इस मेले में मिलती थी एक खास चीज, जिससे बनती है शराब

ये मेला है खास, जानिए इस मेले की खासियत

By: Shahdol online

Published: 15 Jan 2018, 04:15 PM IST

शहडोल- संभाग में अगर किसी से भी पूछा जाए कि यहां का सबसे बड़ा मेला कौन सा है तो जवाब बाणगंगा मेला ही आएगा। क्योंकि बाणगंगा का ये मेला पूरे शहडोल संभाग का सबसे बड़ा मेला है। इस मेले की कई खासियत है। आदिवासी संस्कृति, कला और परिवेश को लेकर प्रसिद्ध बाणगंगा मेले का शुभारंभ 14 जनवरी मतलब बीते रविवार से हो चुका है। मकर संक्रांति पर्व पर लगने वाले बाणगंगा मेले की खासियत यहां लगने वाले महुआ की दुकानें थीं। एक तरह से बाणगंगा मेला ही महुआ के लिए प्रसिद्ध था। शहडोल के अलावा उमरिया और अनुपपुर जिले के ग्रामीण अंचल के लोग यहां आते थे। और महुआ लेकर जाते थे। तब मेले में कई हजार क्ंिवटल महुआ की बिक्री हो जाती थी। मेले में महुआ बेचने वाले और खरीदने वाले ज्यादातर लोग आदिवासी सुमदाय के होते थे। इस समुदाय के लोग महुआ को औषधि के रुप में उपयोग करते हैं। समय बदला और मेले में आने वालों की खरीददारी का अंदाज भी बदला। इसी का असर है कि बीते कई सालों से बाणगंगा मेले में अब महुआ की दुकान नहीं लगती है। इस बार रविवार से शुरू हो चुके मेले में महुआ बिक्री की एक भी दुकानें नहीं लगी हैं।

तीन उद्देश्य के साथ शुरू हुआ था मेला
बाणगंगा मेले की शुरुआत तीन उद्द्ेश्य के साथ हुई थी। पहला था अपार जनसूमह का एक स्थान पर इकट्ठा होना। जिससे अपनी बात आसानी से दूर-दूर फैलाई जा सके। दूसरा राजनैतिक शक्ति बढ़ाना और तीसरा बाणगंगा कुंड की पाव महिमा बनाए रखते हुए मकर संक्रांति पर यहां स्नान करने के लिए आने वालों के लिए सांस्कृतिक आयोजन।

125 साल पुराना है ये मेला
बांण गंगा मेले का नाम आते ही जहन मे 125 वर्ष पुरानी यादें ताजा हो जाती हैं। इस मेले की शुरूआत तात्कालीन रीवा महाराजा गुलाब सिंह ने 1895 मे कराई थी। तब से बांणगंगा मे निरंतर मेले की परांपरा चली आ रही है। मेले का उदेश्य स्नान, दान व पुण्य की मिसाल कल्चुरी कालीन एक हजार पहले बने विराट मंदिर के पं्रागण में अपनी अमिट छाप छोड़ रही है।
मेले का स्वरूप भी रहट से आकाशीय झूले तक पहुंच चुका है। मेले में लोगों का मेल मिलाप और उत्साह पुरानी रीति रिवाज को समेटे हुए आदिवासियों के प्रकृति प्रेम का गवाह बना हुआ है। जब मेले की शुरुआत हुई थी तब तीन दिन तक ही मेला रहता था। जो अब 5 दिन तक भरने लगा है।

ऐेसे हुई बाणगंगा मेले की शुरुआत
जानकार बताते हैं कि मेला आयोजन के लिए महाराजा गुलाब सिंह ने एक कमेटी बनाई थी। जिसमें सोहागपुर इलाकेदार राजेन्द्र सिंह शारदा कटारे,व ठाकुर साधू सिंह शामिल रहे। इन्हें सोहागपुर इलाकेदार का नजदीकी माना जाता था। इसी कमेटी ने बांणगंगा में मेला लगाने का प्रस्ताव पास किया गया। और इस मेले का प्रचार प्रसार करने के लिए गांव-गांव डुग्गी (मुनादी कराना) पिटवाकर प्रचार-प्रसार किया गया। उस जमाने में भी रहट झूले का चलन था। जो अपनी आवाज के लिए लोगों के बीच एक खास पहचान रखता था। बदलते वक्त के साथ अब मेले ने भी आधुनिक रूप ले लिया है। भजन कीर्तन से लेकर कवि सम्मेलन,नृत्य
मंण्डली मेले मे मनोरंजन का साधन बन रही हैं।

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