नेतृत्व : दर्शन और ध्यान से संवारें क्षमता

सामान्य भाषा में दर्शन का अर्थ है 'देखना'। हालांकि, दार्शनिक रूप से इसका अर्थ है किसी भी वस्तु, तथ्य, तत्व और स्थिति के परे देखने की प्रक्रिया या अभ्यास, जो अवलोकन से परिप्रेक्ष्य तक, विशिष्टता से सार्वभौमिकता तक और निर्णय से सहानुभूति तक की एक दृष्टि प्रदान करती है।

By: विकास गुप्ता

Published: 20 May 2021, 06:37 PM IST

प्रो. हिमांशु राय, (निदेशक, आइआइएम इंदौर)

भरतीय दर्शन के विभिन्न आध्यात्मिक और परिष्कृत अवधारणाओं के विशाल साहित्य में दर्शन और ध्यान को उचित महत्त्व दिया गया है, गहराई से समझने पर ही जिसके महत्त्व और दार्शनिक पहलू की अनुभूति संभव है। यद्यपि ये शब्द पिछले कई वर्षों से दैनिक बातचीत में उपयोग किए गए और विकसित हुए हैं, लेकिन दार्शनिक दृष्टि से ये बहुस्तरीय अवधारणाओं को व्यक्त करते हैं।

सामान्य भाषा में दर्शन का अर्थ है 'देखना'। हालांकि, दार्शनिक रूप से इसका अर्थ है किसी भी वस्तु, तथ्य, तत्व और स्थिति के परे देखने की प्रक्रिया या अभ्यास, जो अवलोकन से परिप्रेक्ष्य तक, विशिष्टता से सार्वभौमिकता तक और निर्णय से सहानुभूति तक की एक दृष्टि प्रदान करती है। एक शैक्षिक दृष्टिकोण से यह शब्द 'दर्शनशास्त्र' या 'विश्वदृष्टि' के क्षेत्र को भी संदर्भित करता है (भारतीय विचारों के समूह को भी दर्शन कहा जाता है)। रोजमर्रा की भाषा में, ध्यान का अर्थ है 'ध्यान करना' या किसी चीज पर 'ध्यान देना', लेकिन आध्यात्मिक दृष्टि से, यह अंतर्मन या 'आंतरिक दृष्टि' को देखने और समझने का अभ्यास है, जो किसी चीज पर ध्यान देने से लेकर ध्यान केन्द्रित करने तक और फिर उसी को प्रतिबिंबित और परिलक्षित करने पर आधारित होता है।

आइए, हम नेतृत्व और संगठनात्मक प्रबंधन के संदर्भ में इन अवधारणाओं को समझने का प्रयास करते हैं। एक सफल लीडर को मुख्य रूप से दूरदर्शी के रूप में देखा जाता है, जो एक समान लक्ष्य की दिशा में काम करने के लिए अपने अनुयायियों को सफलतापूर्वक एकजुट करता है। एक प्रबंधक को अनिश्चितता से परे देखने, निकट भविष्य की कल्पना करने और बाहरी परिस्थितियों के अनुकूल रणनीतिक प्रयासों में सुधार करने के साथ, संगठन के लक्ष्यों पर केन्द्रित होने की और सही दिशा देने की जरूरत होती है। इस विविध दुनिया में जहां हर किसी के अलग-अलग दृष्टिकोण हैं, वहां सफल लीडर एक साझा दृष्टिकोण कैसे ला सकते हैं? इसके लिए, उन्हें न केवल लक्ष्यों के महत्त्व को समझने की, बल्कि अपनी दृष्टि भी स्पष्ट करने की जरूरत है।

विकास गुप्ता
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