
टोंक. जब मन में कुछ कर गुजरने के मजबूत इरादे हों तो कठिनाइयां भी बौनी साबित हो जाती है। चार वर्ष की उम्र में बाल विवाह की बेडिय़ों में जकड़ी सोना बैरवा के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ, लेकिन उसने अपने इरादों में बाधाओं सामना कर आज मिसाल बन गई है।
विजय जैन
टोंक. जब मन में कुछ कर गुजरने के मजबूत इरादे हों तो कठिनाइयां भी बौनी साबित हो जाती है। चार वर्ष की उम्र में बाल विवाह की बेडिय़ों में जकड़ी सोना बैरवा के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ, लेकिन उसने अपने इरादों में बाधाओं सामना कर आज मिसाल बन गई है।
सोना का जन्म सांखना ग्राम पंचायत के राजनगर गांव में 2 अप्रेल 1993 में हुआ। चार वर्ष की उम्र में चार बहनों के साथ उसका बाल विवाह कर दिया गया। इनमें से सोना एवं बड़ी बहन राजन्ती का विवाह एक ही परिवार में किया गया।
गांव में कक्षा तीन एवं सांखना में कक्षा छह तक पढ़ाई करने के बाद उसने आगे पढ़ाई के लिए बारह वर्ष की उम्र में डा. भीमराव अम्बेडकर आवासीय विद्यालय आटूंदा में दाखिला करवाया। कक्षा आठ तक पढऩे के बाद गर्मी की छुट्टियों में घर आने पर सोना परससुराल से पढ़ाई छोड़ कर पति के साथ रहने का दबाव बनाया गया।
माता-पिता ने भी ससुरालजनों के साथ सहमति दे दी, लेकिन सोना मना कर वापस पढ़ाई करने चली गई। ऐसे में उसकी बड़ी बहन राजन्ती से भी दबाव बनवाया गया। ससुराल पक्ष के तानों के बीच आवासीय विद्यालय में कला वर्ग से कक्षा 12 प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण कर 2008 में घर आ गई।
किसी से भी बोलने पर धमकी
आर्थिक तंगी कॉलेज में प्रवेश के लिए बाधा बनी तो सोना ने घर पर सिलाई एवं बच्चों को पढ़ाने का काम शुरू किया। वहीं कॉलेज जाने पर पति ने रास्ते में रोक कर और मोबाइल एवं पर्स छीन कर देख लेनेे जैसी हरकतें शुरू कर दी। वहीं किसी से बोलते हुए देख लेने पर धमकाना आम बात हो गई।
जमीन गिरवी रखनी पड़ी
बीए करने के बाद बीएड कॉलेज में दाखिला लेने के लिए रुपयों की आवश्यकता आ पड़ी। सोना के पिता ने आर्थिक तंगी के चलते उसके ससुर से फीस जमा करवाने को कहा। इस पर ससुराल पक्ष ने पढ़ाई छोड़ कर खेती में सहयोग को कहा, लेकिन सोना के मजबूत इरादे देख जमीन गिरवी रख फीस जमा करवाई।
पढ़ाई का बहाना कर ले गए
सोना की लगन देख ससुराल पक्ष के लोग उसे पढ़ाने एवं प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी का आश्वासन देकर जून 2016 को ले गए। इस दौरान उन्होंने पति के साथ उसे तीन माह तक टोंक रखा। एक माह कोचिंग सेंटर ढूंढने में लगा दिया एवं एक माह कोचिंग में बिना फीस दिए ही भेजते रहे। इस दौरान आर्थिक का बहाना बना कर उससे आभूषण भी ले लिए। सोना के बीमार पडऩे पर उसे वापस पिता के घर छोड़ दिया। इसके बाद जून 2017 में उनका तलाक हो गया।
लगन को मिली पहचान
सोना ने हिम्मत नहीं हारी और परिवार का खर्च चलाने एवं तीन छोटी बहिनों को पढ़ाने के लिए उसने लाडो प्रोजेक्ट से जुड़ गई। अभी टोंक की 11 ग्राम पंचायतों में बालिका शिक्षा में सम्बल का कार्य कर रहे है।
अपने संघर्ष के बूते पर उसे अब तक गरिमा अवार्ड, लाडली अवार्ड, बेटी बचाओं-बेटी पढ़ाओं अवार्ड से सम्मानित हो चुकी है। इसके अलावा जयपुर में यूनिसेफ के लाडो प्रोजेक्ट चीफ सैम्यूअल मेनवांडिस और राज्य महिला आयोग अध्यक्ष सुमन शर्मा से सम्मानित हो चुकी है। साथ ही एक दिन की महिला एवं बाल विकास मंत्री भी रह चुकी है।
Published on:
12 Jul 2018 07:45 am
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