जीत के बाद भी हारा हुआ दिया गया था करार, अब टोक्यो में पदक लाने के लिए विकास हैं बेकरार

| Publish: Nov, 24 2017 12:38:13 PM (IST) | Updated: Nov, 24 2017 12:39:30 PM (IST) अन्य खेल

आइए जानते है विकास की संघर्षगाथा और करियर ग्राफ को इस कहानी के माध्यम से।

नई दिल्ली। "बॉक्सर उस चिड़िया की तरह होता है, जिसे पिंजरे से निकलने के बाद भी आजादी अच्छी नहीं लगती।" ये कहना है भारतीय मुक्केबाज विकास कृष्ण यादव का। यादव के ये बोल यह बताने को काफी है कि किसी खिलाड़ी के जीवन में खेल का कितना बड़ा महत्व होता है। खेल चाहे कोई भी हो, किसी भी खिलाड़ी के सामने चाहे कितनी भी उल्ट परिस्थिति आ गई हो, लेकिन खेल छोड़ने के बाद वह बंदा बिन पानी की मछली जैसा हो जाता है। आखिर ऐसी क्या बात थी कि दो बार ओलंपिक में भारत का झंडा बुलंद कर चुके खेल चुके विकास कृष्ण यादव को ये बात कहनी पड़ी? यादव के साथ ऐसी क्या घटना घटी उन्हें खेल से दूर होने का कठिन निर्णय लेना पड़ा? आइए जानते है विकास की संघर्षगाथा और करियर ग्राफ को इस कहानी के माध्यम से।

vikas krishnan yadavs Conflict and Career struggle

हरियाणा के हिसार से है विकास का ताल्लुक
विकास कृष्ण यादव का ताल्लुक हरियाणा के हिसार से है। जहां की सिंगवा खास गांव में 10 फरबरी 1992 को उनका जन्म हुआ था। गांव में एक मध्यमवर्गीय परिवार में जन्में विकास का बचपन भी आम बच्चों की तरह ही बीता। पिता बिजली विभाग में सरकारी मुलाजिम थे। एक निश्चित आय के सहारे विकास का परिवार आगे बढ़ रहा था। साल 1994 में विकास के पिता का तबादला भिवानी जिले में हो गया और विकास भी पिता के साथ भिवानी आ गए। जहां विकास की प्राथमिक शिक्षा-दीक्षा हुई। पढ़ाई के साथ-साथ विकास को बचपन से ही खेलों के प्रति आकर्षण था।

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10 साल की उम्र में शुरू किया बॉक्सिंग सीखना
विकास जब महज 10 साल के थे, तभी से बॉक्सिंग का जुनून उनपर सवार था। वे साल 2003 से ही भिवानी बॉक्सिंग क्लब में जाना शुरू कर चुके थे। बाद में उन्होंने अपनी बॉक्सिंग की ट्रेनिंग आर्मी स्पोर्ट्स स्कूल पुणे से की। जहां वे वो एक परिपक्व मुक्केबाज के तौर पर उभरे। विकास को शुरुआती सफलता तो मिल रही थी। लेकिन तब तक वो सुर्खियों में नहीं आए थे। विकास ने स्थानीय स्तर के कई मुकाबलों में जीत दर्ज करते हुए साल 2010 में बड़ा कारनामा किया। जो उन्हें रातोरात स्टार बना गया।

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यूथ बॉक्सिंग में लहराया परचम
विकास ने साल 2010 में हुए एशियाई यूथ बॉक्सिंग में अपना परचम लहराया। ईरान की तेहरान में हुए इस प्रतियोगिता में विकास ने अपने सभी मुकाबलों में जीत दर्ज करते हुए गोल्ड पर कब्जा किया। यह विकास का पहला इंटरनेशनल मेडल था। फाइनल में मिली जीत के बाद विकास बॉक्सिंग के स्टार बन गए। अब पहला पदक जीतने के बाद विकास कहां रुकने वाले थे। विकास ने एक-एक कर कई पदकों को अपनी झोली में डाला।

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पदकों की लगाई झड़ी
साल 2010 विकास के लिए काफी अच्छा साबित हुआ। यूथ लेवल पर पदक जीतने के बाद विकास ने भारत के लिए एशियाई खेल में भी लाइट वेट कैटगरी में स्वर्ण पदक जीता। इसके बाद सिंगापुर में हुए युवा ग्रीष्मकालीन ओलंपिक में उन्होंने लाइट वेट केटेगरी के सेमीफइनल में लिथुआनिया के पेट्रोस्कास के हाथो हार कर कांस्य पदक जीता। 2010 बाकू में हुए विश्व बॉक्सिंग चैंपियनशिप में लाइट वेट केटेगरी में उनका सामना एक बार फिर लिथुआनिया के पेट्रोस्कास से हुआ। इस बार विकास अपना पिछला हिसाब चुकाने में कामयाब रहे। यहां विकास ने पेट्रोस्कास को हराते हुए गोल्ड मेडल पर अपना कब्जा किया। 2010 में ही चीन में हुए एशियाई खेलो में लाइट वेट केटेगरी में चीन के हु किंग को 5-4 से हरा कर स्वर्ण पदक अपने नाम किया। इसके बाद 2011 में विश्व बॉक्सिंग चैंपियनशिप के वेल्टरवेट केटेगरी में कांस्य पदक जीता।

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2012 में आया खराब दौर
साल 2012 विकास के लिए खराब साबित हुआ। वे 2012 लंदन ओलंपिक में बेहतर प्रदर्शन करने के बाद भी आगे बढ़ पाने में नाकाम रहे। लंदन ओलंपिक में विकास ने अमरीकी मुक्केबाज को अपने जोरदार पंचों से चित किया था। मुकाबले के बाद उन्हें विजेता भी घोषित किया गया। लेकिन कुछ ही देर के बाद विकास के विरोधी को विजेता घोषित किया गया। इस फैसले के खिलाफ विकास ने अपील भी की। लेकिन उनकी बात सुनी नहीं गई। उल्टे विकास को बॉक्सिंग से बैन कर दिया गया। जिसके बाद वे बॉक्सिंग से दूर होते गए। विकास के लिए बुरे वक्त का ये दौर करीब डेढ़ साल तक रहा। इस बीच में विकास ने पढ़ाई में ध्यान केंद्रित किया और कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी से उन्होंने अपनी पढ़ाई पूरी की। साथ ही पुलिस की नौकरी की तैयारी शुरू कर दी। विकास की उपलब्धियों को देखते हुए उन्हें हरियाणापूलिस में डीएसपी बनाया गया। इसी पद पर वे आज भी काम कर रहे हैं।

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रियो ओलंपिक में की वापसी
बॉक्सिंग से लगभग 18 महीने की दूरी के बाद विकास को इस बात का अहसास हुआ कि वे खेल से ज्यादा दिनों तक खेल से खुद को दूर नहीं रख सकते है। इस कारण विकास ने रियो ओलंपिक से पहले एक बार फिर जोरदार वापसी की। वे रियो के लिए चयनित भी हुए। जहां 75 किग्रा मिडिलवेट कैटेगिरी के उनका सफर प्री-क्वार्टर फाइनल तक का रहा। विकास ने रियो ओलंपिक में तुर्की के मुक्केबाज ओंडर सिपाल 3-0 से मात दी थी।

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आइबा ने बेस्ट बॉक्सर चुना
भारत के लिए दो बार ओलंपिक में हिस्सेदारी कर चुके पूर्व एशियन गेम्स गोल्ड मेडेलिस्ट मुक्केबाज विकास कृष्ण यादव को आइबा ने 'बेस्ट बॉक्सर' का पुरस्कार भी दिया है। एमेच्योर बॉक्सिंग में यह अवॉर्ड पाने वाले विकास भारत के पहले मुक्केबाज हैं यानि उन्होंने वह कारनामा कर दिया है, जो बीजिंग ओलंपिक के कांस्य पदक विजेता मुक्केबाज विजेंदर सिंह समेत कोई अन्य भारतीय मुक्केबाज नहीं कर पाया। विकास को भी आइबा ने अपनी 70वीं वर्षगांठ के मौके पर आयोजित समारोह में सम्मानित किया था।

 

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टोक्यो ओलंपिक की तैयारी जारी
अभी विकास नौकरी के साथ-साथ अपनी तैयारी भी कर रहे है। विकास का पूरा ध्यान टोक्यो ओलंपिक पर क्रेदिंत है। विकास टोक्यो में देश के लिए पदक जीतना चाहते हैं। साथ ही विकास खेल की दुनिया में आने वाले युवाओं को नशा से दूर रहने की सलाह दे रहे हैं। विकास का कहना है कि नशा से दूर रहते हुए आप अगर लगातार मेहनत कर रहे है तो आप देश के लिए पदक ला सकते है।

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