उत्तराखंड, कर्नाटक और अब गुजरात... भाजपा ने अब तक इन राज्यों में बदले मुख्यमंत्री, जानिए इसके पीछे का गणित

भाजपा में मुख्यमंत्री बदलने की परंपरा नई नहीं है वरन कई दशकों से चली आ रही है। कई बार पार्टी को इसका लाभ हुआ और कई बार हानि भी उठानी पड़ी है।

By: सुनील शर्मा

Updated: 11 Sep 2021, 06:20 PM IST

नई दिल्ली। भाजपा शासित राज्यों में यदि पिछले कुछ समय की घटनाओं को देखा जाए तो हम पाते हैं कि मुख्यमंत्रियों को बदला जा रहा है फिर चाहे वो उत्तराखंड हो, कर्नाटक हो या फिर गुजरात। भाजपा में मुख्यमंत्री बदलने की परंपरा नई नहीं है वरन कई दशकों से चली आ रही है। कई बार पार्टी को इसका लाभ हुआ और कई बार हानि भी उठानी पड़ी है। आइए जानते हैं ऐसे ही कुछ किस्सों के बारे में जब भाजपा ने चुनावी फायदा उठाने के लिए अपने मुख्यमंत्रियों को बदला।

गुजरात में मुख्यमंत्री बदलने से मिला पार्टी को फायदा
इसी तरह गुजरात में भी भाजपा ने इस प्रयोग को दोहराया। वर्ष 1998 में हुए आम चुनावों में भाजपा ने बहुमत हासिल कर केशुभाई पटेल को मुख्यमंत्री बनाया परन्तु पार्टी के अंदरूनी कारणों की वजह से उन्हें 2001 में हटा कर नरेन्द्र मोदी को मुख्यमंत्री बनाया गया। पार्टी का यह कदम अच्छा साबित हुआ और उसके बाद गुजरात में आज तक बहुमत से भाजपा की सरकार बनती चली आ रही है हालांकि इसका काफी कुछ श्रेय गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री और भारत के वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को जाता है।

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वर्ष 2014 में नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद एक बार फिर गुजरात में उथल-पुथल हुई और आनंदीबेन को मुख्यमंत्री बनाया गया परन्तु उनके खिलाफ हो रहे असंतोष को देखते हुए विजय रूपाणी को सीएम बनाया गया और उन्हीं के नेतृत्व में चुनाव लड़ा गया जिसमें पार्टी ने फिर एक बार बहुमत हासिल किया। हालांकि आज उन्होंने भी अपना इस्तीफा दे दिया और अब जल्दी ही पार्टी मुख्यमंत्री पद के लिए किसी नए चेहरे को सामने लाएगी। माना जा रहा है कि ऐसा आने वाले विधानसभा चुनावों को देखते हुए किया गया है। हालांकि इसका फायदा होगा या नुकसान, यह आने वाले समय में ही पता चलेगा।

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उत्तराखंड में पार्टी ने चार महीने में बदले 3 मुख्यमंत्री
उत्तराखंड संभवतया देश का पहला ऐसा राज्य होगा जहां एक ही पार्टी का बहुमत होते हुए भी चार महीनों में 3 मुख्यमंत्री बदले गए। सबसे पहले त्रिवेंद सिंह रावत सीएम बने परन्तु पार्टी के अंतर्विरोधों के कारण उन्हें हटा कर तीरथ सिंह रावत को लाया गया। वह केवल 115 दिन ही मुख्यमंत्री रह सके और संवैधानिक बाध्यता का बहाना लेकर युवा नेता पुष्कर सिंह धामी को मुख्यमंत्री बनाया गया और अगला विधानसभा चुनाव भी उन्हीं के नेतृत्व में लड़ने का निर्णय लिया गया।

कर्नाटक में भी बदले गए 3 मुख्यमंत्री
वर्ष 2008 में हुआ विधानसभा चुनावों में भाजपा को बहुमत मिला और बी.एस. येदियुरप्पा मुख्यमंत्री बनाए गए। वह अपने पद पर 3 वर्ष 67 दिन तक रहे, इसके बाद डी.वी. सदानंद गौड़ा को लाया गया। वह एक वर्ष से कुछ कम समय के लिए मुख्यमंत्री रहे और उनकी जगह जगदीश शेट्टर को लाया गया हालांकि तीन बार मुख्यमंत्री बदलने की पार्टी की इस योजना ने काम नहीं किया और पार्टी को अगले विधानसभा चुनावों में हार का मुंह देखना पड़ा। इसके बाद वर्ष 2018 के विधानसभा चुनाव में एक बार फिर येदियुरप्पा मुख्यमंत्री बने। यह सरकार जोड़-तोड़ की थी जिसमें कुछ समय एच.डी. कुमारस्वामी भी सीएम पद पर रहे। वर्ष 2019 में येदियुरप्पा फिर सत्ता में लौटे और दो वर्ष के बाद इसी वर्ष जुलाई में उन्हें हटा कर बसवराज बोम्मई को मुख्यमंत्री पद पर लाया गया। इस बार भी मुख्यमंत्री बदलने के पीछे कारण चुनाव में बढ़त लेना ही है हालांकि अंतिम परिणाम तो विधानसभा चुनाव के बाद ही पता लगेगा।

मध्यप्रदेश में भी बदले गए 3 मुख्यमंत्री, पार्टी को मिला फायदा
राज्य में दिग्विजय सिंह के नेतृत्व में वर्ष 2003 का विधानसभा चुनाव लड़ा गया और सत्ता विरोधी लहर के चलते कांग्रेस को चुनाव हारना पड़ा। बहुमत हासिल करने के बाद भाजपा ने उमा भारती के नेतृत्व में मध्यप्रदेश में सरकार बनाई। इसके बाद 2004 में उमा भारती को हटा कर बाबूलाल गौड़ को मुख्यमंत्री बनाया गया परन्तु वह लंबे समय तक नहीं टिके और नवंबर 2005 में शिवराज सिंह चौहान को मुख्यमंत्री बनाया गया। इस तरह एक ही टर्म में तीन मुख्यमंत्री बनाए गए। शिवराज सिंह का मुख्यमंत्री बनना पार्टी के लिए सौभाग्यशाली रहा और उन्होंने लगातार अगले दो विधानसभा चुनावों में पार्टी को बहुमत दिलाया।

राजस्थान में भी हुआ था प्रयास
वर्ष 2019 में राज्य में होने वाले आम विधानसभा चुनाव के पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को हटा कर किसी नए नाम को लाने की बात चल रही थी परन्तु किन्हीं कारणों से ऐसा नहीं हो सका और वसुंधरा के नेतृत्व में ही विधानसभा चुनाव लड़ा गया हालांकि इस चुनाव में कांग्रेस को एकतरफा बहुमत मिला और भाजपा को सत्ता गंवानी पड़ी।

सबसे पहले दिल्ली में किया गया था एक्सपेरिमेंट
वर्ष 1993 में दिल्ली विधानसभा चुनावों में भाजपा ने बहुमत हासिल कर सरकार बनाई। मदन लाल खुराना दिल्ली के मुख्यमंत्री बने परन्तु जैन हवाला कांड में नाम आने पर पार्टी की छवि बचाने के लिए उन्हें हटा कर साहब सिंह वर्मा को सीएम बनाया गया। किन्हीं कारणों के चलते उन्हें भी हटा कर सुषमा स्वराज को मुख्यमंत्री बनाया गया परन्तु फिर भी भाजपा अगले विधानसभा चुनाव नहीं जीत सकी।

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