She News : 'जिदंगी में जीत के लिए हार का स्वाद भी जरूरी'

प्रेरणा : ऑर्थोपेडिक सर्जन डॉ. मधुलिका चंद्राकर श्रीवास्तव कहती हैं कि मैं जीवन में कुछ अलग हटकर करना चाहती थी, इसलिए ऑर्थोपेडिक सर्जरी के क्षेत्र में कदम रखा, जहां पुरुषों का वर्चस्व रहा है।

By: Neeru Yadav

Published: 20 Apr 2021, 12:06 PM IST

दाक्षी साहू. भिलाई. 'मैंने जीवन में कभी हारना नहीं सीखा था, लेकिन मेडिकल प्रवेश परीक्षा के पहले प्रयास में असफल हो गई थी। प्रतिभाशाली छात्रा होने के नाते ये असफलता मुझे इतनी खली कि दो महीने तक डिप्रेशन में रही, लेकिन आज जब खुद को इस मुकाम पर खड़ा हुआ देखती हूं, तो सोचती हूं कि जीवन में हार का स्वाद भी जरूरी है, क्योंकि हार के बाद जीतने का जुनून बढ़ जाता है।'

यह कहना है दुर्ग की रहने वाली ऑर्थोपेडिक सर्जन डॉ. मधुलिका चंद्राकर श्रीवास्तव का। वे कहती हैं कि मेरे पिता टीआर चंद्राकर सरकारी स्कूल में शिक्षक थे। वे चाहते थे कि मैं डॉक्टर बनूं, लेकिन उनके वेतन से ज्यादा मेडिकल की पढ़ाई की फीस थी। उन्होंने मुझे पढ़ाने के लिए कर्ज लिया। मैंने चिकित्सा में उस क्षेत्र को चुना, जिसे सामान्यत: महिला डॉक्टरों के लिए अनुकूल नहीं माना जाता।


यह तुम्हारे बस की बात नहीं

एमबीबीएस के बाद मधुलिका ने पीजी प्रवेश परीक्षा उत्तीर्ण करके ऑर्थोपेडिक सर्जरी के क्षेत्र को चुना। वे कहती हैं कि साथी पुरुष डॉक्टर कहा करते थे कि ये तुम्हारे बस की बात नहीं। तुम्हें स्त्री रोग या फिर शिशु रोग विशेषज्ञ बनना चाहिए। क्या हड्डियों व मांसपेशियों के साथ जिंदगीभर जूझती रहोगी?


महिला डॉक्टरों को मिली नई राह

डॉ. मधुलिका कहती हैं कि मैं जीवन में कुछ अलग हटकर करना चाहती थी, इसलिए ऑर्थोपेडिक सर्जरी के क्षेत्र में कदम रखा, जहां पुरुषों का वर्चस्व रहा है। उनके इस क्षेत्र में आने से कई महिला डॉक्टर को नई राह मिली है। फिलहाल वे आदिवासी बाहुल्य जशपुर के जिला अस्पताल में सेवाएं दे रही हैं।

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