ब्रह्म और कर्म - 1

कर्म जीवन का पर्याय है। इससे मुक्त नहीं रहा जा सकता। यहां तक कि संन्यासी को भी कर्म तो करना ही पड़ता है। समाधि भी कर्म ही है। शंकर कर्म का विरोध करते हैं। कृष्ण कर्ताभाव का विरोध करते हैं। अकर्म अर्थ भी कर्म छोडऩा नहीं है, कर्ताभाव का त्याग ही है।

Shri Gulab Kothari

December, 0407:16 PM

‘पूर्णमद: पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्ण मुद्च्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्ण मेवा वशिष्यते॥’

सृष्टि पूर्णता का ही पर्याय है। इसमें ब्रह्म ही पूर्ण नहीं, जीव भी पूर्ण है। पिता-पुत्र ही तो है। पिता वै जायते पुत्र:। पिता भी पूर्ण है, पुत्र भी पूर्ण है। गागर भी पूर्ण है, सागर भी पूर्ण है। पिता सूर्य भी पूर्ण है, औषधि-प्राणी वर्गादि सभी पूर्ण हैं। सूर्य प्रकाश है, आत्मा है, तब उसकी सन्तानें भी प्रकाश हैं। प्रकाश ही साक्षी भाव है। यही ‘अहं ब्रह्मास्मि’ है। यही जीवन का रहस्य है। गीता इस दृष्टि से समर्पण भाव का, साक्षी भाव का शास्त्र ही है।

आत्मा के दो धातु हैं- ब्रह्म और कर्म। सम्पूर्ण विक्रम का सिद्धान्त ब्रह्म से जुड़ा है। जो कुछ भी प्रकृति में चल रहा है, जिस पर हमारा नियंत्रण संभव नहीं है, वही विकर्म है, ब्रह्म है। शेष कर्म के कर्ता और अकर्ता-दो भाग हो जाते हैं। कर्म का आधार कामना और कामना का आधार ज्ञान कहा गया है। ज्ञान कहते हैं विद्या को और अज्ञान नाम है कर्म का। इसी तरह कर्म और अकर्म की भूमिका स्पष्ट है। कर्म में व्यक्ति का कर्ताभाव युक्त रहता है। अकर्म में कर्म तो रहता है, किन्तु कर्ताभाव नहीं होता। अत: अकर्म को ब्रह्म का पर्याय माना गया है। कृष्ण कह रहे हैं कि सभी कर्म मुझको ही अर्पित कर दो। तुम कर्ता मत बनो। कृष्ण तो यह भी कहते हैं कि ‘हमारा अधिकार मात्र कर्म करने तक है, फल भोगने पर भी है, किन्तु फल पर अधिकार नहीं है।’

कर्म जीवन का पर्याय है। इससे मुक्त नहीं रहा जा सकता। यहां तक कि संन्यासी को भी कर्म तो करना ही पड़ता है। समाधि भी कर्म ही है। शंकर कर्म का विरोध करते हैं। कृष्ण कर्ताभाव का विरोध करते हैं। अकर्म अर्थ भी कर्म छोड़ना नहीं है, कर्ताभाव का त्याग ही है। शंकर जिसे माया कहते हैं, वह कर्म ही है। ब्रह्म में कर्ताभाव नहीं है। सम्पूर्ण सृष्टि ब्रह्म का कर्म ही तो है। तब ज्ञानी कर्म के बाहर नहीं रह सकता। शंकर कर्म को असत्य कहना चाह रहे हैं। कहते हैं कि ज्ञानी के लिए कोई कर्म नहीं है। कर्ताभाव मिटाने पर उनका जोर नहीं है। यह स्पष्ट ही है कि यदि कर्म नहीं है, तो कर्ता भी नहीं रहेगा। कृष्ण कहते हैं कि कर्ता को जाने दो, कर्म भी चला जाएगा।

माया तो ब्रह्म का ही अंग है। इससे इंकार कैसे किया जा सकता है। जाग्रत है, स्वप्न भी है, तो सुषुप्ति भी है। अस्तित्व को नकार नहीं सकते। माया तो कर्म ही है। ‘नाहम् प्रकाशं सर्वस्य...।’ और शंकर कर्म को अज्ञान कह रहे हैं, बन्धन बता रहे हैं। संसार में रहकर कर्मों से मुक्त रहो। इसको एक अर्थ में सही भी ठहराया जा सकता है। थोड़ी देर के लिए यह मानना पड़ेगा कि मनुष्य योनि में भिन्न क्या है? क्यों बनी मनुष्य योनि? कर्म करने के लिए? कर्मफल रूप 84 लाख योनियों को भोगने के लिए? और यदि कर्म करें ही नहीं तो? न कर्म, न कर्मफल, न कोई अन्य योनि प्राप्त होगी। तब मानव योनि स्वयं भी भोग योनि रह जाएगी। मुक्ति के सारे मार्ग ठहर जाएंगे। ज्ञान और भक्ति की सार्थकता खो जाएगी। वैसे भी बिना कर्म के ज्ञान भी विष हो जाता है। भक्ति भी मन का, भावों का कर्म ही है। कर्म यदि न रहे, तब 84 लाख योनियां किसके लिए? यह विश्व, यह स्वर्गादि किसके लिए? होंगे भी या नहीं? कर्म है तो ही विश्व है। विश्व परमात्मा का कर्म ही तो है।

ब्रह्म सत्य, जगन्मिथ्या। सत्य यानी कि जो कल भी था, आज भी है और कल भी रहेगा। विश्व में सत्य भी रहेगा और असत्य भी। सत्य के होने का आधार असत्य ही है। परिवर्तन को शास्त्रों ने नित्य कहा है, यानी सत्य कहा है। सत्य और असत्य विरोधी तत्त्व नहीं है। एक है वहां दूसरा नहीं होता। असत्य, जो नहीं है, जबकि सत्य है। सत्य ब्रह्म है, असत्य माया है। माया भी ब्रह्म की तरह सत्य ही है। ब्रह्म की शक्ति है। बिना माया को समझे ब्रह्म को भी को भी समझना कठिन है। कर्म के मार्ग से ही ब्रह्म को समझा जा सकता है। जीव तो कर्म का प्रतिनिधि ही है। कर्म फल भोगने के लिए ही जीव शरीर धारण करता है। फल नहीं हों, तो जीव भी ईश्वर ही है। कर्म ही दो जीवों को एक-दूसरे से अलग करते हैं। बिना कर्म के सारे जीव समान हो जाएंगे। गीता में कृष्ण अकर्म की बात करते हैं। अकर्म को हम पूर्णता के मंत्र से समझ सकते हैं।

शुक्ल यजुर्वेदियों के शान्ति पाठ का मंत्र है-
‘पूर्णमद: पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्ण मुद्च्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्ण मेवा वशिष्यते॥’

अर्थात्- व्यापक ब्रह्म अपने आप में पूर्ण है। फल प्राप्त होने पर ही कर्म की पूर्णता है। अत: ब्रह्म और कर्म दोनों में पूर्णता है। कर्म की पूर्णता फल पर्यन्त मान ली जाए,
किन्तु ब्रह्म की पूर्णता कैसे मानी जाए। तब पण्डित मधुसूदन ओझा जी लिखते हैं कि यदि कर्म की पूरी पूर्णता को हटा लिया जाए तो ब्रह्म की पूर्णता ही रह जाएगी। फलयुक्त कर्म की व्यापकता ने कर्म को पूर्ण बना रखा है। फल को युक्त न करके किया हुआ कर्मबन्धन नहीं होता। यही कर्म की अपूर्णता कहलाती है। तब कर्म ब्रह्ममय हो जाता है। यही ब्रह्म की पूर्णता होगी। सृष्टि से पहले भी ब्रह्म पूर्ण था, सृष्टि अवस्था में भी पूर्ण है। उस पूर्ण ब्रह्म से ही पूर्ण जगत् निकाला गया है। शेष जो बचा वह भी पूर्ण ही रहेगा। अर्थात् जो कर्म पूरा न होकर ब्रह्म कहलाया वही अकर्म है। इसमें कर्ता न रहा। कर्ता का होना ही कर्म है।

कर्म मनुष्य योनि की विशेष सुविधा है, जो इसको भोग योनियों से भिन्न करता है। कर्म होगा तो कर्ता होगा, फल होगा। भोग योनियां होंगी। कर्म होगा, कर्ताभाव नहीं होगा, वह अकर्म हो जाएगा। बन्धन नहीं होगा। उदाहरण के लिए पेड़ को ही देखें। बीज वपन के बाद अंकुरण भी कर्म है। पेड़ बनना, फूल-फल धारण करना भी कर्म है। इस सम्पूर्ण कर्म शृंखला में कर्ता कौन है? क्या इसका एक पत्ता दूसरे पत्ते से भिन्न नहीं है? प्रत्येक पत्ते का स्वतंत्र भाग्य नहीं है। कोई कीट एक ही पत्ते को क्यों खाता है? उसके पास वाले को क्यों नहीं? क्या यह कर्म सत्यता नहीं है? फल ही कर्म की सत्यता है। हर कर्म का फल है। प्रत्येक पत्ते को स्वत: उसकी खुराक प्राप्त होती है। वहां पर कर्म ही नहीं है। कर्ता नहीं है। चूंकि मनुष्य इस स्वत: प्रक्रिया से तुष्ट नहीं होता, वह अधिक प्राप्ति के लिए कर्म करता है, माया अथवा अविद्या के प्रभाव में-विद्या के प्रभाव में, कर्म करता है। प्रकृति की व्यवस्था को चुनौती देता है। अत: इन कर्मों के फल रूप समस्याएं ही पैदा कर लेता है। यही उसका कर्ताभाव है। मूल में वह भी अश्वत्थ वृक्ष का पत्ता ही है। उसका अहंकार उसे विशेष बना देता है।

मूल में सिद्धान्त यह भी है कि कर्म ही बांधता है, कर्म ही बांधा जाता है और कर्म की ही कर्मान्तर से ग्रन्थि पड़ती है। कर्म और ग्रन्थि भी मरणशील (बल) ही है। उत्क्रमण करता हुआ वायु जैसे जल में पूरी तरह बांध दिया जाता है, फेन रूप में भासित होता है, उसी प्रकार ब्रह्म में कर्म का पूर्णतया बन्धन कर दिया जाता है। यही विश्व रूप है।

विश्व को चलाने के लिए कर्म आवश्यक है। प्रत्येक पदार्थ की अपनी-अपनी अशनाया (इच्छा) रहती है। सब अपने-अपने प्रयत्न से अपना-अपना अन्न खाते हैं। इस इच्छा का आधार भी ज्ञान रूप ब्रह्म ही है। दोनों अविनाभाव रहते हैं। इसी क्रम से तो जड़-चेतन रूप विश्व का विकास होता है। सृष्टि क्रम में कर्ताभाव नहीं होता, अत: कर्म अस्पष्ट रहता है।

कृष्ण जब गीता में कहते हैं-‘कर्मण्यवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन...।’ कृष्ण स्वयं अवतार हैं और कर्म के उद्देश्य से ही आए थे। ‘परित्राणाय साधुनां....।’ यही लक्ष्य था। कृष्ण पूर्ण थे, लक्ष्य भी पूर्ण था (कर्म), किन्तु कर्ताभाव नहीं था। कह गए ‘मामेव शरणं व्रज।’
क्रमश:

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