एमबीबीएस की डिग्री लेते ही पहली बार 2 फीमेल डॉक्टर ने चुना फॉरेंसिक विभाग, कर रहीं पोस्टमार्टम

- डॉ. कीर्ति अग्रवाल और डॉ. वर्तिका सिंह ने कहा- हमने स्वेच्छा से चुना विषय .
- कॉलेज के 57 साल के इतिहास में एमबीबीएस के बाद पोस्टमार्टम करने वालीं ये पहली डॉक्टर .

 

By: Bhupesh Tripathi

Published: 18 Oct 2020, 09:57 PM IST

रायपुर. मेडिकल कॉलेजों के फॉरेंसिक मेडिसीन विभाग में मेल डॉक्टर तक नौकरी नहीं करना चाहते, ऐसे में फीमेल डॉक्टर की बात ही छोड़ दीजिए। क्योंकि पोस्टमार्टम करने सड़ी-गली लाशों के बीच 8-8 घंटे गुजारने पड़ते हैं। इनकी रिपोर्ट पर अदालत निर्णय सुनाती है। इन्हें कोर्ट के समन पर पेशी में जाना पड़ता है। ऐसे में हर डॉक्टर सोचता है कि वह बैठे-बैठाए ये मुसीबतें उठाए। मगर, पं. जवाहरलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस की पढ़ाई पूरी करने वाली 2 छात्राएं, जो अब जूनियर रेसीडेंट (डॉक्टर) हैं, इन्होंने 2 साल के सरकारी बॉंड के तहत स्वेच्छा से फॉरेंसिक मेडिसीन विभाग में पोस्टिंग ली। वे रोजाना 3-4 पोस्टमार्टम कर रही हैं।

बदलाव की नई इबारत लिखने वाली छात्राएं (जूनियर रेसीडेंट) हैं डॉ. कीर्ति अग्रवाल और डॉ. वर्तिका सिंह। 'पत्रिका' से बातचीत में डॉ. कीर्ति ने कहा कि मैं चाहती तो दूसरे विभाग के लिए भी आवेदन कर सकती थी। मगर, मुझे फॉरेंसिक मेडिसीन विभाग पसंद है। वहीं डॉ. वर्तिका कहती हैं कि मैं पीजी एग्जाम दूंगी। अगर, मेरी रैंक पर फॉरेंसिक विभाग मिलेगा तो जरूर लूंगी। विभाग के मेडिकल ऑफिसर डॉ. एसएन मांझी बताते हैं कि दोनों डॉक्टर पूरी लगन से ड्यूटी कर रहीं हैं।

डॉक्टरों की कमी से जूझ रहा विभाग
इन 2 फीमेल डॉक्टरों की नियुक्तियों से विभाग ने राहत की बड़ी सांस ली है क्योंकि इस विभाग में डॉक्टरों की भारी कमी है। इन्हें निकाल दें तो विभागाध्यक्ष समेत 4 डॉक्टर रह जाते हैं। जिन्हें दिन में 15-17 पीएम करने होते हैं। कई बार तो एक डॉक्टर को ही सारे पोस्टमार्टम करने पड़ जाते हैं।

छात्रा ने उठाई फॉरेंसिक मेडिसीन की सीट
छत्तीसगढ़ इंस्टीट्यूट फॉर मेडिकल साइंसेस (सिम्स) बिलासपुर में फॉरेंसिक मेडिसीन विभाग में 2 पीजी सीट हैं, पर ये खाली रह जाती थी। सत्र 2019-20 में एक छात्रा ने इस सीट पर दाखिला लिया।

इन कारणों से कोई नहीं आता इस विभाग में
प्राइवेट प्रैक्टिस नहीं- पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टर प्राइवेट प्रैक्टिस नहीं करते क्योंकि उनके पास समय नहीं होता। ऐसी कहा जाता है कि मरीज भी आना पसंद नहीं करते। इस नौकरी में पैसा नहीं है, जैसा- सर्जरी, मेडिसीन, रेडियोडायग्नोसिस, रेडियोथैरेपी, एनिस्थिसिया विशेषज्ञों के पास होता है।

कोर्ट के चक्कर- डॉक्टर को एमएलसी केस में बयान देने के लिए कोर्ट के चक्कर काटने होते हैं। खुद व परिवार के लिए समय नहीं मिलता है।

सम्मान नहीं- फॉरेंसिक मेडिसीन विभाग के डॉक्टर मानते हैं कि बाकी विभागों के डॉक्टरों को जितना सम्मान मिलता है, उन्हें उतना नहीं मिलता।

ऐसी धारणा तोडऩी है कि फॉरेंसिक मेडिसीन विभाग में लेडी डॉक्टर काम नहीं कर सकती है। मैं तो कर रही हूं। और हमें जूनियर रेसीडेंट के तौर पर 2 डॉक्टर मिली हैं। ये बखूबी अपनी ड्यूटी निभा रही हैं।
डॉ. स्निग्धा जैन, विभागाध्यक्ष, फॉरेंसिक मेडिसिन, पं. जेएनएम मेडिकल कॉलेज रायपुर

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