
न्यायालय ने कहा कि महज शक के आधार पर वह निर्वाचन आयोग के अधिकार क्षेत्र में दखल नहीं करना चाहती।
हम प्यास लगने पर ही कुंआ खोदते हैं। इसकी मिसाल है, कांग्रेस द्वारा गुजरात चुनाव के वोटों की गिनती को लेकर सर्वोच्च न्यायालय में शुक्रवार को दायर याचिका। कांग्रेस ने इसमें न्यायालय से चुनाव आयोग को यह निर्देश देने का आग्रह किया था कि सोमवार को होने वाली मतगणना में ईवीएम के वोटों का वीवीपैट मशीनों की २५ प्रतिशत पर्चियों से सत्यापन किया जाए। सर्वोच्च न्यायालय ने इसे हाथों-हाथ खारिज कर दिया।
न्यायालय ने कहा कि महज शक के आधार पर वह निर्वाचन आयोग के अधिकार क्षेत्र में दखल नहीं करना चाहती। किसी को शिकायत हो तो चुनाव याचिका दाखिल करने का रास्ता उसके पास है। कांग्रेस अब तक क्या कर रही थी? उसके दिग्गज वकील राजनेता अब तक कहां थे? जब आयोग ने गुजरात में सभी मतदान केन्द्रों पर ईवीएम के साथ वीवीपैट लगाने का निर्णय किया तब कांग्रेस ने यह प्रश्न क्यों नहीं उठाए? क्या वे मानकर चल रहे थे कि इन मशीनों के वोट समानांतर रूप से गिने जाएंगे? या यह मानकर चल रहे थे कि हर मतदाता ईवीएम में अपना वोट डालने के बाद उसका वीवीपैट से मिलान कर लेगा?
सर्वोच्च न्यायालय ने कांग्रेस से सही कहा कि वह देश की चुनाव प्रक्रिया में सुधार के सुझावों के साथ उसके पास अलग से दस्तक दे सकती है। कांग्रेस ही क्यों, इस काम में अन्य तमाम राजनीतिक दल और वे सब लोग जो लोकतंत्र को मजबूत करने में रुचि रखते हैं, सहयोग कर सकते हैं। यह सब जानते हैं कि हमारी चुनाव प्रक्रिया कितनी भी अच्छी हो, उसमें कमियां भी कम नहीं हैं। गलतफहमी में रहने से नुकसान बड़ा होता है। चुनाव आयोग के कामकाज पर आज अंगुलियां उठ रही हैं, सुधार नहीं हुआ तो कल भरोसा उठ जाएगा।
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