3D-प्रिंटेड मैटीरियल की मदद से कम समय में जुड़ सकेगीं टूटी हड्डियांं, वैज्ञानिकों ने की ऐसी खोज... जानें क्या है वो

  • 3D-प्रिंटेड मैटेरियल जरिए होगा टूटी हड्डियों का इलाज
  • इस तकनीक से इंजरी को भी ठीक किया जाएगा
  • अमरिका की यूनिवर्सिटी कर रही है इसके पार्ट व डिजाइन पर काम

By: Navyavesh Navrahi

Published: 09 Apr 2019, 06:00 PM IST

नई दिल्ली - जब हमारे शरीर की कोई भी हड्डी के टूट जाने के चलते उस हड्डी को जुड़ने में तकरीबन चार से पांच महीने लग जाते हैं, अगर ज्यादा गंभीर केस हो तो वो रिकवर होने में इससे भी ज्यादा समय ले लेता है।लेकिन अब वैज्ञानिकों ने एक एेसी चीज बनाई है जिससे टूटी हड्डी ( bons )को जुड़ने में कम समय लगेगें। साथ ही इस पद्दी के जरिए जिसको 3D-प्रिंटेड मैटीरियल कहा जाता है इससे हड्डी को जोड़ने में मदद होगी। आज हम इस नई तकनीक से जुड़ी जानकारी देते हैं कि आखिर 3D-प्रिंटेड मैटेरियल क्या है और ये किस तरह से काम करता है।

 

 

वैज्ञानिकों ने एक ऐसा नए तरीके का 3D-प्रिंटेड मैटेरियल बनाया है जो ओस्टियोकोन्ड्रल (osteochondral) इंजरी को ठीक करने के काम आएगा। आपको बता दें कि हड्डियों के अंत में चिकनी सतह पर ज्वाइंट के अंदर की ओर क्रैक आ जाने से उसे ओस्टियोकोन्ड्रल इंजरी कहा जाता है, जिसका इलाज करना काफी कठिन होता है, लेकिन आने वाले समय में आसानी से इसका इलाज किया जा सकेगा।

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दरअसल, इस 3D-प्रिंटेड मैटेरियल को सबसे अमरिका की यूनिवर्सिटी ( university )अॉफ मायरलैंड और ह्यूस्टन के राइस यूनिवर्सिटी के रिसर्चरस ने इस रिसर्च को साथ में मिलकर बनाया था। साथ ही बताया कि ये 3D-प्रिंटेड मैटेरियल को हड्डी के बीच में जब लगाया जाएगा तो ये सेल्स के साथ मिलकर आसानी से हिलाने -डुलाने में मदद करेगा। हड्डी में लगी चोट के ठीक हो जाने पर यह बिना किसी भी तरह का नुक्सान पहुंचाए अंदर ही घुल जाएगा जिससे मरीज को कोई परेशानी नहीं होगी।

 

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हालांकि, इस तकनीक को ओर भी बेहतर करने के लिए शोधकर्ता इस पर काम कर रहें हैं। जिसके लिए 3D-प्रिंटेड मैटेरियल को सॉफ्ट पोलीमर से तैयार किया गया है। जिसे आने वाले समय में स्पोर्ट्स पर्सन्स के घावों को ठीक करने के काम में लाया जाएगा। लेकिन वैज्ञान इसके पार्ट और डिजाइन को लेकर को लेकर काम कर रहें हैं। कि किस तरह से इस पर काम किया जाए। यह प्रत्येक मरीज के इंजरी होने पर जटिल से जटिल केसों में भी उपयोग में लाया जाए। माना जा रहा है कि इस टैक्नोलॉजी की मदद से मरीजों को इलाज करवाने में कुछ आसानी रहेगी।

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