चीन के मामले में हो दूरगामी स्थायी नीति

चीन की सोच और उसकी पूरी रणनीति को समझने वाले जानते हैं कि उसके लिए किसी समझौते का अर्थ केवल अपनी विस्तारवादी राष्ट्रीय हितों की पूर्ति करना है।

By: shailendra tiwari

Updated: 30 Jun 2020, 04:49 PM IST

अवधेश कुमार, वरिष्ठ पत्रकार एवं समीक्षक

एक ओर चीन गलवान घाटी में पूर्व स्थिति बहाल करने पर बनी सहमति व्यक्त कर रहा है और दूसरी ओर वहां से लेकर डेप्सांग तक में अपनी सैन्य उपस्थिति बढ़ा रहा है। इसमें हैरत की कोई बात नहीं। चीन की सोच और उसकी पूरी रणनीति को समझने वाले जानते हैं कि उसके लिए किसी समझौते का अर्थ केवल अपनी विस्तारवादी राष्ट्रीय हितों की पूर्ति करना है। इसलिए चीनी एप पर प्रतिबंधात्मक कार्रवाई के बीच यह मूल प्रश्न आज भी उसी तरह कायम है कि चीन से निपटा कैसे जाए? 1949 में कम्युनिस्ट क्रांति के साथ ही चीन की माओवादी साम्राज्यवादी कम्युनिज्म ने सभी पड़ोसी देशों के लिए समस्याएं पैदा करनी शुरु कर दी थी। 1962 के युद्ध के बाद से यह प्रश्न लगातार हम पर हथौड़ों की तरह प्रहार करता रहा है।

तंग शिआओ पिंग ने राजीव गांधी के साथ जिह स नीति की शुरुआत की उसका मूल यही था कि सीमा विवाद को अगली पीढ़ी के लिए छोड़कर हमें आपसी सहयोग को आगे बढ़ाना चाहिए। उसके बाद से शांति, विश्वास स्थापना तथा सीमा व्यवहार के समझौते होते गए। किंतु चीन ने कभी भारतीय भूमि पर न अपना दावा छोड़ा, न सीमा विवाद को सुलझाने की कोशिश की और न भारत को कमजोर और दबाव में रखने की नीति बदली। जो असभ्य और बर्बर खूनी जंग इस समय गलवान घाटी में हुआ है वैसे आगे कहीं कभी भी हो सकता है।


चीन के राष्ट्पति शि जिनपिंग स्वयं को जीवन भर का शासक बनाने के बाद माओ से आगे निकल जाने की कल्पना में चीन को विश्व पर दबदबा रखने वाली सबसे बड़ी आर्थिक और सामरिक महाशक्ति बनाने की योजना पर आगे बढ़ रहे हैं। भारत से तनाव के बीच हुए अपने तीन भाषणों में उन्होंने सेना से सीमा तथा आर्थिक हितों की रक्षा के लिए युद्ध की तैयारी की बात की है। चीन के विरुद्ध दूरगामी रणनीति बनाने और उस पर आगे बढ़ने के पहले शि के इस निजी और राजनीतिक लक्ष्यों को गहराई से समझना होगा। हमारा 43 हजार वर्ग किलोमीटर भूमि पर उसका कब्जा है। 14 नवंबर 1962 को समूची भूमि को वापस लेने का संसद का प्रस्ताव केवल कागजोें पर तो नहीं रहना चाहिए। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी कहा है कि संप्रभुता की रक्षा के लिए भारत प्रतिबद्ध है, हम जबसे उनको रोकने-टोकने लगे हैं तबसे उनकी परेशानियां बढ़ी हैं, लेकिन सैन्य लामबंदी जिसमें मिसाइल रक्षा प्रणाली तक शामिल है आदि की तैनाती का क्रम जारी है।


भारत ने सेना को वास्तविक नियंत्रण रेखा पर चीनी सैनिकों से अपने स्तर पर निपटने की खुली छूट दे दी है। खुली छूट का अर्थ है चीनी सैनिकों से जैसे चाहें निपटें। इसमें हथियार न चलाने की प्रतिबद्धता खत्म। यह बहुत बड़ा नीतिगत परिवर्तन है। थल सेना, वायुसेना और नौसेना हाई अलर्ट पर रहेंगे। हम लद्दाख के आसमान पर वायुसेना के हेलिकॉप्टरों और लड़ाकू विमानों तक को उड़ान भरते तथा गश्त करते देख सकते हैं। मिसाइल, टैंक सब तैनात की दिया गया है। लद्दाख से अरुणाचल प्रदेश तक फैली 3488 किमी लंबी एलएसी पर, जिसमें गलवान घाटी के अलाव दौलत बेग ओल्डी, चुशूल और डेपसांग इलाके शामिल हैं, उनमें अपने सैनिकों की तैनाती की संख्या बढ़ा दी है। नौसेना ने हिंद महासागर क्षेत्र में अपनी सतर्कता बढ़ा दी है जहां चीनी नौसेना की नियमित तौर पर गतिविधियां होती हैं।


इस तरह सैन्य स्तर पर युद्ध की अवस्था से पहले की स्थिति कायम कर दी गई है। इससे चीन को सीधा संदेश गया है। किंतु आक्रोश जितना हो मुकाबला करने के लिए शांति और संतुलन के साथ दूरगामी स्थायी नीति की आवश्यकता है। सैन्य लामबंदी तत्काल आवश्यक इसलिए है ताकि चीन को लगे कि भारत अब जैसे को तैसा सैन्य व्यवहार के लिए पूरी तरह तैयार है। चीन द्वारा गलवान घाटी पर लगातार अपना दावा करने के बाद भारत ने साफ कर दिया था कि आपको पीछे जाना ही होगा। तो यह समस्या का समाधान नहीं है। सैन्य मोर्चा के साथ हमें चीन संबंधी अपनी पूरी नीति को नए सिरे से निर्धारित करने की जरुरत है। तो और क्या किया जाए?


जैसे हम जम्मू कश्मीर वाले पाकिस्तानी भाग को पाक अधिकृत कश्मीर कहते हैं उसी तरह अक्साई चिन को चीन अधिकृत लद्दाख कहना शुरु करें। इससे एक अलग भाव पैदा होता है तथा संदेश जाएगा कि भारत इसे वापस लेने की कार्रवाई आज न कल करेगा। चीन कभी हमारा पड़ोसी नहीं था। हमारा पड़ोसी तिब्बत था। 1951 में चीन ने उसे हड़प लिया। 1959 में तिब्बती धर्मगुरु तथा वहां के शासक दलाई लामा को भारत में शरण लेनी पड़ी। सवाल है कि हमने दलाई लामा और तिब्बतियों को शरण क्यों दिया? भारत खुलकर तिब्बत की आजादी का समर्थन करे। अमेरिका, यूरोप और एशिया में भी जापान, दक्षिण कोरिया जैसे देश तिब्बत पर चीन की नीति के विरुद्ध हैं, दलाई लामा को देशों ने उच्चतम पुरस्कार दिए हैं, तिब्बत के पक्ष में संसदों में प्रस्ताव तक पारित हुए हैं। किंतु यह मसला भारत का है और इसे ही मुखर होना होगा।

भारत चीन सीमा नाम की कोई चीज नहीं है, भारत तिब्बत सीमा है। तो इसका यही नामकरण कर दिया जाए। धर्मशाला में तिब्बत की निर्वासित सरकार को मान्यता दिया जाए तथा भारत अन्य देशों को भी इसके लिए तैयार करे। दलाई लामा की हैसियत बढ़ाए। बौद्धों के तीन धर्मगुरुओं में से दो भारत में हैं और हम पता नहीं क्यांे इनका लाभ नहीं उठाते। मोदी ने बौद्ध कूटनीति में बौद्ध धर्म मानने वाले देशों से संबंध भावनात्मक स्तर पर लाने का जो प्रयास किया वह सही था और उसे विस्तार और सुदृढ़ करने की जरुरत है। इसके साथ भारत ताइवान को स्वतंत्र देश की मान्यता दे। साथ ही चीन द्वारा हड़पे गए पूर्वी तुर्कीस्तान, दक्षिणी मंगोलिया की आजादी का समर्थन करे, हांगकांग और मकाउ के लोगों के संघर्ष में साथ होने का ऐलान किया जाए। यह सब चीन की दुखती नस है। इनके नागरिकों को हम अपने यहां आने के लिए वीजा का प्रावधान खत्म करें।


कहने का तात्पर्य यह कि चीन के संदर्भ में समूची विदेश नीति में आमूल परिवर्तन किया जाए एवं सघन कूटनीति हो। चीन की सीमा 14 देशों से लगती है और अपनी विस्तारवादी महत्वाकांक्षा में इसने 23 देशों के साथ सीमा विवाद पैदा कर लिया है। जापान के साथ तो उसका समुद्री सीमा विवाद काफी तीखा हो चुका है। दक्षिणी चीन सागर पर दावों के कारण इंडोनेशिया, चीन, फिलीपींस, वियतनाम, मलेशिया, ताइवान और ब्रुनेई से उसका तनाव है। भारत आगे बढ़कर इन सारे देशों को साथ ले एवं चीन को घेरने के लिए आगे बढ़े। चीन दुनिया का अकेला देश है जिसका आज कोई मित्र और विश्वसनीय साथी नहीं है। इसके विपरीत भारत के मित्र एवं सामरिक साझेदार देशों की संख्या दुनिया में सबसे ज्यादा है। हिन्द महासागर और प्रशांत क्षेत्र के ज्यादातर देशों के साथ हमारा रक्षा सहयोग समझौता हो चुका है और वे सब चीन से सशंकित हैं। चीन के खिलाफ घेरेबंदी के लिए इस पर तेजी से आगे बढ़ने की जरुरत है। आखिर हम हिन्द प्रशांत क्षेत्र में जापान, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका के साथ मालाबार सैन्य अभ्यास क्यों करते हैं? इसका लाभ तो उठाएं।


इसके साथ आता है चीन को आर्थिक रुप से धक्का देने का प्रश्न। भारत से चीन को व्यापार में करीब 50 अरब डॉलर का लाभ पिछले वर्ष हुआ है। इस समय चीनी सामग्रियों के बहिष्कार का माहौल है। बेशक, औषधियों के लिए कच्चा माल से लेकर ऐसी अनेक सामग्रिंयों के लिए हम उस पर निर्भर हैं, इसलिए एकबारगी सब पर शुल्क बढ़ाना या आयात रोक देना राष्ट्रीय हित में नहीं होगा। हमारे यहां अनेक स्टार्टअप में उसने निवेश किया हुआ है जिसका रास्ता तलाशना है। किंतु अन्य अनेक सामग्रियां हैं जिनको रोका जा सकता है। जहां तक इलेक्ट्रोनिक सामग्रियों तथा नई संचार तकनीक का प्रश्न है हम स्वयं इसमें सक्षम होने की कोशिश करें। ताइवान, जापान, दक्षिण कोरिया जैसे इन मामलों में अग्रणी देशों का सहयोग लेकर 5 जी के हयुवाई कंपनी को रोक सकते हैं। कोरोना वायरस में संदिग्ध भूमिका के कारण चीन के साथ आर्थिक संबंध कमजोर करने का भाव पूरी दुनिया में है। अमेरिका के बाद कई देश उसकी सामग्रियों पर शुल्क बढ़ाने से लेकर दण्डात्मक कार्रवाई करने पर विचार कर रहे हैं। अनेक देशों की कंपनियों ने वहां से बोरिया बिस्तर समेटने का ऐलान किया है जिसका लाभ उठाते हुए भारत को इस भावना को आगे बढ़ाना चाहिए।


इस तरह कठोर, मुखर और दूरगामी रणनीतियों के साथ भारत आगे बढ़े तो चीन को समुचित जवाब मिलेगा एवं शि का दुनिया का सर्वोच्च महाशक्ति का शासक होने तथा सभी पड़ोसियों को दबदबे में रखने का सपना ध्वस्त हो सकेगा। पूरे देश को लंबे समय के लिए धैर्य के साथ एकजुट होकर तात्कालिक क्षति, परेशानियों को झेलते हुए विजय और लक्ष्य प्राप्ति के संकल्प के साथ आगे बढ़ना होगा। क्या हम इसके लिए तैयार हैं?

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