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पत्रिका ओपिनियन : कलाएं होती हैं जीवन का सहज छंद

कला और संस्कृति दो शब्द मिले-जुले से हैं पर इनमें महीन भेद है। कला का अर्थ है जिसमें नया कुछ व्यक्त किया जाए। जीवन से जुड़ी हर क्रिया कलाओं में घुलकर ही पूर्णत प्राप्त करती है। संस्कृति समाज में गहरे तक व्याप्त गुण है, जिससे जीवन जीने का ढंग हम पाते हैं। माने हमारा रहन-सहन, खान-पान, वस्त्र विन्यास, हमारी सोच आदि सभी संस्कृति में समाहित है। संस्कृति का अर्थ है—सुधरा हुआ,परिष्कृत।

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जयपुर

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VIKAS MATHUR

Mar 13, 2024

कलाएं होती हैं जीवन का सहज छंद

कलाएं होती हैं जीवन का सहज छंद

संस्कृति स्वभाव है और कलाएं उसकी अभिव्यक्ति। कई बार यह भ्रम होता है कि संगीत, नृत्य, नाट्य, चित्र, वास्तु आदि संस्कृति है। यह सब संस्कृति नहीं है, उसकी अभिव्यक्ति का एक अंग मात्र है। पाणिनी की अष्टाध्यायी में संस्कृति शब्द की व्युत्पत्ति संस्कार है। इसलिए भारतीय संस्कृति की जब हम बात करते हैं तो जन्म से मृत्यु पर्यन्त के संस्कारों की ओर हमें झांकना पड़ेगा। जन्म संस्कार होता है तो उत्सव मनाते मन मुदित होता है, यज्ञोपवीत से शिक्षा का संस्कार प्रारंभ होता है। कभी इस समय में पाटी पोखण होता था। यानी स्लेट पर रिद्धि-सिद्धि सहित श्रीगणेश व हंसवाहिनी मां सरस्वती का अंकन कर बालक को पढऩे भेजा जाता। शिक्षा पूरी होती तो समावर्तन संस्कार होता। नव जीवन का प्रारंभ का उत्सव होता है।

विवाह संस्कार में तो मंगल गान के साथ आंगण, तोरण द्वार सजने की परम्परा रही ही है। इसी तरह हमारे मृत्यु-संस्कार हैं। जीवन में ये जितने भी संस्कार हैं, उनकी व्यंजना संगीत, नृत्य, नाट्य, चित्र आदि तरह-तरह की कलाओं में ही होती रही है। यही संस्कृति और कला का महीन भेद है। संस्कृति जीवन जीने का ढंग है और कलाएं उसकी अभिव्यक्ति। मुझे लगता है, कलाएं जीवन में सृजन से जुड़ी ऊर्जा का संधान हैं। इसलिए संस्कृति में जब सृजन का ह्रास होने लगता है, जीवन भी यांत्रिक होता जड़त्व का शिकार होने लगता है। संस्कृति असल में कलाओं के जरिए जीवन की गत्यात्मकता है। कहीं थम गए तो समझ लीजिए सृजन के रास्ते भी बंद हो जाएंगे।

संस्कृति की सार्थकता ही इसमें है कि वह पुराना जो कुछ अच्छा है, उसे अपनाते हुए निरंतर आगे बढ़े। हम आज भी रात्रि को फूल-पत्तियां नहीं तोड़ते। इसलिए कि पेड़ भी तब सोया हुआ होता है। किसी ने समझाया नहीं, पर यह स्वभाव में आ गया। संस्कृति बन गया। उत्सव, पर्व, त्योहार पर मन मुदित हो गाता-झूमता है, मांडणे, अल्पना आदि उकेरता है। विवाह होता है तो मेंहदी सजती है,दीपावली के दूसरे दिन गोबर से गोरधन जी की मूरत बना उसकी पूजा की जाती है। ये कलाएं कहां से आईं, जीवन में घुले स्वभाव से। पुराना जो अच्छा है, उसे नया जीवन देने की दृष्टि इसी तरह कलाएं देती हैं। संस्कृति को अप-संस्कृति होने से बचाती है। भोगवाद की बजाय श्रम से उपजा नाच-गान जब कहीं होगा तभी संस्कृति जीवंत रहती है,जीवाश्म नहीं बनेगी।

कलाएं जीवन का सहज छंद हैं। इसलिए उनका होना जरूरी है पर सहजता रहे। राजस्थान में कभी दूर तक पसरा रेगिस्तान, लू और आंधियां चलती थीं। पानी की एक-एक बूंद के लिए आदमी तरसता था। इसके बावजूद कला-रूपों में कुछ नहीं में सब-कुछ होने की संभावना तलाश ली गई। सात वार-नौ त्योहार वाला प्रदेश बन गया, राजस्थान। संस्कृति की यही सुगंध है। अभावों का रोना नहीं है, उससे जूझते हुए जीवन को उल्लसित भावों से जीने की सीख कलाएं देती रही हंै। अब अत्यधिक विकास से उपजी यांत्रिकता है, पर्यावरण प्रदूषित है, पारिस्थितिकी संतुलन बिगडऩे से उभरा जलवायु संकट है।

इनसे उबरने की शक्ति भी संस्कृति की वे छटाएं हैं जिनमें तालाब खोद वर्षा जल संरक्षण हुआ। जीव-जंतुओं के प्रति करुणा रखते हुए उन्हें अन्न, जल देने की परम्पराएं बनीं, जिनमें पेड़ नहीं काटने के लिए खेजड़ली जैसे बलिदान हुए। ओरण के साथ गोचर भूमि के लिए स्थान रखा गया। इस समय के संकटों में भी जीवन से जुड़े ऐसे ही संस्कारों की आवश्यकता है। हम नवीन हों, आगे बढ़ें पर परम्पराओं के उजास में कलाओं के झिलमिल सहज रूप हमारे संग होंगे, तभी जीवन भरा-पूरा संपन्नता लिए होगा।

डॉ.राजेश कुमार व्यास संस्कृतिकर्मी, कवि और कला समीक्षक