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रासायनिक संरक्षण से वास्तविक स्वरूप में नजर आने लगी प्राचीन प्रतिमाएं, वर्षों तक रहेगी अपने मूल स्वरूप में

एरण में विखरी पुरा संपदा पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा कराया जा रहा है कार्य, बारिश के कारण प्रतिमाओं पर काई जमन से पड़ गई थीं काली

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रासायनिक संरक्षण के बाद स्तंभ आया मूल स्वरूप में

रासायनिक संरक्षण के बाद स्तंभ आया मूल स्वरूप में

बीना. एरण में करीब 1600 वर्ष पुरानी मूर्तियां मौजूद हैं और आसपास पुरा संपदा विखरी पड़ी है, जिसमें समुद्र गुप्त के समय की प्रतिमाएं यहां मौजूद हैं। खुले में प्रतिमाएं होने के कारण इनपर काई जमने से वास्तिवक स्वरूप नहीं दिखता था, लेकिन अब पुरातत्व विभाग द्वारा रासायनिक संरक्षण किया जा रहा है।
ऐरण में लाल बलुआ पत्थर से बनी प्राचीन प्रतिमाएं, स्तंभ मौजूद हैं। प्रतिमाएं खुले में होने के कारण बारिश से इनपर काई जम गई थी, जिससे वह काली नजर आने लगी थी। वर्षों से इनका रासायनिक संरक्षण नहीं किया गया था, जो अब पुरातत्व विभाग ने शुरू कर दिया है। छोटी प्रतिमाओं और स्तंभ से इसकी शुरुआत की गई है और श्रीकृष्ण लीला शिला चबूतरा, चार स्तंभ सहित अन्य छोटी प्रतिमाएं वास्तिक स्वरूप में आ गई हैं। बड़ी मूर्ति, गरुण स्तंभ साफ होने पर अपने मूल स्वरूप में आने पर बुंदेलखंड का पुरा अस्तित्व पर्यटकों के समक्ष आएगा और देशी-विदेशी पर्यटक इस पुरा स्थल की ओर आकर्षित होंगे। अभी कुछ दिनों से काम रुका हुआ है, जो फिर से जल्द शुरू होने की बात कही जा रही है।
पुरातत्व विभाग का है अच्छा कदम
यह महत्वपूर्ण पुरा स्थल है और मूर्तियों का रासायनिक संरक्षण किया जा रहा, जो अच्छा कदम है। सभी मूर्तियों का रासायनिक सरंक्षण होने पर वास्तविक स्वरूप में आ जाएंगी और पर्यटकों का आकर्षण बढ़ेगा। रासायनिक संरक्षण के बाद कई सालों तक मूर्तियां अपने स्वरूप में रहेंगी।
डॉ. मोहनलाल चढ़ार, एसोसिएट प्रो. एवं विभागाध्यक्ष प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति और पुरातत्व इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय, अमरकंटक

प्रतिमा से हटाई गई काई IMAGE CREDIT: patrika

यह है एरण का इतिहास
एरण पुरा स्थल भारत की सांस्कृति धरोहर को समझने के लिए महत्वपूर्ण पुरा स्थल है। हड़प्पा संस्कृति की समकालीन ताम्रपाषाण कालीन संस्कृति यहां से मिली है। पाषाण काल से ऐतिहासिक काल तक के क्रमवद्ध कालखंड के प्रमाण मिलते हैं, जिसमें मुख्य रूप से मौर्य कालीन, सुंग कालीन, नागवंश पुरा अवशेष एवं गुप्त वंश के मंदिर, मूर्तियों की जानकारी मिलती है। यहां से गुप्त काल, चंदेल काल, गुर्जर प्रतिहार काल, परमार काल, मुगल काल, मराठा काल के अवशेष प्राप्त हुए हैं। यहां गुप्तकालीन मंदिर भारत के प्राचीनतम मंदिरों में गिने जाते हैं। वराह की प्रतिमा भारत की सर्वाधिक ऊंचाई की प्रतिमा है, जो विश्व की सबसे अद्वितीय और प्राचीनतम हैं। भगवान विष्णु की करीब 14 फीट ऊंची प्रतिमा भारत में गुप्तकाल में बनी एक मात्र प्रतिमा है। बुद्ध गुप्त के समय बना 47 फीट ऊंचा गरुण स्तंभ में अशोक के स्तंभ की निरंतरता देखने में मिलती है। यहां सक शासक श्रीधर वर्मा का अभिलेख, समुद्रगुप्त का अभिलेख, बुद्ध गुप्त का अभिलेख, भानुगुप्त का अभिलेख और पूर्व मध्यम कालीन अनेक सती स्तंभ लेख प्राप्त हुए हैं, जो भारतीय इतिहास की दृष्टि से अत्यंत महत्पूर्ण हैं।