‘राम भजन’ पाय के पांच गुन

आस्था

By: Gulal Verma

Published: 19 Apr 2021, 04:55 PM IST

जब ले अयोध्या म राम मंदिर बने के रद्दा खुलिस तब ले पूरा देस ह अउ जादा राममय हो गे हावय। फेर, चाहे कोनों उदिम ले रद्दा खुले, राजनीति, आस्था, सरद्धा, आंदोलन। राम सबके उद्धार करथे। जउन राम नाम के सहारा ले के आगू बढ़थे वोला मन माफिल फल मिलते। राम के सहारा ले सुगरीव, विभीसन राज पाइन। काबर कि त्रेता म घलो राज पाय बर राजनीति होइस अउ राम ल चउदा बच्छर वनवास देय गिस। भले संत भरतजी ह राम के नाव के राज पाठ ल तियाग के वोकर कहना मान के चउदा बच्छर तक बेवस्था ल देखिस। राम सबके तारनहार हरय। जउन मनखे राम नाव के सुमिरन, भजन पबरितमन ले करथे वोकर सहायता राम के संगे-संग हनुमान घलो करथे। जेन छलकपट करके वोकर नाव जपथे वोला भगवान राम कभु नइ भावय। रामचरित मानस म तुलसीदास बाबा लिखथे- मोहि कपट छल छिद्र न भावा।
ये संसार म अइसे नइये कि सबेझन राम के भजन करत हे। कतकोझन तो राम नाव लेवय घलो नइ। दूसर धरम के तो छोड़ जउनमन अपन ल हिन्दू कहिथे वहूमन दिन म पांच मिनट नइ नाव ले सकय अउ दुखी पीडि़त जिनगी बिताथे। हमर सास्त्र म बताय हे कि जउन राम नाव नइ लेवय वोकर नास हो जाथे। रावन, अछय, मेघनाथ, कुंभकरन सही कतको नाव हवय। मरे बखत घलो जुन राम के नाव लेथंय वोला राम अपन परमधाम म ठउर दे देथे। जइसे बाली, मारीच ल देइस। संतमन एकरो कारन बताथे कि मनखे काबर भजन कीरतन नाव सुमिरन, जाप नइ कर सकय।
जउन मनखे नरक के मोहाटी जाय के रद्दा धर ले रहिथे, वोहा राम भजन नइ कर सकय। कामी, करोधी, लोभी मनखे के मन म छलकपट रहिथे। ऐकर सेती वोकरमन म राम के नाव नइ आवय। बाबा तुलसीदास कहिथे- काम, करोध, मद, लोभ सब नाथ नरक के पंथ। अउ होही भजन नहिं तामस देहा। गुस्सेलहा मनखे ह तो रामभजन करेच नइ सकय। अइसने जउन मनखे म ये पांच गुन नइ होवय वोहा राम नाव नइ ले सकय, रामभजन नइ करय। पहिली गुन विवेक, आज मनखे बडक़ा बडक़ा डिगरीधर के, बडक़- बडक़ा बूता करत हे। फेर, जेन म विवेक नइहे वोहा रामभजन नइ कर सकय। कहे जाथे कि रावन महापंडित महागियानी, बुद्धिमान, महाधनी, महाबली रहिस, फेर वोकर मेर विवेक के कमती रहिस। तभे वो राम नाव नइ लेइस। विभीसना ह राम नाव लेइस अउ राजपद पाइस।
दूसर गुन बिसवास। जउन मनखे के मन म सरद्धा अउ बिसवास कमती होथे वोहा घलो राम भजन नइ कर सकय। गुरु ह जउन नाव मंत्र अउ भजन दे हवय वोमा बिसवास राख के नाव जाप करना चाही। फेर, आज के मनखे ह दाई-ददा अउ गुरु के कहना ल कहां मानते। रावन ल घलो कतकोझन बताइन फेर वो उंकर ऊपर बिसवास नइ करिस अउ अपन कुल के नास करा डरिस। बाबाजी लिखथे-मातु पिता गुरु विप्र न मानहि, आपु गए अरु घालहिं आनि। कलजुग के मनखे ल रामभजन पाय बर बाबा तुलसीदास ह लिखे हे- ‘कलजुग सम आन नहिं जो कर नर विस्वास।
गाइ राम गुण गण विमल भव तर बिनहिं प्रयाय।’
तीसर गुन संयमी धीरजवान। जउन मनखे के मन म संयम नइ रखय वहू ह राम नाव नइ ले सकय। इंदरी के संयम सबले जादा रहिथे। मन म संयम। काम, करोध, लोभ म संयम राखथे उही रामभजन कर सकथे। खाय- पिये म संयम, देखे-सुने म संयम, पहिरे ओढ़े म संयम रखे बर चाही। दूसर के धन बर लालच, दूसर के बहिनी, बेटी, नारी बर गलत नजर राखथे वो भजन नइ कर सकय। रावन के मन म ऐकरे सेती घलो राम नाव नइ आइस। ‘परद्रोही परदार रत, परधन पर अपवाद। ते नर पांवर पापमय देह धरे मनुजाद।’
चौथा गुन सद्भावना होथे, जेन मनखे के हिरदे म सद्भावना नइ रहय वोहा घलो रामभजन नइ कर सकय अउ कोनों भजन करत रहिथे वोकर ले कइराहा, बइरीपन करइया मनखे घलो राम नाव नइ ले सकय। दया, करुना के भाव जेकर मन म होथे उही राम के नाव लेथे। रिसि मुनिमन यग्य हवन करत नाव जाप करे वोकरमन ले रावन ह बैर राखय अउ मार देवय तेकर सेती वो राम नाव नइ ले सकय।
आखिर अउ पांचवा गुन आवय पवित्रता, जउन मनखेमन वचन अउ करम ले पबरित नइ हो सके वोहा रामभजन नइ कर सकय। जौन लबारी मारथे, कपट करथे वोहा राम नाव नइ ले सकय। कलजुग म तो राम नाव के महिमा के बखान करे गे हावय अउ राम नाव ल भवसागर ले पार जाय के डोंगा बताय हे। फेर, अवगुन ले भरे मनखे वो डोंगा के तीर म नइ जा सकय। ‘अवगुण सिंधु मंदमति कामी, वेद विदुषक परधन स्वामी। विप्रद्रोह पर द्रोह विसेषा, दंभ कपट जियँ धरे सुबेसा।’

Gulal Verma Desk
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