
4 लाख कैदियों के अधिकार के लिए लड़ रहे तीन छात्र, हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार से मांगा जवाब
नोएडा। 25 अक्टूबर 1951 को देश में पहली बार मताधिकार का प्रयोग किया गया था। 68 साल बाद में 16 लोकसभा चुनाव हो गए हैं और इस वर्ष देशभर में 17वीं लोकसभा चुनाव के लिए मतदान हो रहा है। इसी बीच आज भी लाखों ऐसे लोग हैं जो देश के नागरिक तो हैं लेकिन उन्हें मतदान करने का अधिकार नहीं है। ऐसे ही लोगों के लिए ग्रेटर नोएडा स्थित गलगोटिया यूनिवर्सिटी में लॉ की पढ़ाई कर रहे तीन छात्रों ने एक जनहित याचिका दायर की है।
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दरअसल, यहां बात हो रही है जेल में बंद कैदियों की। जिन्हें मतदान करने का अधिकार नहीं है। इन लाखों कैदियों को मतदान का अधिकारी दिलाने के लिए तीन लॉ छात्र प्रवीण चौधरी, प्रेरणा सिंह और अतुल कुमार दूबे ने फरवरी में दिल्ली हाईकोर्ट में एक याचिका दायर की। जिस पर दिल्ली हाईकोर्ट ने संज्ञान लेते हुए केंद्र सरकार (गृह एवं कानून मंत्रालय), निर्वाचन आयोग और तिहाड़ जेल के डायरेक्टर जनरल से तीन हफ्ते के भीतर जवाब देने को कहा है। इस मामले की अगली सुनवाई 9 मई को होगी।
छात्रों ने संविधान के अनुच्छेद 62 (5) को दी चुनौती
दायर की गई याचिका में तीनों छात्रों ने संविधान के अनुच्छेद 62 (5) को चुनौती दी है। इस अनुच्छेद के अनुसार जेलों में बंद कैदियों के अलावा एक जगह से दूसरी जगह ले जाए जा रहे सजा प्राप्त दोषियों को वोटिंग के अधिकार से वंचित रखने का प्रावधान है। इस बाबत याचिकाकर्ता प्रवीण चौधरी का कहना है कि कैदियों को मत देने के अधिकार से वंचित रखना संविधान के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है। हमारे संविधान का आर्टिकल 19 लोगों को अभिव्यक्ति की आजादी देता है, लेकिन जेल में बंद करीब चार लाख कैदियों को वोट देने से वंचित करना, उनके मूल अधिकारों का हनन करना है।
Published on:
19 Apr 2019 07:01 pm
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