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बरगद में वास करते हैं तीनों लोकों के देवता, परिक्रमा कर पूजेंगी सुहागिनें

वट सावित्री व्रत : अमावस्या तिथि को लेकर उलझन, पंडितों ने कहा 29 मई को ही श्रेयष्कर

रायपुर

Published: May 25, 2022 07:32:38 pm

रायपुर. बरगद पेड़ के नीचे बैठक कर एक दिन सुहागिनें एक साथ ब्रह्मा, विष्णु और महेश की पूजा-अर्चना कर अखंड सौभाग्य की कामना करेंगी। यह तिथि होगी वट सावित्री व्रत-पूजन की, जिसकी तैयारी में जुट गई हैं। क्योंकि कई प्रकार की सुहाग की सामग्री खरीदनी पड़ती हैं। यह व्रत-पूजन ज्येष्ठ मास की अमावस्या पर करने का पौराणिक विधान है, परंतु इस बार इसी तिथि को लेकर उलझन है। पंडितों का कहना है कि कुछ कैलेंडर में चतुर्दशीयुक्त अमावस्या पर 29 मई को तो कुछेक में 30 मई को अमवस्या है, लेकिन 29 मई को ही वट सावित्री पूजन श्रेयष्कर होगा।
पति की लंबी आयु की कामना के लिए सुहागिन महिलाएं यह व्रत ज्येष्ठ माह की अमावस्या तिथि को तथा दक्षिण भारत में ज्येष्ठ पूर्णिमा को परंपरा है। छत्तीसगढ़ में हर शहरों एवं गांवों में हर वर्ष बड़े उत्साह से यह व्रत महिलाएं करती हैं और इसकी तैयारी भी आठ- दस दिन पहले से शुरू कर देती हैं, ताकि व्रत तिथि के दिन किसी प्रकार की हड़बड़ी न हो और समय मे पूजा व्रत संपन्न हो सके।
सुहाग की ये सामग्री जरूर खरीदती हैं
वट सावित्री पूजन के लिए साड़ी, चूडिय़ां, गहने, मेहंदी, बांस का पंखा, पूजन समाग्री आदि सुहागिनें खरीदती ही हैं। यही वजह है कि आम दिनों की अपेक्ष इस समय बाजारों में महिलाओं की भीड़भाड़ देखी जा रही है।
जानिए शंका समाधन
पंडित चंद्रभूषण शुक्ला के अनुसार इस बार विभिन्न कलेंडरों मे अमावस्या तिथि 29 और 30 मई को उल्लेखित है, इसलिए महिलाओं में शंका उत्पन्न हो गई है। परंतु धर्म ग्रंथों में अमावस्या को प्रतिपदा युक्त नहीं, बल्कि चतुर्दशी युक्त को मान्य किया गया है, इसलिए काशी विश्वनाथ पंचांग, ऋषिकेष पंचांग, धर्म ङ्क्षसधु निर्णय आदि ग्रंथों के अनुसार वट सावित्री व्रत पूजन चतुर्दशी युक्त अमावस्या 29 मई को किया जाना श्रेयस्कर है। रायपुर के प्रसिद्ध मां महामाया देवी मंदिर से पंडित मनोज शुक्ला द्वारा प्रकाशित मां महामाया देवी पंचांग में भी यह व्रत 29 मई रविवार को ही उल्लेख किया गया है।
मौली धागा बांधकर परिक्रमा का विशेष फल
वट सावित्री पूजन का विशेष महत्व है। जिसका पूजन दोपहर में करने का विधान है इसलिए दोपहर के समय सुहागिन पूरे साजो श्रृंगार के साथ, उपवास रखकर अनेक प्रकार की पूजन सामग्री के साथ बरगद वृक्ष के पास पहुंचती हैं। पेड़ नीचे विधि-विधान से दीपक जलाकर बरगद वृक्ष में मौली धागा बांधकर परिक्रमा करते हुए अपने पति की लंबी आयु की कामना करती हैं।
कोरोना ने चेताया, पीपल और बरगद जरूर लगाएंगे
पंडितों के अनुसार कोरोना महामारी चेता गई। जब ऑक्सीजन के अभाव में सांसें टूट रही थीं। एक दिन ऐसा आएगा, जब पूजा करने के लिए पीपल और बरगद के वृक्ष को ढूंढना पड़ेगा। इसलिए समय रहते खानापूर्ति नहीं, सरकारी स्तर के भरोसे नहीं, बल्कि आम नागरिकों को फलदार पौधों के साथ ही पीपल, बरगद, नीम जरूर लगाने चाहिए।
ये है आध्यात्मिक मान्यता
पंडित शुक्ल के अनुसार विभिन्न पुराणों में पीपल, बरगद, तुलसी में साक्षात भगवान वास माना गया है। बरगद वृक्ष में तो तीनों लोक देवता भगवान ब्रम्हा, विष्णु और महेश का वास होता है। मानव जीवन में पीपल और बरगद पेड़ के व्यापक प्रभाव बताएं गए हैं और इसलिए शहरों से लेकर गांवों तक इन पेड़ों की पूजा का विधान है। परंतु अफसोस ये कि सभी जगह पेड़ों को काटा जा रहा है।
समझे वैज्ञानिक महत्व
पिछले कुछेक सालों में पीपल, बरगद और नीम के पेडों को सरकारी स्तर पर लगाना एक तरह से बंद हो गया है। पौधरोपण अभियान में शोदार पौधे ही अधिक जाएग जाते हैं। जबकि वैज्ञानिक महत्व यह है कि पीपल कार्बन डाई ऑक्साइड 100त्न अब्जार्बर है। बरगद 80त्न और नीम 75 त्न तक। इसलिए ये तीनों पेड़ बहुमूल्य हैं। जबकि इसके बदले लोग विदेशी यूकेलिप्टस को लगाना शुरू कर दिए जो जमीन को जल विहीन कर देता है। आज हर जगह यूकेलिप्टस, गुलमोहर और अन्य सजावटी पेड़ों ने नीम, पीपल, बरगद जैसे देव वृक्षों की जगह ले ली है।
बरगद में वास करते हैं तीनों लोकों के देवता, परिक्रमा कर पूजेंगी सुहागिनें
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