सैचुरेशन 95 फिर भी चढ़ा रहे थे ऑक्सीजन, कमेटी ने पकड़ी कई गड़बडिय़ां

प्राइवेट अस्पताल आए संदेह के घेरे में

By: Mukesh Kumar Hinger

Updated: 09 May 2021, 11:46 AM IST

मुकेश हिंगड़ / उदयपुर. कोरोना की दूसरी लहर आई। संक्रमित मरीजों की संख्या का ग्राफ एकाएक बढ़ा। अस्पतालों में मरीजों की लाइन लग गई। जान बचाने के लिए ऑक्सीजन का संकट हो गया और बेड भी कम हो गए। हाहाकार मचा और उसी समय जिला कलक्टर चेतन देवड़ा ने ऑक्सीजन की ऑडिट के लिए एक कमेटी का गठन किया जिसकी रिपोर्ट में कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए।
अप्रेल महीने में बिगड़ी स्थिति के बाद सबसे ज्यादा जरूरत अधिकतर मरीज को ऑक्सीजन की थी। जिला कलक्टर ने ऑक्सीजन की इस किल्लत व वास्तवित स्थिति को समझने व मूंल्याकन के लिए दो आईएएस अफसरों के साथ पांच डॉक्टरों की एक टीम बनाई जिसको उदयपुर में ऑक्सीजन की ऑडिट करने को कहा। इस टीम ने जब निजी व सरकारी अस्पतालों में जाकर दौरें किए और पूरी रिपोर्ट तैयार किए तो सामने आया कि मरीजों के सैचुरेशन 95 फिर भी चढ़ा रहे थे ऑक्सीजन तो कई जगह छूट्दी देने की स्थिति में मरीज था फिर भी भर्ती थे। कमेटी ने पकड़ी कई गड़बडिय़ां पकड़ी और निजी चिकित्साल संदेह के घेरे में आए। बाद में कई तरह की चेक लिस्ट बनाई गई और उस पर नियमित निगरानी करते हुए समीक्षा शुरू की गई। ऑडिट कमेटी की तैयार रिपोर्ट राज्य सरकार को भेजी गई। जिसमें आक्सीजन के अपव्यय की जानकारी दी गई।

इन चार अस्पतालों में गई टीमें
- एमबी हॉस्पिटल
- ईएसआईसी हॉस्पिटल
- गीतांजलि हॉस्पिटल
- पेसिफिक हॉस्पिटल उमरड़ा

ऑडिट कमेटी में ये अफसर शामिल
- सीइओ जिला परिषद डा. मंजू
- मावली उपखंड अधिकारी मंयक मनीष
- आरएनटी के उप प्राचार्य डा. ललित रेगर
- आरएनटी के एनेस्थिसिया डा. खेमराज मीणा
- एनेस्थिस्ट डा. विक्रम बेदी
- बायोमेडिकल इंजीनियर जतिन
- बायोमेडिकल इंजीनियर पीयुष कानोडिय़ा

अस्पतालों में जांच में यह सब मिला
- ऑक्सीजन के प्रवाह की नियमित निगरानी नहीं
- निगरानी के लिए वार्ड में किसी की नियुक्ति नहीं
- मरीज खाना खा रहा या टॉयलेट के लिए गया तब भी ऑक्सीजन का प्रवाह चालू
- कुछ मरीजों को छूट्टी दी जा सकती है लेकिन फिर भी वे ऑक्सीजन बेड पर थे
- निजी अस्पतालों के प्राइवेट वार्डों में ऑक्सीजन का मिस यूज देखा गया
- कुछ वार्ड बॉय, नर्सिंग अटेडेंट, नर्सिंग इंचार्ज, रेजीडेंट आदि ऑक्सीजन की खपत एवं संकट को लेकर प्रशिक्षित नहीं मिले
- तकनीकी रूप से ऑक्सीजन के फॉल्ट, प्रेशस व लीकेज आदि की जांच तक नहीं करते थे
- अस्पतालों ने भर्ती मरीजों की वास्तविक स्थिति में भी गड़बडिय़ां थी
- अस्पतालों के अंदर ऑक्सीजन ऑडिट कमेटी भी नहीं बना रखी थी

बाद में कमेटी ने सुझाव दिए कि
- ऑक्सीजन का कोटा गंभीर मरीजों के अनुपात के अनुसार तय किया जाए।
- मरीजों के चार्ट पर नियमित निगरानी रखी जाए और जिनको ऑक्सीजन की जरूरत नहीं है उनको डिस्चार्ज किया जाए।
- नर्सिंग स्टाफ के पास प्रत्येक मरीज का ऑब्जर्वेशन चार्ट होना चाहिए।
- स्टाफ के पास प्रेशर की जांच की डिवाइस होनी चाहिए, अस्पतालों में कमेटी बनाई जाए जो नियमित निगरानी रखे, ऑकसीजन का रिकार्ड संधारित किया जाए, रेंडम जांच भी होनी चाहिए।
- अस्पतालों को जल्दी से ऑक्सीजन कॉन्सेन्टेऊटर खरीदने चाहिए।
- नोडल अधिकारियों को अस्पतालों में ऑक्सीजन के सैचुरेशन पर निगरानी की जरूरत है।
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अस्पतालों की चैक लिस्ट ऐसे बनाई

- ऑक्सीजन के पाइप व सिस्टम लीकेज की जांच हो
- मरीज व उसके परिजन अपने स्तर पर ऑक्सीजन की सप्लाई नहीं बढ़ाए इस पर निगरानी हो
- मरीज खाना खाए, वॉशरूम जाए तब ऑक्सीजन सप्लाई वार्ड स्टाफ से बंद करवाए
- डॉक्टर एवं वार्ड में उपस्थित स्टाफ द्वारा मरीज को प्रोन पॉजिशन में लैटाया जाए, इसके लिए वार्ड में पोस्टर भी लगाए जाए।
- मरीजों को समझाया जाए कि सैचुरेशेन का स्तर 90-94 प्रतिशत उचित रहता है तथा 95 प्रतिशत से अधिक सेचुरेशन पर अतिरिक्त ऑक्सीजन की जरूरत नहीं होती है।
- कम ऑक्सीजन मांग तथा अधिक ऑक्सीजन मांग के मरीजों के प्रतिशत की जांच करें
- प्रति मरीज कितने ऑक्सीजन सिलेंडर इस्तेमाल कर रहे है इसकी भी जांच की जाए
- सिलेंडर एकत्रित तो नहीं किए गए या कोई कालाबाजारी तो नहीं की जा रही है, इसकी जांच की जाए
- यह भी जांच की जाए कि क्या मरीज 14 दिन से पूर्व डिस्चार्ज किए जा सकते है
- यह भी जांच की जाए कि क्या मरीज को ऑक्सीजन की आवश्यकता नहीं होने पर भी वह भविष्य में बेड नहीं मिलने के डर मात्र से अस्पताल में जानबुझकर अनावश्यक भर्ती है।
- रखरखाव व मरम्मत की क्या व्यवस्था है, इसकी जांच करें
- नर्सिंगकर्मी प्रत्येक दो से तीन घंटे में मरीज के सेचुरेशन लेवल जांचते रहे।

Mukesh Kumar Hinger Desk
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