं है, लेकिन ऐसी कोई गली नहीं दिखी जहां राहुल गांधी, एनी राजा (भाकपा) और के सुरेंद्रन (भाजपा) के पोस्टर व होर्डिंग नहीं हों। जिला चुनाव अधिकारी के बंगले के सामने भी इन नेताओं की छवियां मतदाताओं को प्रभावित करती नजर आ रही थीं। इस संबंध में भाजपा के कलपेटा कार्यालय के प्रभारी जयचंद्रन का कहना था कि उन्होंने भी अन्य राज्यों में प्रचार किया है। वहां इस तरह की संस्कृति नहीं दिखाई देती। इसका कारण यह है कि हम आपस में एक-दूसरे के होर्डिंग और कट आउट अथवा अन्य प्रचार सामग्री को लेकर सवाल नहीं उठाते। यही परम्परा वर्षों से चली आ रही है।

इस बार जंग आसान नहीं

वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी का यहां बांहें फैलाकर स्वागत हुआ था, लेकिन इस बार उनके लिए चुनावी जंग आसान नहीं लग रही। माना जा रहा है कि 2019 के लोकसभा चुनाव में वायनाड में 5 लाख वोटों से शानदार तरीके से जीतने वाले कांग्रेस नेता राहुल गांधी को इस बार केरल भाजपा के के. सुरेंद्रन और सीपीआइ की एनी राजा से चुनौती मिल रही है। ये दोनों ही अपनी पार्टियों के स्टार नेता हैं। के. सुरेंद्रन जहां केरल भाजपा के अध्यक्ष हैं तो एनी राजा सीपीआइ महासचिव डी. राजा की पत्नी हैं और सीपीआइ। की दिग्गज महिला नेताओं में उनकी गिनती होती हैं। इसलिए चुनौती कड़ी है।

राहुल गांधी के मार्ग में बड़ी बाधा वामदल

राहुल गांधी के मार्ग में बड़ी बाधा वामदल हैं। वाम दलों में उनके प्रति गहरा रोष है। हालत यह है कि भाकपा कार्यालय पर राज्यसभा सांसद संतोष कुमार पी. राहुल गांधी की हार को निश्चित मान रहे हैं। उनके तेवर कांग्रेस को लेकर काफी उग्र नजर आ रहे थे। बातचीत के दौरान वे बोले, गठबंधन की प्रमुख पार्टी के तौर पर कांग्रेस का काम जोडऩे का होना चाहिए था, लेकिन यहां तोडऩे की कोशिश हुई है। जब मुखिया ही उत्तर भारत से चुनाव नहीं लड़ रहा तो लोगों में क्या संदेश जाएगा? केरल में केवल यूडीएफ बनाम एलडीएफ की ही स्थिति है।

जनता केवल उसी को वोट देगी जो भाजपा का कड़ा विरोध कर पाए और वामदल से बेहतर विकल्प कोई दूसरा नहीं है। राहुल गांधी के खिलाफ किए जा रहे प्रचार में यह भी कहा जा रहा है कि पिछले पांच सालों में वे बमुश्किल नौ बार यहां आए होंगे। सांसद बनने के बाद उन्होंने निर्वाचन क्षेत्र से जुड़ा कोई मसला लोकसभा में नहीं उठाया है। राहुल गांधी का सकारात्मक पहलू यह है कि इस सीट पर अल्पसंख्यकों के वोट अधिक हैं। यही वजह है कि कांग्रेस इसे सबसे सुरक्षित सीट मानती है।