
Neeraj Chopra
नीरज चोपड़ा के टोक्यो ओलंपिक खेलों में स्वर्ण पदक जीतने के बाद जेवलिन थ्रो (भाला फेंक) को लेकर युवाओं में उत्सुकता बढ़ गई है। कई अन्य खेलों की तरह जेवलिन थ्रो में सिर्फ ताकत ही नहीं बल्कि तकनीक का भी अहम योगदान रहता है। नीरज ने स्वर्ण पदक जीतने के दौरान जो थ्रो फेंकी थी, वो करीब 100 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से थी। एक नजर जेवलिन थ्रो के तकनीकी पहलुओं पर...
आसान नहीं होता जेवलिन फेंकना
वैसे जेवलिन थ्रो देखने में आसान खेल लगता है लेकिन ऐसा है नहीं। जेवलिन में ताकत और तकनीक दोनों बहुत अहम होती हैं। जेवलिन थ्रो करते समय एथलीट को दो चीजों का खास ध्यान रखना पड़ता है, दौड़ और कदमों को जमीन पर रखने का तरीका।
जेवलिन को उठाने के कई तरीके होते है और इसी तरह उसे फेंकना भी किसी चुनौती से कम नहीं है। जेवलिन छोड़ते समय एथलीट को अपने हाथ के एंगल, शरीर की पोजिशन और आखिरी थ्रो मूवमेंट पर ध्यान देना होता है।
थ्रो करने के तीन तरीके-
अमरीकन ग्रिप -
यह जेवलिन पकडऩे का सबसे आसान तरीका है। इसमें अंगूठा और पहली अंगुली ग्रिप कॉर्ड के पीछे सपोर्ट देती है।
फिनिश ग्रिप-
इसमें जेवलिन को हथेली पर रखा जाता है और फिर अंगूठे से ऊपर से जेवलिन पर कसा जाता है। नीरज चोपड़ा इसी ग्रिप का इस्तेमाल करते हैं।
वी ग्रिप या द क्लॉ -
इसमें पहली व दूसरी अंगुली के बीच बनने वाले वी के बीच भाला रहता है।
इस तरह लगाई जाती है दौड़, हर कदम अहम-
द रनअप एंड क्रॉसओवर-
भाला फेंकने से पहले खिलाडी करीब 15 कदम की तेज दौड़ लगाता है, जिसे रनअप कहा जाता है। इस दौड़ के अखिर के कुछ कदम क्रॉसओवर स्टेप्स कहलाते हैं।
द फाइनल या डिलिवरी-
इस आखिरी स्टेप में एथलीट दौड़ द्वारा अर्जित की हुई गति भाले में डालने की कोशिश करता है। इस आखिरी स्टेप को कामयाब करने के लिए खिलाड़ी के पैरों, टांगों और एडिय़ों का मजबूत होना जरूरी है। इसीलिए नीरज चोपड़ा खेल से पहले हाई जंप का अभ्यास करते थे।
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32-36 डिग्री एंगल जरूरी-
द थ्रो-भाला फेंकने के लिए सबसे अनुकूल एंगल 32 डिग्री से 36 डिग्री के बीच होना चाहिए। वहीं, भाला ज्यादा ऊंचा नहीं जाना चाहिए।
फाउल लाइन-
एथलीट को यह भी ध्यान रखना होता है कि वह निर्धारित लाइन पार न कर दे। ऐसा करने पर खिलाड़ी का फेंका गया थ्रो फाउल माना जाता है।
Published on:
11 Aug 2021 03:54 pm

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