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अपराधों की रोकथाम मेंं एआइ तकनीक कितनी मददगार

Published: Jan 31, 2024 08:23:50 pm

Submitted by:

Gyan Chand Patni

एल्गोरिदम डिजिटल रिकार्ड और ऑनलाइन इन्वेस्टिगेशन के संयोजन से तैयार किए जा रहे एआइ सॉफ्टवेयरों से सुरक्षा चक्र विकसित करने का सघन अभियान, निश्चय ही अपराध की रोकथाम में सहायक और सफल होगा।

अपराधों की रोकथाम मेंं एआइ तकनीक कितनी मददगार
अपराधों की रोकथाम मेंं एआइ तकनीक कितनी मददगार
डॉ. सचिन बत्रा

सलाहकार, मीडिया फेडरेशन ऑफ इंडिया दिल्ली

दुनिया के विभिन्न देशों में पुलिस भी अपराधों की रोकथाम के लिए इन्वेस्टिगेटिव ऐप विकसित कर रही है। अब तो यह दावा भी किया जा रहा है कि अपराध होने से पहले ही पुलिस मौके पर पहुंच जाएगी। पुलिस के डीप-सर्च सॉफ्टवेयर, एल्गोरिदम की मदद से सोशल मीडिया के साथ ही सार्वजनिक स्थानों पर लगे सीसीटीवी कैमरों से प्राप्त आंकड़ों का विश्लेषण कर यह पूर्वानुमान लगा लिया जाएगा कि अपराध कहां और कब होने वाला है। हैरत की बात तो यह है कि पुलिस के इन डिजिटल एआइ जासूसों की मदद से अपराधी भी चिह्नित कर लिए जाएंगे। यानी पुलिस के ऐसे अनदेखे डिजिटल एआइ डिटेक्टिव निगरानी करेंगे जो दिखाई तो नहीं देंगे, लेकिन एआइ व एल्गोरिदम का इंटीग्रेटेड सिस्टम गैरकानूनी इरादों की पोल खोल देगा।
अमरीकी यूनिवर्सिटी ऑफ शिकागो के शिक्षक इशानु चट्टोपाध्याय ने गहन अनुसंधान के बाद ऐसी तकनीक विकसित की है जो कुछ बरसों के आंकड़ों के आधार पर भविष्य में होने वाले अपराध का पहले ही रेड अलर्ट जारी कर देगी। नेचर ह्यूमन बिहेवियर नामक जर्नल में इशानु ने दावा किया है कि इस विश्लेषण की विस्मयकारी तकनीक के जरिए सिस्टम में भौगोलिक स्थिति और पब्लिक डेटा दर्ज करने पर चिह्नित इलाके की डिजिटल पड़ताल की जाएगी। फिर एल्गोरिदम व एआइ प्रोग्रामिंग के माध्यम से भविष्य में होने वाले अपराध पहले ही भांप लिए जाएंगे। दिलचस्प बात यह भी है कि यह मात्र कल्पना नहीं है। इस एडवांस एनालिसिस तकनीक को अमरीका के शिकागो, अटलांटा, ऑस्टिन, डेट्रॉइट, लॉस एंजेलिस, फिलाडेल्फिया, पोर्टलैंड और सैन फ्रांसिस्को में आजमाया गया तो 90 फीसदी अपराधों का आकलन सटीक पाया गया। शोधकर्ता इशानु के मुताबिक उन्होंने तय किए गए शहरी वातावरण का 'डिजिटल ट्विन' यानी प्रतिरूप बनाया और उसमें घट चुकी पुरानी घटनाओं का ब्योरा दर्ज किया। इसके बाद एआइ एनालिसिस ऐप और एल्गोरिदम के तालमेल से निर्मित एडवांस तकनीक ने भविष्य में होने वाली चोरी, लूटपाट, हत्या, मारपीट और वाहन चोरी जैसी आपराधिक घटनाओं के संभावित रुझान उपलब्ध कराए। ये सही पाए गए। इस तकनीक ने एक सप्ताह बाद होने वाली घटनाओं का सटीक पूर्वानुमान लगा कर सभी को चकित कर िदया। ऐसा नहीं है कि सिर्फ विदेशों में ही ऑनलाइन सर्विलांस के एनालिसिस ऐप और एल्गोरिदम के तालमेल से साइबर क्राइम और अपराधों पर नकेल कसने के प्रयास किए जा रहे हैं। हमारे देश में भी पुलिस अब हाईटेक उपकरणों से लैस हो रही है। लीगल सर्विस इंडिया जनरल के मुताबिक उत्तर प्रदेश पुलिस ने अपराधियों की जांच और निगरानी रखने के लिए 'स्टेक्यू' नामक ऐप का सफल प्रयोग किया है। इसमें गैरकानूनी कृत्यों और अपराधियों का डेटा दर्ज करने के बाद गैंग रिकॉग्निशन तकनीक से पुलिस अब अपराध में भागीदार रहे गैंग के अन्य सहयोगियों का पता लगा रही है। वहीं महाराष्ट्र सरकार के निर्देशन में पुलिस ने 'एमएच-सीआरटी' कंप्यूटरीकृत इमरजेंसी रिस्पांस टीम तैयार की है जिसके उन्नत सॉफ्टवेयर सोशल मीडिया की विषय-वस्तु को लगातार खंगालते रहते हैं और हिंसा फैलने की स्थिति का आकलन कर लेते हैं।
कुल मिलाकर एल्गोरिदम डिजिटल रिकार्ड और ऑनलाइन इन्वेस्टिगेशन के संयोजन से तैयार किए जा रहे एआइ सॉफ्टवेयरों से सुरक्षा चक्र विकसित करने का सघन अभियान, निश्चय ही अपराध की रोकथाम में सहायक और सफल होगा। डिजिटल सबूतों के आधार पर फैसले भी सुनाए जाएंगे। दिलचस्प तो यह होगा कि डिजिटल सबूतों को मान्यता मिलने के बाद अपराधियों को संदेह का लाभ नहीं मिल पाएगा और डिजिटल डिटेक्टिव का साथ वाकई कानूनों के हाथ बहुत लंबे और मजबूत कर देगा। कह सकते हैं कि , 'तो डॉन को पकडऩा ही नहीं, सजा दिलाना भी मुमकिन हो पाएगा।'

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