ब्रह्म और कर्म - 2

कृष्ण ही ब्रह्माण्ड रूपी अश्वत्थ हैं और सभी प्राणी उसके फल-फूल-पत्ते हैं। सम्पूर्ण विश्व एक-दूसरे भाग का अभिन्न अंग है। कोई किसी से अलग किया भी नहीं जा सकता। सबको अपने-अपने हिस्से का पोषण भी स्वत: ही मिलता रहता है।

 

Shri Gulab Kothari

December, 0407:17 PM

गीता एक ओर सृष्टि के स्वरूप की विस्तृत व्याख्या करती है, वहीं दूसरी ओर व्यक्ति और प्रकृति के समन्वय, एकरूपता को सिद्ध करती है। कृष्ण कहते हैं-‘ममैवांशो जीवलोके’ और यह भी कहते हैं कि-‘देहानां हृद्देशे तिष्ठति।’ दो बातें क्या एक ही अर्थ रखती हैं? जीव आत्मा का अंग है। आत्मा का ही दूसरा अंश ईश्वर है। इन्हीं को द्वासुपर्णा कहा है। ईश्वर और जीव दोनों ही वैश्वानर-विराट् संस्था से निर्मित होते हैं। वैश्वानर भी कृष्ण ही हैं-‘अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहामाश्रित:।’

हृदय भिन्न संस्था है। किसी भी वस्तु या प्राणी की आकृति से पूर्व उसका केन्द्र (ऋक्) ही बनता है, आकृति परिधि कहलाती है। केन्द्र ही उक्थ है। उसी को ऋग् भी कहते हैं। परिधि साम तथा मध्य क्षेत्र यजु: कहलाता है। केन्द्र को हृदय कहा गया है। यह अक्षर प्राण, ब्रह्मा-विष्णु-इन्द्र की समष्टि है। हृदय से परिधि पर्यन्त होने वाली प्राणों की गति-आगति ही वस्तु की स्वरूप स्थिति को व्यवस्थित रखती है। इसी हृदय में अव्यय पुरुष की पांचों कलाएं-आनंद, विज्ञान, मन, प्राण, वाक् की स्थिति रहती है। ये प्राण ही हृदय रूप में विस्तार पाते हैं। प्राण ही अक्षर सृष्टि है। वाक् से क्षर सृष्टि का निर्माण होता है। अक्षर सृष्टि की ब्रह्मा-विष्णु-इन्द्र इन तीनों कलाओं तथा अग्नि-सोम मिलकर आगे की सृष्टि का निर्माण करते हैं।

इस हृदय के केन्द्र में कृष्ण हैं। ब्रह्मा एवं इन्द्र के साथ विष्णु हैं। वैसे तो ब्रह्मा के जनक भी विष्णु हैं। अक्षर सृष्टि कारण है, क्षर भाग स्थूल सृष्टि है। प्रत्येक स्थूल के हृदय में कारण रूप कृष्ण हैं। तब एक ही प्रश्न पैदा होता है कि ‘मैं’ कौन हूं। इसका उत्तर भी एक ही है-‘मैं’ ही कृष्ण हूं। अहं ब्रह्मास्मि। अर्जुन ने गीता सुनी, कृष्ण को समझा और कृष्ण को अपने भीतर ही पा लिया। अर्थात् स्वयं कृष्ण ही हो गया। इसका मूल अर्थ हुआ कि ब्रह्माण्ड का प्रत्येक प्राणी ही कृष्ण है। जैसा कि कृष्ण ने कहा-‘मैं अर्जुन हूं’, वैसे ही कहा कि मैं ‘वासुदेव’ हूं। सम्पूर्ण सृष्टि के केन्द्र में कृष्ण का होना प्रमाणित हो जाता है। कृष्ण ही ब्रह्माण्ड रूपी अश्वत्थ हैं और सभी प्राणी उसके फल-फूल-पत्ते हैं। सम्पूर्ण विश्व एक-दूसरे भाग का अभिन्न अंग है। कोई किसी से अलग किया भी नहीं जा सकता। सबको अपने-अपने हिस्से का पोषण भी स्वत: ही मिलता रहता है। न संघर्ष करना पड़ता है, न ही कुछ करना होता है। हर पत्ते का स्वरूप व्यवस्थित बना रहता है।

कोई भी पेड़ अपना मूल खोजे तो उसका बीज पीछे के किसी पेड़ से आया होगा। इसी तरह पीछे से पीछे चले तो परमात्मा तक पहुंच जाएंगे। क्योंकि सभी का आत्मा षोडशी है। पंचकोशात्मक है। स्थूल भी है, सूक्ष्म भी है। दोनों की स्वतंत्र वृत्तियां भी हैं और संहित भाव में भी हैं। सूक्ष्म चेतना भाग कूटस्थ है, हृदय रूप है, अक्षर प्राण है। मूल में अक्षर सृष्टि ही सेतु है अमृत और मत्र्य लोकों के मध्य का। इसीलिए सूर्य मंत्र में ‘निवेशयन्न मृतं मत्र्यंच’ आता है। सूर्य हमारा आत्मा है। सूर्य से ही वैश्वानर अग्नि का अस्तित्व है। इसी विराट् अग्नि से ईश्वर और जीव संस्था का निर्माण होता है। ये दोनों ही आत्मा के युगल रूप हैं। ‘द्वासुपर्णा’ हैं।

आत्मा का केन्द्र अव्यय पुरुष है। अव्यय मन ही सृष्टि का केन्द्र है, कृष्ण है। श्वोवसीयस मन कहलाता है। जब मुक्ति साक्षी होता है मन, तब माया के बन्धन खुलते जाते हैं। जो कृष्ण स्वयं को अव्यय कह रहे हैं, वे भी ‘पुर’ के मायाभाव का संकोच दूर होते ही ‘परात्पर’ रूप हो जाते हैं। ब्रह्म अलग, माया अलग। यहां परात्पर अद्वैत कहलाता है। दो नहीं, किन्तु दो के संदर्भ में एक है। जब माया भी सुप्त हो जाए तो निर्विशेष रूप में ‘अद्वय’ दो नहीं हो जाता है। अहं ब्रह्मास्मि भी यहां लीन हो गया। अष्टावक्र कहते हैं-‘स्वस्वरूपेऽहमद्वये।’ अपने ही स्वरूप में। जहां सृष्टिपूर्ण था, पूर्ण महासमुद्र में। अर्थात् स्थूल से अतिसूक्ष्म तक की सारी स्थितियां हमारे अस्तित्त्व से जुड़ी हैं। प्रत्येक कर्म के स्वरूप के अनुसार इनका अनुभव होता रहता है। कर्ताभाव अलग, अकर्म अलग, समर्पण भिन्न, विद्या और अविद्या का प्रभाव बदलता रहता है।

अमृत और मृत्यु मन के ही व्यापार हैं। मन विचित्र संस्था है। अनंत रूप हैं मन के। चंचल भी है। न अतीत में टिकता है, न अनागत में। वर्तमान को तो छूता तक नहीं है। तब मन स्वयं अपने स्वरूप को भी नहीं जान पाता। यही अर्जुन की मन:स्थिति थी। इस स्थिति से उबरने के लिए गीता बन गई। लक्ष्य तो अर्जुन को जाग्रत करना ही था। उसे स्वरूप को स्पष्ट करना ही था कि ‘तू कौन है।’ यही जीवन का प्रथम और अन्तिम प्रश्न होता है। जब तब उत्तर नहीं मिलता, माया भ्रमित करती रहती है। जब उत्तर मिल जाता है, तब प्रश्नकर्ता स्वयं शेष नहीं रहता।

जीवन का सारा द्वन्द्व यही है। कामना ही चलाती है जीवन को। एक कामना होती है ईश्वर की तथा दूसरी कामना जीव की होती है। दोनों की दिशाएं भी भिन्न होती हैं। ईश्वर प्रकृति के सहारे कार्य करता है। उसका अपना एक तंत्र है, नियम है, कर्मानुरूप फल हैं। प्रकृति देश-काल से पार है। व्यक्ति जो करता है, वह अविद्या के वश रहता है। अविद्या, अस्मिता, राग-द्वेष, अभिनिवेश में व्यक्ति का मिथ्या दृष्टि का आधार अधिक बलवान होता है। उसका अहंकार परिस्थितियों को स्वीकार करने नहीं देता। प्रकृति को एक के बाद दूसरी चुनौती देता रहता है। विद्या-धर्म, ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्य-अविद्या के आगे निर्बल हो जाते हैं। उसका कर्ता भाव, फलाशक्ति हावी रहते हैं। यही विषाद का हेतु है। अपेक्षा जब पूर्ण नहीं होती, तब विषाद होता है। विषाद की निरन्तरता ही अवसाद बन जाती है।

जीवन का मूल टकराव अविद्या के कारण ही होता है। कृष्ण कह रहे हैं-‘कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।’ कर्म का अधिकार व्यक्ति का है, कर्म फल भोगने का अधिकार भी उसका है। फल क्या होगा तथा कब आएगा, यह प्रकृति के साथ (तंत्र में) चलता है। इसीलिए तो व्यक्ति को बार-बार जन्म लेना पड़ता है। जब फल मेरे नियंत्रण में नहीं है, जैसे भविष्य मेरे नियंत्रण में नहीं है, तब मुझे उसकी प्रतीक्षा क्यों करनी चाहिए? अपेक्षा क्यों रखनी चाहिए?

एक महत्वपूर्ण बात कृष्ण ने कह दी है-‘ममैवांशो जीवलोके...।’ कौन कह सकता है यह बात! वासुदेव कृष्ण नहीं कह सकते। त्रेतायुग में अष्टावक्र ने भी नहीं कही। केवल परात्पर ही यह घोषणा कर सकता है। वही अव्यय पुरुष के केन्द्र में बैठा है। वही सबका आत्मा बनता है। आत्मा के भी दो धातु हैं- ब्रह्म और जीव। कृष्ण यह भी कहते हैं- ‘ईश्वर: सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति’ गीता 18.61 । तब यह भी निश्चित हो गया कि ईश्वर और जीव, आत्मा के दोनों पक्ष कृष्ण ही हैं। वही साक्षी हैं, वहीं कर्ता और भोक्ता हैं। व्यक्ति स्वयं एक प्रतिबिम्ब मात्र है। माया का भ्रम जाल है। अव्यय पुरुष की कलाएं भी माया है। अक्षर और क्षर प्रकृति रूप ही हैं। प्रकृति में जो शेष बचा वही परात्पर पुरुष रूप में लीला करता है। कर्म उसके होने की अभिव्यक्ति है। कर्म भी पूर्ण हैं अत: विश्व भी पूर्ण अभिव्यक्ति है ब्रह्म की। कर्म रूप में कर्ता भी विश्व में उपलब्ध है और फल रूप भोग योनियां भी विश्व में समाहित हैं।

माया के आवरण अभ्यास से हटाए जा सकते हैं। अष्टावक्र इन अर्थों में कृष्ण से भी आगे की बात कह रहे हैं। वे कहते हैं- करने को कुछ है ही नहीं। साक्षी भाव मुक्ति है। यह जानने भर की देर है कि मुक्त ही हूं। बोध ही मुक्ति है। कृष्ण ने अर्जुन को प्रेरित किया ‘स्व-स्वरूप’ में प्रतिष्ठित करने को। समझ न पाया। विराट् स्वरूप प्रकट किया। अन्त में अर्जुन बनकर लड़ा। अपने भीतर बैठे कृष्ण तक फिर भी नहीं पहुंच पाया। कृष्ण बनकर- अद्वैत भाव में स्थित होकर नहीं किया युद्ध। अष्टावक्र ने जीव और ईश्वर का स्वरूप भीतर ही बताते हुए कहा- पुरुषार्थ मोक्ष तक जाता है। शुद्ध चैतन्य अवस्था मोक्ष के भी पार है।

‘न स्वर्गो नैव नरको जीवन्मुक्तिर्न चैव हि।
बहुनात्र किमुक्तेन योगदृष्ट्या न किंचन ॥’ अष्टावक्र गीता 18-80

न स्वर्ग, न नर्क, न मोक्ष। तब क्या बचा? पुरुष का पुर भाव भी गया। माया की परिधि का द्वार खुला, परात्पर मुक्त हुआ- पुरुष ही नहीं बचा।

कृष्ण ठहर जाते हैं- ‘समर्पण’ पर। ‘मामेकं शरणं व्रज।’ उसके बाद ईश्वर की इच्छा पर ही सारे कर्म होने दें। बन्द कर अपने अहंकार के प्रयास। तू क्षत्रिय है, युद्ध कर, स्वर्ग को जा अथवा अपयश भोगेगा। यही नर्क होगा। समर्पण होने पर वही होगा, जो मैंने तय कर लिया है। मैं इन सभी को मरा हुआ देख रहा हूं। तू मारेगा नहीं, मारने में निमित्त मात्र होगा। तेरा बीच में होना ही बाधा है। या तो तेरी कामना से कर्म होगा, या मेरी कामना प्रभावी होगी। तू मेरी कामना को समर्पित हो जा। सारा तेरा कर्म अकर्म (ब्रह्म) हो जाएगा। भीतर भी ब्रह्म और बाहर भी ब्रह्म। तू जान जाएगा कि कर्म ही धर्म है। कर्म ही ब्रह्म है। जैसे प्रत्येक तत्त्व अद्र्धनारीश्वर है, ब्रह्म भी है। सृष्टि का मूल प्राण-विष्णु रूपी अग्नि प्राण भी प्रसरण एवं संकुचन युक्त है। यह भी सत्य है कि जहां व्यक्ति कर्ता है, वहां ईश्वर नहीं है। व्यक्ति हटा और ईश्वर प्रकट हुआ।
समाप्त

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