अरविंद केजरीवाल चल पड़े मोदी की राह, साथ में लाए देहली मॉडल ऑफ डेवलपमेंट

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुकाबला करते-करते केजरीवाल अब खुद मोदी जैसे होते जा रहे हैं। वे हिंदुत्व का जवाब हिंदु्त्व से दे रहे हैं। केजरीवाल ने दिल्ली के विधानसभा चुनावों को बहुत चतुराई से अल्पसंख्यक बनाम बहुसंख्यक की राजनीति में नहीं बदलने दिया। कोई आश्चर्य नहीं कि पूरे चुनाव के दौरान अरविंद केजरीवाल शाहीन बाग नहीं पहुंचे और यही नहीं वे शाहीन बाग पहुंचते पहुंचते हनुमान मंदिर पहुंच गए। टीवी चैनलों पर उनके हनुमान भक्ति के स्वर गूंजने लगे। राम भक्ति का जवाब हनुमान भक्ति से।

By: Swatantra Jain

Updated: 18 Feb 2020, 06:05 PM IST

दिल्ली विधानसभा चुनाव 2020 के चुनावी कैंपने को देखें तो साफ हो जाता है कि 2012 में देश की राजनीति को बदलने आए अरविंद केजरीवाल अब खुद ही बदले बदले नजर आ रहे हैं। भारतीय राजनीति ने केजरीवाल को काफी कुछ सिखा दिया है, बदल दिया है। गौर करने की बात यह है कि आईआईटी के पूर्व छात्र रहे अरविंद केजरीवाल ने इसमें काबिले तारीफ प्रगति की है। केजरीवाल अब भारतीय राजनीति के नवसिखुआ और आम नेता नहीं बल्कि खास और पेशेवर राजनेता बन चुके हैं। ध्यान से देखें तो साफ हो जाता है कि केजरीवाल ने सबसे ज्यादा किसी से सीखा है तो वो सीखा है नरेंद्र मोदी से। बल्कि कई मामलों में तो केजरीवाल सीधे नरेंद्र मोदी के ही नक्शे कदम पर चलते नजर आ रहे हैं। लेकिन गौर करने की बात ये है कि कभी गुजरात और बनारस जाकर नरेंद्र मोदी को ललकारने वाले अरविंद केजरीवाल इस बार के दिल्ली विधानसभा चुनाव में दिल्ली में ही बैठे मोदी से ही सीधे टकराने से बचते रहे। बल्कि दिल्ली के मुख्य मंत्री के रूप में तीसरी बार शपथ लेते हुए केजरीवाल ने कहा कि उन्हें प्रधानमंत्री मोदी का आशीर्वाद चाहिए। साफ है कि केजरीवाल अब बदल गए हैं। केजरीवाल अब भारतीय राजनीति के कोई नवागंतुक नेता नहीं बल्कि मुख्य धारा के नेता बन चुके हैं। अरविंद केजरीवाल और उनकी पार्टी आप ने
इस बार जिस तरह का चुनावी कैंपेन चलाया है उससे साफ है कि अब आम आदमी पार्टी भारतीय राजनीति में अपनी स्थाई छाप छोड़ने जा रही है और इसके लिए अरविंद केजरीवाल ने जहां कांग्रेस से ये सीखा है कि उसे क्या नहीं करना है तो गुजरात के चार बार मुख्यमंत्री रह चुके भाजपा नेता नरेंद्र मोदी से ये सीखा है कि क्या करना है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुकाबला करते-करते केजरीवाल अब खुद मोदी जैसे होते जा रहे हैं। वे हिंदुत्व का जवाब हिंदु्त्व से दे रहे हैं। केजरीवाल ने दिल्ली के विधानसभा चुनावों को बहुत चतुराई से अल्पसंख्यक बनाम बहुसंख्यक की राजनीति में नहीं बदलने दिया। कोई आश्चर्य नहीं कि पूरे चुनाव के दौरान अरविंद केजरीवाल शाहीन बाग नहीं पहुंचे और यही नहीं वे शाहीन बाग पहुंचते पहुंचते हनुमान मंदिर पहुंच गए। टीवी चैनलों पर उनके हनुमान भक्ति के स्वर गूंजने लगे। राम भक्ति का जवाब हनुमान भक्ति से। वो भी मतदान से एक दिन पहले। आपको याद होगा कि प्रधानमंत्री मोदी ने भी 2019 के लोकसभा चुनाव में अंतिम चरण के मतदान से पहले केदारनाथ धाम में माथा टेका था और पूरे दिन टीवी चैनलों पर उनकी यही तस्वीरें नजर आती रही थीं। यही नहीं मतदान के दिन भी केजरीवाल ने मतदान पर जाने से पहले अपने माता-पिता का आशीर्वाद लिया और इसकी तस्वीरें भी तुरंत ही चैनलों पर आ गईं। प्रधानमंत्री मोदी भी अपने मां से मिलने गुजरात जाते रहते हैं और इसकी भी तस्वीरें मीडिया में आती रहती हैं।

उसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिस तरह अपने दूसरे कार्यकाल की शुरुआत 'सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास' के नारे से की थी, उसी तरह के स्वर दिल्ली के मुख्यमंत्री के रूप में तीसरी बार शपथ लेते समय केजरीवाल के भाषण में दिखाई दिए।
अरविंद केजरीवाल ने शपथ ग्रहण समारोह के बाद अपने संबोधन में सिर्फ कुछ नपी-तुली बातें कहीं। अरविंद केजरीवाल ने कहा आज 2 करोड़ सभी दिल्ली वाले मेरे परिवार का हिस्सा हैं। हम दिल्ली को खूबसूरत बनाएंगे। हमारे विरोधियों ने जो कुछ मुझे बोला उन्हें मैंने माफ कर दिया है। इसी के साथ केजरीवाल ने दिल्ली के निर्माताओं का नाम लिया। कहा कि दिल्ली को ये लोग आगे बढ़ा रहे हैं।

गौर करने की बात यह भी है कि शपथ समारोह में अरविंद केजरीवाल ने भारत माता की जय, वंदे मातरम के साथ अपने संबोधन की शुरुआत की। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी अपनी रैलियों की शुरुआत में भारत माता की जय और वंदे मातरम के नारे लगवाते रहे हैं। लेकिन अंतर ये जरूर रहा कि केजरीवाल ने इंकलाब जिंदाबाद का भी स्वर साथ में बुलंद किया।

इतना ही नहीं अरविंद केजरीवाल ने इस बार मंच से हम होंगे कामयाब गीत भी गाया और वहां मौजूद सभी लोगों ने उनका साथ दिया। इसके पहले 2015 के शपथ समारोह में केजरीवाल ने इस गीत के बजाए इंसान का इंसान से हो भाईचारा गीत गाया था और ये साफ कहा था कि वे जाति और धर्म की राजनीति को प्यार और मुहब्बत की राजनीति से बदलना चाहता हैं।गौर करने की बात यह भी है कि शपथ के दौरान भी केजरीवाल इस बार माथे पर मंदिर के तिलक के साथ नजर आए और उनके सर पर 2015 के शपथ दौरान दिखाई देने वाली आम आदमी की टोपी नजर नहीं आई। और सबसे अहम बात ये कि इन चुनावों के बाद जिस बात की सबसे अधिक चर्चा हो रही है वो है दिल्ली मॉडल ऑफ डेवलपमेंट या केजरीवाल मॉडल ऑफ डेवलपमेंट।
आपको बता दें कि दिल्ली आने के पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी जिस विकास मॉडल की बात करते थे उसे गुजरात मॉडल ऑफ डेवलमेंट का नाम दिया गया था और उसे मुख्यमंत्री के रूप में खुद नरेंद्र मोदी ने विकसित किया था।
वैसे इस बात पर भी ध्यान दिया गया है कि मोदी और केजरीवाल की कार्यशैली में भी काफी समानता है - दोनों ही तानाशाही शैली में काम करते हैं। दोनों को असहमति पसंद नहीं है- उनसे असहमति का मतलब है पार्टी से बाहर का रास्ता।
यह अंतर जरूर है कि दिल्ली आने के पहले नरेंद्र मोदी चार बार गुजरात के मुख्यमंत्री रहे, लेकिन ये भी नहीं भूलना चाहिए कि दिल्ली में अरविंद केजरीवाल ने जिस भारी अंतर के साथ दो-दो बार विजय हासिल की है वैसा बहुमत नरेंद्र मोदी को मुख्यमंत्री के रूप में गुजरात में कभी नहीं मिला। दिल्ली चुनाव में इस बार मिला बहुमत विशेष रूप से खास है - क्योंकि आप को मिला 62 सीटों का ये बहुमत खुद नरेंद्र मोदी और अमित शाह की नाक के नीचे, उनसे दो-दो हाथ करके हासिल किया गया है।
अब देखना ये होगा की अरविंद केजरीवाल क्या नरेंद्र मोदी से मुकाबला करते करते खुद भी मोदी ही बन जाएंगे और क्या वे इस तरह से खुद मोदी को उनकी ही चालों से मात दे पाएंगे...या फिर केजरीवाल अपनी राजनीति दिल्ली तक ही सीमित रखेंगे। लेकिन दिल्ली मॉडल ऑफ डेवलपमेंट की जिस तरह से चर्चा पूरे देश में होने लगी है, उससे साफ है कि भारत को भी एक विकल्प की तलाश तो है। अब ये तो आगे आने वाला वक्त ही बताएगा कि देश में कौन सा मॉडल ऑफ डेवलपमेंट चलता है और देश राजनीति के किस मॉडल पर आगे बढ़ता है। लेकिन इतना तय लग रहा है भारत की भावी राजनीति का रास्ता इसी मंथन से होकर निकलेगा।

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