Video : संशोधन-दर-संशोधन से जटिल हुआ जीएसटी

संदर्भ - जीएसटी दिवस आज

By: Rakesh Gandhi

Published: 01 Jul 2020, 10:07 AM IST

राकेश गांधी
( पद्मेश तैलंग, सेवानिवृत अतिरिक्त आयुक्त, वाणिज्यिक कर विभाग, राजस्थान सरकार से हुई बातचीत के आधार पर )

कई बार लगता है कि मात्र तीन वर्ष में जीएसटी की व्यवस्था अपने घोषित उद्देश्य और लक्ष्य से ही भटक गई है। इसमें कोई संदेह नहीं कि सैद्धांतिक तौर पर जीएसटी एक अच्छा कानून है, पर जटिलताओं पर आंकलन व कम्प्यूटर-इंटरनेट जैसी आधारभूत सुविधाएं जुटाए बिना इसे लागू कर देने से ये समस्या अधिक खड़ी कर रहा है। इसे लागू करने से पूर्व यदि भविष्य को परख लिया जाता तो शायद इतनी जटिलताएं नहीं होती।

एक देश एक कर
राज्य व केन्द्र सरकार के सभी तरह के अप्रत्यक्ष करों को शामिल कर जीएसटी बनाया गया। अर्थात कर, सरचार्ज, सेस, एडिशनल ड्यूटी आदि अब अलग-अलग न होकर एक ही जीएसटी रहेगा। पर बजाय इस पर स्थिर रहने के राज्यवार छूटें दी जाने लगीं। जैसे केरल को आपदा के आधार पर सेस लगाने की छूट दी गई। इससे एक गलत संदेश गया कि अब भविष्य में राज्यों द्वारा ऐसे आधार ढूंढे जाते रहेंगे और केन्द्र अपनी राजनीतिक इच्छाशक्ति पर ऐसी छूट देता रहेगा। यह कहा गया था कि जीएसटी आने पर पूरे देश में एक ही जीएसटी कानून और एक सी ही कर दर समस्त राज्यों में होगी, ताकि एक 'एक देश एक बाजार' बने। पर यहां भी केन्द्र की नियामक जीएसटी काउंसिल ने फिर अलग-अलग राज्यों को कुछ मामलों में अपना-अपना प्रावधान बनाने को छूट दे दी।

'वस्तु' व 'सेवा' में वर्गीकरण नहीं
यह दावा किया गया था कि वस्तु और सेवा- इन दोनों को जोड़कर ही जीएसटी लगाया जाएगा, जबकि जीएसटी आने से पूर्व इन पर अलग-अलग कर था। पर इस पर भी कायम नहीं रह पाए। जैसे सोलर पावर प्रोजेक्ट पर 'वस्तु' व 'सेवा' दोनों सम्मिलित होने से एक ही जीएसटी होना था, पर प्रावधान कर दिया गया कि ऐसे प्रोजेक्ट की सप्लाई में 70 प्रतिशत 'वस्तु' और 30 प्रतिशत 'सेवा' मानी जाएगी। यह बिंदु विवादित तो है ही, जीएसटी की मूल भावना के विपरीत भी है।

प्रक्रिया के सरलीकरण का दावा
यह दावा था कि जीएसटी सरल कर और सरल कानून है, पर हुआ यह कि पांच प्रकार के कर दर (.25, 5, 12, 18, 28 प्रतिशत) ने वस्तु / सेवा के वर्गीकरण और व्याख्या को ही जटिल कर दिया। व्यवसायी के लिए कई प्रकार के रिटर्न और वे भी बहुत अधिक सूचना मांगने वाले जटिल प्रारूप में है। इससे अनावश्यक टैक्स कंसलटेंट पर खर्चा और फिर भी विभाग से मतभेद हो रहा है। केन्द्रीय जीएसटी काउंसिल की अब तक हुई 40 बैठकों में जीएसटी कानून में अब तक सैकड़ों संशोधन कर देने से जटिलता बढ़ती जा रही है। इससे व्यापारी तो क्या, कर सलाहकार और अधिकारी भी भ्रमित हैं। आए दिन संशोधन, परिवर्तन जीएसटी कानून में किए जा रहे हैं। वस्तु या सेवा की व्याख्या करना और उस आधार पर कर दर तय करने के लिए जीएसटी में एडवांस रूलिंग का प्रावधान है। वहां कुछ फैसले व्यावहारिक तौर पर मतभेद वाले दिखते हैं। जैसे हाल में 'पराठा'- 'रोटी' नहीं है, का फैसला और इसलिए 'पराठा' पर 5 प्रतिशत नहीं, 18 प्रतिशत जीएसटी का फैसला।

कोरोना प्रभाव
कोरोना का लॉकडाउन 22 मार्च से लागू हुआ। उससे पूर्व भी देश की जीडीपी लगातार गिर रही थी। अर्थात एक जुलाई 2017 से जीएसटी लागू होने से लेकर 20 मार्च 2020 तक की अवधि में वैसे भी जीडीपी एक आकलन अनुसार क्रमश: गिर रही थी, जैसे वर्ष 2017-18 में इसकी दर 6.7, वर्ष 2018-19 में 6.1 और वर्ष 2019 के प्रथम क्वार्टर में 5.2 व दूसरे क्वार्टर में 4.4, तृतीय में 4.1 और अपूर्ण चौथे क्वार्टर में 3.1 प्रतिशत रही है। अर्थात ऐसा नहीं लगता है कि जीएसटी लागू होने के बाद आर्थिक परिदृश्य जीडीपी की नजर से अच्छा रहा है। ऐसे में अब कोरोना प्रभाव यदि जीडीपी को और दुष्प्रभावित करेगा तो बतौर नीति जीएसटी प्रावधान के ऊपर वर्णित व्यवस्था/प्रक्रियागत सुधार के अलावा जीएसटी की दरों को अधिक सुसंगत और व्यवसाय के सेक्टरवार अध्ययन कर पुन: निर्धारित करने की जरूरत है। नीतिगत एक और निर्णय आवश्यक है कि जन स्वास्थ्य के प्रति किसी भी संवेदनशील सरकार को कोरोना से संबंधित सेनीटाइजर, हैंडवॉश, मास्क, वेंटिलेटर, पीपीई किट और कोरोना में दी जा रही दवाइयों को 100 प्रतिशत जीएसटी मुक्त करना चाहिए और इन वस्तुओं से संबंधित कच्चे माल व विनिर्माता यूनिट को भारी रिलीफ जीएसटी में देनी चाहिए।

राजसमन्द और जीएसटी
जीएसटी आने से पूर्व वेट व्यवस्था में वाणिज्य कर विभाग के सड़क मार्ग पर जगह-जगह कुछ टैक्स कलेक्शन सेंटर थे, जहां से राजसमंद से जाने वाले मार्बल वाहनों पर उनके बिलों में जारी कर राशि को नकद वसूल कर लिया जाता था। जीएसटी काल में आईटीसी क्लेम को सुगम और समय लेने वाले सत्यापन की प्रक्रिया को कम करने के लिए पुन: जीएसटी कलेक्शन सेंटर बनाए जाएं। मार्बल व्यवसाय वैसे भी मंदी की ओर जा रहा है तो मार्बल ब्लॉक और टाइल्स पर जीएसटी की दर क्रमश: 5 प्रतिशत व 12 प्रतिशत तो की ही जा सकती है।

Rakesh Gandhi Editorial Incharge
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