आदिवासियों को पट्टा देकर जमीन देना भूली सरकार, 18 साल बाद भी खेतिहर किसान नहीं बन पाए आठ हजार आदिवासी

जवा क्षेत्र के डेढ़ हजार गरीबों को बांटे गए थे खेती योग्य जमीनों के पट्टे, जर्जर हो गए भू-अधिकार पत्र, नहीं मिला जमीन पर कब्जा

By: Rajesh Patel

Published: 28 Aug 2018, 12:22 PM IST

रीवा. कहने को तो नौ एकड़ जमीन की मालकिन। भूख और प्यास मिटाने के लिए गांव की गलियों में लोगों के सामने गिड़गिड़ा रही हैं। आप यकीन नहीं करेंगे सरकारी सिस्टम का ऐसा जख्म की दो वक्त की रोटी के लिए जिंदगी से जंग लड़ रही हैं। हम बात कर रहे हैं डभौरा क्षेत्र के पुरवा गांव की दो बुजुर्ग महिलाएं छोटकइया और बडक़इया आदिवासी की।

जमीन के इंतजार में दुनिया से चल बसे 9 आदिवासी परिवार
जिले के जवा तहसील के घुमन गांव के सुदामापुर गांव में 9 आदिवासियों को खेतिहर किसान बनाने के लिए करीब 81 एकड़ जमीन का पट्टा दिया गया था, लेकिन जमीन पर कब्जा नहीं मिला। पट्टे धारक के परिवार में मात्र दो महिलाएं बची हैं। छोटकइया और बडक़इया के नाम से सरकारी रेकॉर्ड में नौ एकड़ जमीन तो है, लेकिन उस पर गांव के ही लोगों का कब्जा है।

दो वक्त की रोटी के लिए घर छोड़ दिया
अफसरों की चौखट पर न्याय नहीं मिला तो महिलाएं दो वक्त की रोटी के लिए घर छोड़ दिया। भूख-प्यास मिटाने के लिए डभौरा बाजार से लेकर स्टेशन तक लोगों के सामने हाथ पसारने को मजबूर हैं। ये कहानी अकेले इन महिलाओं की नहीं, बल्कि क्षेत्र के सैकड़ों आदिवासी परिवार है, जिन्हें खेती के लिए जमीन का पट्टा तो दिया गया, लेकिन कब्जा आज तक नहीं मिला है। सरकारी रेकार्ड में जवा, त्योंथर, मऊगंज, हनुमना, गुढ़ सहित जिले में आठ हजार से ज्यादा आदिवासी परिवारों को खेती योग्य जमीन का पट्टा दिया गया था। कुछ को छोड़ ज्यादातर को कब्जा नहीं दिलाया जा सका है।

जवा क्षेत्र में 1500 आदिवासियों को नहीं मिला कब्जा
हमारा ग्राम अधिकार के सदस्यों द्वारा जवा और डभौरा क्षेत्र के करीब 200 गांव में भू-अधिकार यात्रा निकाली गई। सामाजिक कार्यकर्ता एवं पत्रिका के चेंजमेकर जगदीश यादव बताते हैं कि भू-अधिकार यात्रा के दौरान तहसील और विभिन्न गांवों से 1500 से अधिक आदिवासी परिवारों ने दस्तावेज जुटाए गए हैं। वर्ष 2001-02 में तत्कालीन सरकार ने आदिवासियों को खेतिहर किसान बनाने के लिए अभियान चलाकर भू-अधिकार पत्र बांटे थे।

कोटा में 53 आदिवासियों को दिया गया है जमीन का पट्टा
जवा तहसील से वर्ष 2001-02 में कोटा गांव में 53 आदिवासी परिवार को खेती योग्य भूमि का पट्टा दिया गया था। गांव के बुजुर्ग रामसजीवन आदिवासी ने बताया कि खेती के लिए भू-अधिकार पत्र दिया गया है। लेकिन, कब्जा आज तक नहीं दिया गया। बच्चे जंगल में पत्ता तोड़ कर पेट पाल रहे हैं। जमीन पर गांव के गुंडों का अतिक्रमण है।

प्रदेश और केंद्र शासन को भेजा पत्र
सामाजिक कार्यकर्ता जगदीश यादव, पुष्पेन्द्र ङ्क्षसह ने बताया कि प्रदेश सरकार के साथ ही केंद्र में किसान आयोग को पत्र भेज कर आदिवासी परिवारों को जमीन पर पट्टा दिलाए जाने की मांग उठाई है। पत्र के अनुसार जवा के घूनम में 61, हरदोही 39, लोहगढ़ में 34, कल्यापुर में 31, महिलवार में 42, अजरा 19,लटियार-10, देवरी में 84 आदिवासी परिवार को पट्टा दिया गया है। इसी तरह दो दर्जन से ज्यादा गांवा में आदिवासी परिवारों को पट्टा दिया गया है। भेजे गए पत्र में डेढ़ हजार परिवारों को पट्टे पर कब्जा नहीं मिलने का जिक्र किया गया है।

आवासीय पट्टे की आस में पथरा गईं आंखे
जवा तहसील के खैरहा गांव के सियानगर में रामदीन आदिवासी झोपड़ी में रहने को विवश है। कई बार तहसील से लेकर जिला मुख्यालय पर अफसरों से गुहार लगाई, बाजूवद आज तक जमीन का पट्टा नहीं मिला। पत्नी उर्मिला ने बताया कि पति की दोनों आंख से दिखाई नहीं देता है। करीब बीस साल से सरकारी जमीन पर एक बेटे और दो बेटी के साथ झोपड़ी बनाकर गुजारा कर रहा है। इस गरीब के लिए सरकार की कल्याणकारी योजनाएं बेमानी हैं। बताया गया कि गांव की आबादी में 481 परिवार रहता है। गांव में भूलभूत सुविधाएं नदारत हैं।

 

 

Rajesh Patel Reporting
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