गरीब को ला पाएंगे मुख्यधारा में?

Sunil Sharma

Publish: Sep, 11 2017 04:25:00 (IST)

Opinion
गरीब को ला पाएंगे मुख्यधारा में?

अकसर देखा गया है कि आर्थिक सुधारों के बावजूद अमीर और गरीब के बीच खाई और अधिक चौड़ी होती जाती है

- अर्जुन मेघवाल, केंद्रीय मंत्र
केंद्र सरकार में वित्त राज्य मंत्री रहे और वर्तमान में जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण राज्य मंत्री का कार्यभार

अकसर देखा गया है कि आर्थिक सुधारों के बावजूद अमीर और गरीब के बीच खाई और अधिक चौड़ी होती जाती है। ऐसा इसीलिए होता है क्योंकि कल्याणकारी योजनाओं का लाभ अर्थव्यवस्था के अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति तक नहीं पहुंच पाता। भारत में वित्तीय समावेशन के प्रयास ऐसे समुदाय तक पहुंचने के लिए है। तो क्या इस मार्ग पर चलकर...

वित्तीय समावेशन एक ऐसा मार्ग है जिस पर चलकर सरकारें अर्थव्यवस्था के अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति को मुख्यधारा में शामिल करने का प्रयास करती हैं। इसके द्वारा अपनी न्यूनतम आय में मूलभूत सुविधाएं भी न जुटा सकने वाले गरीब आदमी को अपनी आय से बचत करने के साथ-साथ विभिन्न वित्तीय उत्पादों में भविष्य के लिए सुरक्षित निवेश करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। विश्व की किसी भी लोककल्याणकारी व्यवस्था में वित्तीय समावेशन का अभाव होना, समाज और व्यक्ति दोनों के लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है।

यहां यह बात उल्लेखनीय है कि वित्तीय समावेशन के अभाव के परिणामस्वरूप बैंकों की सुविधा से वंचित लोग अनौपचारिक वित्तीय संस्थाओं से जुडऩे के लिए मजबूर हो जाते हैं। ऐसी संस्थाओं में जहां ब्याज दरें तो अधिक होती ही हैं साथ ही प्राप्त होने वाली राशि भी काफी कम होती है। कई मामलों में ऐसा भी देखने में आया है कि अनौपचारिक बैंकिंग ढांचे के कानून की परिधि से बाहर होने के चलते उधार देने वालों और उधार लेने वालों के बीच लेन-देन का कोई कानूनी आधार नहीं होता। विशेषकर ऐसे मामलों में उत्पन्न किसी भी विवाद का कानूनी तौर पर निपटान किया जाना संभव नहीं हो पाता। जहां तक सवाल सामाजिक लाभों के संबंध का है, यह भी देखा गया है कि वित्तीय समावेशन के फलस्वरूप उपलब्ध बचत राशि में निंरतर वृद्धि होती रहती है। इसके साथ ही वित्तीय मध्यस्थता की दक्षता में भी वृद्धि होती है तथा आने वाले समय में नए व्यावसायिक अवसर मिलने की सुविधा भी प्राप्त होती है।

वर्तमान परिपे्रक्ष्य में सरकार द्वारा प्रायोजित बैंकिंग प्रणाली सुलभ है। और, इसकी वजह से अधिक प्रतिस्पर्धी बैंकिंग परिवेश की तुलना में ग्रामीण क्षेत्रों में अधिक आर्थिक विविधीकरण हो पा रहा है। वर्ष 1980 और 1990 के दशकों में शुरू किए गए ढांचागत समायोजन कार्यक्रमों के परिणामस्वरूप वित्तीय बाजार में हुए आर्थिक सुधारों के लाभ अनेक विकासशील देशों तक पहुंचे। बीसवींं शताब्दी के आरंभ में भारत में बीमा कंपनियां और एक कार्यशील स्टॉक एक्सचेंज था। हैरत की बात है कि ये बीमा कंपिनयां व्यक्तिगत बीमा और संस्थागत बीमा जैसे साधारण कार्यों तक ही सीमित थीं। आज के दौर में वित्तीय समावेशन का कार्यक्षेत्र केवल बैंकिंग सेवाओं तक ही सीमित नहीं है बल्कि यह समान रूप से बीमा, इक्विटी उत्पादों और पेंशन उत्पादों आदि जैसी अन्य वित्तीय सेवाओं के संबंध में भी लागू होता है।

देखा जाए तो वित्तीय समावेशन का अर्थ सिर्फ बैंकिंग सेवा से वंचित किसी भी क्षेत्र में स्थित किसी शाखा में केवल बैंक खाता खोलने तक ही सीमित नहीं है। इससे एक ओर जहां समाज में कमजोर तबके के लोगों को उनके भविष्य तथा कष्ट के दिनों के लिए धन की बचत करने को प्रोत्साहित किया जाता है। साथ ही, विभिन्न वित्तीय उत्पादों जैसे कि बैंकिंग सेवाओं, बीमा और पेंशन उत्पादों आदि में सहभागिता कर देश के आर्थिक क्रियाकलापों से लाभ प्राप्त करने के लिए प्रेरित भी किया जाता है। वहीं दूसरी ओर इससे देश को पूंजी निर्माण की दर में वृद्धि करने में भी सहायता प्राप्त होती है। इसके फलस्वरूप देश के कोने-कोने से धन का मार्गीकरण कराकर अर्थव्यवस्था में आर्थिक क्रियाकलापों को भी संवर्धन प्राप्त होता है।

देश के जो लोग वित्तीय दृष्टि से मुख्यधारा में शामिल होने से वंचित रह गए हैं, वे प्राय: अपनी बचत भूमि, भवन और सर्राफा आदि जैसी अनुत्पादक आस्तियों में ही लगाते रहे हैं। जबकि वित्तीय दृष्टि से अर्थव्यवस्था की मुख्यधारा में शामिल हो चुके लोग ऋण सुविधाओं का आसानी से उपयोग कर सकते हैं, चाहे वे लोग संगठित क्षेत्र में काम कर रहे हों अथवा असंगठित क्षेत्र में, शहरी क्षेत्र में रहते हों अथवा ग्रामीण क्षेत्र में। इससे भी इनकार नहीं किया जा सकता कि सूक्ष्म वित्तीय संस्थाएं (एमएफआई) द्वारा गरीब लोगों को आसान एवं सस्ती ब्याज दरों पर ऋण उपलब्ध कराया जा रहा है और इस क्षेत्र में इन संस्थाओं की सफलताएं सराहनीय रही हैं। वित्तीय समावेशन का सबसे सराहनीय पहलू यह है कि इससे सरकार को सरकारी अनुदान उपलब्ध कराने में सरलता होती है। यही नहीं इससे सरकार को कल्याणकारी कार्यक्रमों में हेरा-फेरी पर भी रोक लगाने में मदद मिलती है।

इससे सरकार, उत्पादों पर अनुदान परोक्ष तौर पर देने के बजाय अनुदान की राशि को सीधे लाभार्थी के खाते में हस्तांतरित कर सकती है। वित्तीय समावेशन के लागू हो जाने के कारण सरकार को अनुदान के मद में लगभग 57,000 करोड़ रुपये से भी अधिक की राशि की बचत हुई है। इस तरह अनुदान उपलब्ध कराने का लाभ सीधे वास्तविक व्यक्ति तक पहुंचना सुनिश्चित हुआ है। वित्तीय समावेशन का मूल उद्देश्य है कि देश की गरीब जनता आर्थिक विकास से प्राप्त विधिक लाभों को प्राप्त कर सके और ऐसे लोग रोजगार आश्रित न रहकर रोजगार उपलब्ध कराने वाले बन सकें। साथ ही जनता से जुटाई गई निधियां जो पहले औपचारिक प्रक्रिया में शामिल नहीं थीं, उनको औपचारिक दायरे में लाने के प्रयास किए जा सके। उम्मीद है कि इन निधियों से देश की अर्थव्यवस्था को संबल प्राप्त होगा जिससे विकास का पथ और प्रशस्त हो सके।

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