दफ्तरों में कम्प्यूटर के आगे घंटों वक्त बिताने वाले नौकरीपेशा माता-पिताओं की जिंदगी हर रोज चुनौतियों से भरी होती है। माता-पिता होना अपने आप में एक फुलटाइम जिम्मेदारी है, उस पर से फुलटाइम नौकरी। इन दोनों जिम्मेदारियों को निभाने में पैरेंट्स को तमाम तरह की मुश्किलों, तनावों के साथ ग्लानिभाव से भी गुजरना पड़ता है। पर यह मामला एकतरफा नहीं, माता-पिता के लिए यह जितना मुश्किलों भरा है, उससे जरा भी कम बच्चों के लिए नहीं। पूरा दिन दफ्तर और यात्राओं में बिता देने वाले माता-पिता से बच्चों का घटता संवाद, उनके मानसिक और भावनात्मक विकास में बाधक बन जाता है।