डकैतों से घिरे बैंक

सार्वजनिक बैंक देश में भ्रष्टाचार के बड़़े अड्डे बनते जा रहे हैं। देश की आम जनता की खून-पसीने की कमाई का लाखों करोड़ रुपये इन बैंकों में बड़े पदों पर बैठे कुछ दानव निर्लज्जता से चूसते जा रहे हैं। भ्रष्टाचार की काली कमाई से अपने बच्चों के लिए ऐशो-आराम के साधन जुटाने में इन्हें जरा सी शर्म नहीं आती।

Bhuwanesh Jain

November, 0711:14 AM

विचार

भुवनेश जैन
सार्वजनिक बैंक देश में भ्रष्टाचार के बड़़े अड्डे बनते जा रहे हैं। देश की आम जनता की खून-पसीने की कमाई का लाखों करोड़ रुपये इन बैंकों में बड़े पदों पर बैठे कुछ दानव निर्लज्जता से चूसते जा रहे हैं। भ्रष्टाचार की काली कमाई से अपने बच्चों के लिए ऐशो-आराम के साधन जुटाने में इन्हें जरा सी शर्म नहीं आती।

मंगलवार को सीबीआइ ने देशभर में 15 बैंकों में छापे मारे तो 7200 करोड़ रुपये की धोखाधड़ी के मामले सामने आए। चार जगह तो 1000 करोड़ रुपये से ज्यादा के घोटाले सामने आए। भोपाल के एक बैंक को तो बैंक के "लुटेरे" अफसरों की मदद से 1266 करोड़ की चपत लगा दी गई। मुरैना में एक बैंक के चीफ मैनेजर की मदद से वेयर हाउसों के फर्जीवाड़े में करोड़ों रुपये लूट लिए गए। मंगलवार के छापे में 11 मामले ऐसे थे जिनमें घोटाले के राशि 100 से 100 करोड़ रुपये के बीच थी।

एक जमाना ऐसा था जब बैंक डकैती में बाहर के डकैत आकर डकैती डालते थे, अब लगता है बाहर के लोगों की जरूरत ही नहीं है। बैंकों के भीतर ही बैंक डकैती डालने वाले मौजूद हैं। आज जिस बैंक में हाथ डालो, घोटाला ही घोटाला नजर आता है। कई धनपति बैंक अफसरों की मिलीभगत से हजारों-करोड़ों रुपये लूट कर देश से ही चंपत हो गए। सरकारें उनको खोजते-खोजते थक गई पर कोई हाथ नहीं आया। धनपति विदेशों में और बैंक लूट में उनके साझीदार बैंक अफसर देश के भीतर मौज कर रहे हैं।

बैंक चाहे छोटे हो या बड़े- प्राय: सब आकण्ठ भ्रष्टाचार में डूबे हुए हैं। कश्मीर का सबसे बड़ा बैंक जमू-कश्मीर बैंक तो कुछ परिवारों की निजी बपौती बन गया। रिजर्व बैंक तक के आदेश वहां कचरे की पेटी में डाल दिए जाते हैं। वैसे तो सभी बैंकों पर रिजर्व बैंक का नियंत्रण नाम मात्र का रह गया है। या तो रिजर्व बैंक में भी अव्यवस्था का आलम है या उसके अफसर भी भ्रष्टाचार की गंगा में हाथ धो रहे हैं। वरना इतनी बड़ी-बड़ी लूट हो जाए और देश की इतनी बड़ी संस्था में पत्ता भी नहीं ाड़के, यह कैसे संभव है! देश के विभिन्न हिस्सों में आए दिन

एटीएम लूट लिए जाते हैं। लूट के तरीके भी कहीं न कहीं मिलीभगत के संकेत देते हैं। ऐसा लगता है जनता के पैसे की किसी को कोई चिंता नहीं है।

देश में हर साल एक से बड़ा एक बैंक घोटाला सामने आ रहा है। कभी सिंडीकेट बैंक घोटाला तो कभी पीएमसी बैंक घोटाला। लूट से बैंक खाली हो रहे हैं तो बंदिशे जनता पर लगा दी जाती हैं कि कोई एक निश्चित रकम से ज्यादा पैसे अपने ही खाते से नहीं निकाल सकता। कानून तो ऐसे भी बनाए जा रहे हैं कि बैंक डूब गया तो जनता को भी उसके पैसे नहीं मिलेंगे। बैंक प्रशासन के नीति-निर्धारकों के दिमागी-दिवालिएपन की यह हद है। बैंकों को बर्बादी से बचाने के लिए केन्द्र सरकार को भी और सती दिखानी होगी। उसे यह नहीं भूलना चाहिए कि नोटबंदी के परिणामों को विफल करने में भ्रष्ट बैंक अधिकारियों की भूमिका सबसे ज्यादा रही थी। आज बैंक सेवा के नाम पर धन निकासी, जमा कराने सहित सभी सेवाओं के लिए आम आदमी की जेबें काटी जा रही हैं।

आवश्यकता है कि बैंको में भ्रष्टाचार के कानूनों को सत बनाया जाए। ये भ्रष्टाचार साधारण आर्थिक अपराध नहीं है, देश की जनता के विश्वास की हत्या है। इन्हें हत्या जैसा अपराध मान कर ही सजा दी जानी चाहिए। बैंकों में शीर्ष पदों पर नियुक्ति के लिए केवल वरिष्ठता काफी न हो, बल्कि "ईमानदारी" भी बड़ी योग्यता हो। बैंकों में बैठे उन ईमानदार अधिकारियों और कर्मचारियों को भी अपनी संस्थाओं पर लग रही कालिख को साफ करने का बीड़ा उठाना होगा। केवल मौन रह कर लूट देखते रहना भी अपराध से कम नहीं है।

भुवनेश जैन
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