विज्ञान वार्ता : इन्द्रियां घोड़े, मन लगाम

स्थूल शरीर को प्रेरणा सूक्ष्म व कारण शरीर से मिलती है। सारे क्रिया-कलापों, हाव-भावों की अभिव्यक्ति में इन्द्रियों की प्रधानता रहती है। इनके द्वारा हम बाहरी विषयों, रूप, रस, गंध, स्पर्श और शब्द को जान पाते हैं। साथ ही आन्तरिक विषयों, सुख-दु:ख, राग-द्वेष आदि को भी जान पाते हैं।

By: Gulab Kothari

Published: 30 Jan 2021, 06:27 AM IST

- गुलाब कोठारी

शरीर हमारे अस्तित्व का, हमारे होने का बोध कराता है। हमारी चेतना का वाहक है। यह हमारी अभिव्यक्ति का माध्यम है। स्थूल शरीर को प्रेरणा सूक्ष्म व कारण शरीर से मिलती है। सारे क्रिया-कलापों, हाव-भावों की अभिव्यक्ति में इन्द्रियों की प्रधानता रहती है। इनके द्वारा हम बाहरी विषयों, रूप, रस, गंध, स्पर्श और शब्द को जान पाते हैं। साथ ही आन्तरिक विषयों, सुख-दु:ख, राग-द्वेष आदि को भी जान पाते हैं। ज्ञानेन्द्रियों, कर्मेन्द्रियों तथा मन सहित ये इन्द्रियां ग्यारह हैं। आंख, नाक, कान, त्वचा तथा जिह्वा - ये पांच ज्ञानेन्द्रियां हैं। इनके द्वारा हम क्रमश: रूप, गंध, शब्द, स्पर्श तथा रस इन पांच विषयों को जान पाते हैं।

प्रत्येक ज्ञानेन्द्रिय का एक गुण होता है। उसी गुण से विषयों की उत्पत्ति होती है। आंख का विषय रूप है और गुण तेज है। सूर्य या अग्नि न हो तो आंखें बेकार हैं। कान का विषय शब्द तथा गुण आकाश है। नाक का विषय गन्ध और गुण पृथ्वी है। जीभ का विषय रस व गुण जल है। त्वचा का विषय स्पर्श और गुण वायु है। बिना ज्ञानेन्द्रियों के विषयों का ज्ञान असम्भव है। ज्ञानेन्द्रियां न होतीं तो न रूप था, न रस था, न गन्ध था, न स्पर्श था एवं न शब्द ज्ञान था। रूप आदि की सत्ता इन्द्रियों पर निर्भर है। हाथ, पैर, मुख, गुदा और उपस्थ-पांचों कर्मेन्द्रियां, कार्यों को करने की साधन हैं। मुख से भोजन ग्रहण तथा बोलने की क्रिया की जाती है। जिह्वा रसनेन्द्रिय है। यह कड़वा, मीठा, खट्टा, कसैला आदि स्वादों को जानने में सहायक है। हाथ से किसी भी वस्तु आदि का आदान-प्रदान करते हैं। अन्य समस्त कार्यों को करने में भी हाथ ही साधन बनते हैं। पैरों से हम गतिशील रहते हैं। उपस्थ से मूत्रादि तथा गुदा से मल तथा अपान वायु का विसर्जन होता है। इन्द्रियों के साथ जब विषय जुड़ते है तो इसे अनुगीता में आध्यात्मिक यज्ञ कहा गया है। पांच ज्ञानेन्द्रियों तथा पांच कर्मेन्द्रियों को 'होता' (हवन करने वाला) कहा है। शब्द आदि विषयों और वाणी आदि कर्मों को 'हविष्य' (हवन सामग्री) कहा गया है। यह आध्यात्मिक यज्ञ हमारे शरीर में निरन्तर चलता रहता है।

नाक-कान आदि सभी अपने-अपने विषयों को ही जान पाते हैं। इसी प्रकार हाथ-पैर आदि सभी अपने-अपने कर्मों को ही कर पाते हैं। कोई भी इन्द्रिय दूसरी इन्द्रिय का कार्य नहीं कर पाती। नाक से रूप का अनुभव नहीं हो सकता। आंख से रस का स्वाद नहीं ले सकते। कान से गन्ध ग्रहण नहीं कर सकते। जीभ अपनी शक्ति से स्पर्श का अनुभव नहीं कर सकती। त्वचा से शब्द नहीं सुने जा सकते।

मन को ग्यारहवीं इन्द्रिय कहा जाता है।

श्रोत्रं त्वक् चक्षुषी जिह्वा नासिका चैव पञ्चमी।
पायूपस्थं हस्तपादं वाक्चैव दशमी स्मृता।। मनुस्मृति 2.90
एकादशं मनो ज्ञेयं। मनुस्मृति 2.92

कर्मेन्द्रियों को कार्य करने की प्रेरणा ज्ञानेन्द्रियों से मिलती है। किन्तु कर्म की पूर्णता मन पर निर्भर है। मन में इच्छा होगी तो ही क्रिया होती है। मन एवं बुद्धि ज्ञानेन्द्रियों तथा कर्मेन्द्रियों के बीच नियामक का कार्य करते हैं। मन विषयों के साथ जुड़कर ही अपना स्वरूप प्रतिष्ठित कर पाता है। यह मन सदा किसी न किसी विषय से घिरा रहता है। मन अपने संकल्प से ही विषयों का अनुभव कर सकता है। यदि मन में से विषय निकल जाएं तो मन की सत्ता ही न रहे। मन सभी विषयों को जानने में समर्थ है। किन्तु सभी इन्द्रियों से वह श्रेष्ठ है, यह बात भी सही नहीं कही जा सकती। अनुगीता में मन और इन्द्रियों का संवाद आता है। मन ने इन्द्रियों से कहा - ''मेरी सहायता के बिना नासिका सूंघ नहीं सकती। जीभ स्वाद नहीं ले सकती। आंख देख नहीं सकती। त्वचा स्पर्श का अनुभव नहीं कर सकती। कानों को शब्द नहीं सुनायी दे सकता। इसलिये मैं सब भूतों में श्रेष्ठ और सनातन हूं। मेरे बिना समस्त इन्द्रियां बुझी लपटों वाली आग और सूने घर की भांति सदा श्रीहीन जान पड़ती हैं। मेरे बिना विषयों का अनुभव नहीं हो सकता।'' यह सुनकर इन्द्रियों ने मन से कहा कि आप भी हमारी सहायता के बिना विषयों का अनुभव नहीं कर सकते। हमारे न होने पर आप भी तृप्त नहीं रह सकते। सब प्रकार के भोगों को भोग नहीं सकते।

मन चंचल होता है, बलवान भी है। वह नियमों में नहीं बंधता। इन्द्रियां अपने-अपने गुणों के अनुरूप ही कार्य करती हैं और एक-दूसरे के गुणों को नहीं जानती। किन्तु इन्द्रियों के बिना मन किसी भी विषय को नहीं जान पाता। ज्ञान से मन में इच्छा पैदा होती है। मन 'बुझा' हो तो हर्ष आदि अनुभूतियां नहीं होती। अनुगीता में मन और इन्द्रियों के इस संवाद से यह स्पष्ट होता है कि ये दोनों ही अपनी-अपनी जगह श्रेष्ठ हैं। हमारे शरीर के संचालन में ये सभी आवश्यक हैं।

हमारा भौतिक शरीर अग्नि-सोम से मिलकर बना है। अग्नि-सोम को प्राण भी कहते हैं। इनसे इन्द्रियों का भी निर्माण होता है। इसलिए ग्यारह इन्द्रियों में रहने वाले निराकार प्राण को ही इन्द्रिय कहना उपयुक्त है। प्राण ही सभी विषयों तथा कार्यों में ज्ञानेन्द्रियों तथा कर्मेन्द्रियों के साथ रहता है। सूंघने के लिए प्राण नाक से जुड़ जाता है। स्पर्श क्रिया में त्वचा की सहायता करता है। प्राण एक समय में एक ही विषय का ग्रहण करने में इन्द्रिय विशेष का सहायक बनता है। एक इन्द्रिय के कार्य को समाप्त करके प्राण दूसरी इन्द्रिय का सहयोगी बनता है। यह क्रिया इतनी शीघ्र होती है कि प्राणों के इन्द्रियों से जुडऩे तथा अलग होने के समय का पता नहीं लग पाता।

आत्मा की विकास यात्रा की वाहक ये इन्द्रियां ज्ञान व कर्म के समन्वय को दर्शाती हैं। गीता भी ज्ञान व कर्म की ही व्याख्या है। ज्ञानेन्द्रियां ज्ञान की वाहक तथा कर्मेन्द्रियां कर्म करने वाली हैं। इन दोनों के समुचित विवेक से कर्मों को करने वाला मानव ब्रह्म की ओर अग्रसर हो पाता है। सांसारिक विषय-भोग मानव को अपनी ओर आकृष्ट करते हैं। यदि विवेक बुद्धि तथा नियंत्रित मन से उचित कर्मों को किया जाता है, तब ही ये इन्द्रियां सन्मार्ग पर प्रवृत्त हो पाती हैं। इसलिए कृष्ण कह रहे हैं-

तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत् मत्पर:।
वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता।। गीता 2.61

अर्थात्-उन सब इन्द्रियों को संयमित करके, योग से युक्त होकर मेरी शरण में आ जाओ। जिस पुरुष की इन्द्रियां वश में होती हैं, उसकी प्रज्ञा प्रतिष्ठित होती है।

इन्द्रियों के विषयों का घर मन है। यह मन अपार शक्ति वाला है। हम जागृत अवस्था में पैरों से चलकर एक स्थान से दूसरे स्थान पर जा पाते हैं। किन्तु मन सुप्तावस्था में भी निरन्तर गतिशील रहता है। कृष्ण कहते हैं कि मन को वश में करने से इन्द्रियां भी संयमित हो जाती हैं।

इन्द्रियों का संयम अध्यात्म की ओर जाने का मार्ग प्रशस्त करता है। आत्म विकास की साधना का मूल आधार इन्द्रियां ही हैं। कठोपनिषद् में इन्द्रियों को घोड़े बताया गया है। रथ में घोड़े कार्य करते वैसे ही शरीर में इन्द्रियां अपने विषयों का ग्रहण करती हैं। रथ के घोड़े लगाम से नियन्त्रित होकर चलते हैं। उसी तरह इन्द्रियां मन से नियन्त्रित होती हैं। मन को इन्द्रियरूपी घोड़ों की लगाम बताया गया है। मन सहित इन इन्द्रियों को वश में करने वाला ही इस विकास मार्ग पर चल सकता है।

इसलिए शिवसंकल्पसूक्त में मन के कल्याणकारी होने की प्रार्थना की गई है- तन्मेमन: शिवसंकल्पमस्तु।

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