अपने पूर्वजों का स्मरण करना ही वास्तविक श्राद्धकर्म है: लाल बाबा

भारतीय धर्म शास्त्रों के अनुसार जब सूर्य कन्या राशि में आते हैं, तब परलोक से पित्र अपने स्वजनों के पास आ जाते हैं

By: chandan singh rajput

Published: 16 Sep 2020, 02:04 AM IST

बरेली. श्राद्ध तर्पण द्वारा पित्र को बहुत प्रसन्नता एवं संतुष्टि मिलती है। पित्रगण प्रसन्न होकर दीर्घायु संतान सुख, धन-धान्य, विद्या, राज सुख, यश-कीर्ति, पुष्टि, शक्ति स्वर्ग एवं मोक्ष तक प्रदान करते हैं। भारतीय धर्म शास्त्रों के अनुसार जब सूर्य कन्या राशि में आते हैं, तब परलोक से पित्र अपने स्वजनों के पास आ जाते हैं।
देव तुल्य स्थिति में तीन पीढ़ी के पूर्वज गिने जाते हैं। पिता को वसु के समान, रूद्र दादा के समान और परदादा आदित्य के समान माने गए हैं। इसके पीछे एक कारण यह भी है कि मनुष्य की स्मरण शक्ति केवल तीन पीढिय़ों तक ही सीमित रहती है। जम्मू बाले लाल बाबा बताते हैं कि अपने पूर्वजों का स्मरण करने और उनके मार्ग पर चलने और सुख शांति की कामना ही वस्तुत: श्राद्धकर्म है। हमारे धार्मिक ग्रंथों के अनुसार तर्पण का जल सूर्य उदय से आधे पहर तक अमृत, एक पहर तक शहद, डेढ़ पहर तक दूध और साढ़े तीन पहर तक जल रूप में हमारे पितरों को प्राप्त होता है।

नर्मदा तटों पर तर्पण
इन दिनों नर्मदा तट अलीगंज, बगलबाड़ा और क्षेत्र की आसपास की नदियों में पितरों को तर्पण करने के लिए प्रात: समय से लोग पहुंच रहे हैं। जहां ब्रह्मणों के माध्यम से तर्पण कराने का सिलसिला सुबह नौ बजे तक चलता है। वहीं घरों में श्राद्ध कार्यक्रम भी जारी हैं, लेकिन कोरोना काल के चलते श्राद्ध भोजन करने के लिए ब्राह्मणों का टोटा बना है। श्राद्ध के लिए हामी तो भरी जा रही है, लेकिन भोजन करने के लिए ब्राह्मण बहुत कम संख्या में घरों में जा रहे।

श्रद्धा, विश्वास से नमन कर पितरों को करें विदा, घर में आएगी खुशियां: पं. शास्त्री
बेगमगंज. पितृ विसर्जन अमावस्या बृहस्पतिवार को है। माना जाता है कि बृहस्पतिवार को पितरों को विदा करने से पितृ देव बहुत प्रसन्न होते हैं। क्योंकि यह मोक्ष देने वाले भगवान विष्णु की पूजा का दिन माना जाता है। पंडित कमलेश शास्त्री के अनुसार जो व्यक्ति श्रद्धा और विश्वास से नमन कर अपने पितरों को विदा करता है। उसके पितृ देव उसके घर-परिवार में खुशियां भर देते हैं। जिस घर के पितृ प्रसन्न होते हैं, पुत्र प्राप्ति और मांगलिक कार्यक्रम उन्हीं घरों में होते हैं। पितृ विसर्जन अमावस्या की शाम को पितरों को विदा किया जाता है। इसलिए इस अमावस्या को पितृ विसर्जन अमावस्या कहा गया है। इसका एक नाम सर्वपितृ अमावस्या भी है। यह पितृपक्ष का अंतिम दिन होता है। हिंदू धर्म में इस दिन का महत्व बहुत अधिक है।

मान्यता है कि हर साल पितृ पक्ष आरंभ होने पर सभी पितृ धरती पर आते और पितृपक्ष के अंतिम दिन यानी आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि को वापस अपने लोक चले जाते हैं।
दूर होगा पितृदोष: पं. शास्त्री के पितृ विसर्जन की विधि बताई, जिसमें ब्रह्म मुहूर्त में उठकर बिना साबुन स्नानकर कपड़े पहनें। इस दिन घर में सात्विक भोजन ही बनाएं। शाम के समय चार मिट्टी के दीपक जलाएं। साथ ही यह भी निवेदन करें कि उनका आशीर्वाद बना रहे। मंदिर में भगवान विष्णु की प्रतिमा के सामने पीपल के पेड़ के नीचे वह दीपक रखकर और पानी चढ़ाकर पितरों से यह प्रार्थना करें कि अब वह यहां से अपने लोक में जाएं। ध्यान रहे कि पितृ विसर्जन विधि के दौरान किसी से भी बात ना करें। जब मंदिर से लौटकर घर आ जाएं तब अपने घर के मंदिर में हाथ जोड़कर ही किसी से बात करें।

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