फिल्म और कविता को समान मानते थे हिंदी के वरिष्ठ कवि कुंवर नारायण

Navyavesh Navrahi

Publish: Nov, 15 2017 03:31:34 (IST)

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फिल्म और कविता को समान मानते थे हिंदी के वरिष्ठ कवि कुंवर नारायण

ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता कुंवर नारायण का 90 साल की उम्र में निधन हो गया। साहित्य के साथ-साथ वे फिल्मों पर लेखन के लिए भी जाने जाते हैं...

नई दिल्ली। ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित हिंदी के वरिषठ कवि कुंवर नारायण का बुधवार सुबह अपने घर में निधन हो गया। वे 90 साल के थे। पिछले 51 साल से साहित्य के क्षेत्र में सक्रिय थे। दिल्ली के सीआर पार्क में सुबह उन्होंने अपनी अंतिम सांसें लीं। यहां वे पत्नी और बेटे के साथ रहते थे। अपनी पुस्तक 'चक्रव्यूह' के साथ साल 1956 उन्होंने साहित्य के क्षेत्र में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई थी।

ऐसे आए लेखन में
उत्तर प्रदश के फैजाबाद में 19 सितंबर, 1927 को उनका जन्म हुआ था। लखनऊ यूनिवर्सिटी से इंग्लिश साहित्य में लिटरेचर में पोस्ट ग्रैजुएशन करने के बाद वे परिवार के ऑटोमोबाइल बिजनेस से जुड़े लेकिन ज्यादा समय तक उनका मन इनमें नहीं लगा। वे आचार्य कृपलानी, सत्यजीत रे और आचार्य नरेंद्र देव के प्रभाव से लेखन के क्षेत्र में आ गए। वे राजनैतिक विवादों से हमेशा दूरी बनाए रखते थे।

कविता पर मिली थी धमकी
कुंवर नारायण कविता, महाकाव्य, निबंध, कहानियां, आलोचना, सिनेमा और कला पर लिखते रहे हैं। हालांकि मूल रूप में उन्हें कवि के रूप में ही जाना गया। कहा जाता है कि कुंवर को कबीर की कविताएं, उपनिषण, अमीर खुसरो और गालिब जुबानी याद थी। 'अयोध्या 1992' कविता पर उन्हें धमकी भी मिली थी।

फिल्मों पर भी लिखते थे
फिल्म समीक्षा तथा अन्य कलाओं पर भी उनके लेख नियमित रूप से पत्र-पत्रिकाओं में छपते रहे हैं। वे फिल्म और कविता को समान मानते थे। उनका कहना था कि - 'जिस तरह फिल्मों में रशेज इकट्ठा किए जाते हैं और बाद में उन्हें संपादित किया जाता है उसी तरह कविता रची जाती है। फ़िल्म की रचना-प्रक्रिया और कविता की रचना-प्रक्रिया में साम्य है।

अनुवाद भी किया
उन्होंने अनेक अन्य भाषाओं के कवियों की रचनाओं का हिंदी में अनुवाद किया। उनकी उनकी स्वयं की कविताओं और कहानियों के कई अनुवाद विभिन्न भारतीय और विदेशी भाषाओं में हुए। 'आत्मजयी' का 1989 में इतालवी अनुवाद रोम से प्रकाशित हो चुका है। 1973 से 1979 तक वे'संगीत नाटक अकादमी' के उप-पीठाध्यक्ष भी रहे। कुंवर जी ने 1975 से 1978 तक अज्ञेय द्वारा सम्पादित मासिक पत्रिका में सम्पादक मंडल के सदस्य के रूप में भी कार्य किया।

ये मिले सम्मान
कुंवर को 41वां ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला था। साल 1995 में उन्हें साहित्य अकादमी और साल 2009 में उन्हें पद्म भूषण अवार्ड मिला था। इसके अलावा 'व्यास सम्मान', 'कुमार आशान पुरस्कार', 'प्रेमचंद पुरस्कार', 'राष्ट्रीय कबीर सम्मान', 'शलाका सम्मान', 'मेडल ऑफ वॉरसा यूनिवर्सिटी', पोलैंड और रोम के 'अन्तर्राष्ट्रीय प्रीमियो फेरेनिया सम्मान' से भी सम्मनित किया गया था।

प्रमुख रचनाएं
कुंवर नारायण की प्रमुख रचनाओं में कविता संग्रह -चक्रव्यूह (1956), तीसरा सप्तक, (1959), परिवेश : हम-तुम (1961), अपने सामने (1979), कोई दूसरा नहीं (1993), इन दिनों (2002)।खंड काव्य - आत्मजयी (1965) और वाजश्रवा के बहाने (2008) हैं। उनकी अन्य महत्वपूर्ण कृतियों में कहानी संग्रह- आकारों के आसपास (1973), समीक्षा विचार श्रेणी में- आज और आज से पहले (1998), मेरे साक्षात्कार (1999), साहित्य के कुछ अन्तर्विषयक संदर्भ (2003) शामिल हैं।

 

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