पीएम मोदी के बारे में बोले जलपुरुष डॉ. राजेन्द्र सिंह- गंगा शक्ति देती है तो छीन भी लेती है...

पीएम मोदी के बारे में बोले जलपुरुष डॉ. राजेन्द्र सिंह- गंगा शक्ति देती है तो छीन भी लेती है...

By: govind saxena

Published: 06 Jun 2018, 04:37 PM IST

विदिशा. जल पुरुष के रूप में ख्याति प्राप्त पर्यावरणविद् डॉ. राजेन्द्र सिंह ने पानी के वाष्पीकरण की बेहद जरूरत बताई है। उन्होंने नदियों की दुर्दशा के लिए नेताओं को जिम्मेदार बताते हुए उन्हें बेपानी करार दिया। प्रधानमंत्री मोदी पर भी उन्होंने निशाना साधते हुए कहा कि गंगा की हालत आज बहुत बुरी है। गंगा यदि शक्ति देती है तो छीन भी लेती है।

बेतवा में सुबह श्रमदान करने और काग उद्यान का उद्घाटन करने के बाद डॉ. राजेन्द्र सिंह एसएटीआई में पत्रकारवार्ता को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि भारत में २ लाख ५६ हजार गांव में पीने लायक पानी नहीं है। यह सरकार का ही आंकड़ा है। नेताओं की आंखों में पानी नहीं बचा। गंगा पर पूछे एक सवाल के जवाब में डॉ. सिंह ने कहा कि मोदी को गंगा किनारे की सारी सीटें मिलीं, लेकिन गंगा की दुर्दशा कम नहीं हो सकी। वे बोले कि गंगा शक्ति देती है तो शक्ति छीन भी लेती है।

डॉ. सिंह ने कहा कि मप्र इस वक्त पानी की कमी से जूझ रहा है। नेताओं की आंखों में पानी नहीं बचा, इसलिए पानी की कमी आ गई है। मप्र में यदि अब भी वाष्पीकरण नहीं रोका गया तो मप्र बेपानी हो जाएगा। उन्होंने कहा कि विदिशा की जमीन से ४३ प्रतिशत पानी का हर साल वाष्पीकरण हो रहा है।

उन्होनें कहा कि इस समय भारत में ग्रामों पर बिल्कुल ध्यान नहीं दिया जा रहा। पूरा ध्यान बहुराष्ट्रीय कंपनियों और उद्योगपतियों पर है। आज लोकतंत्र लोगों का तंत्र नहीं बल्कि उद्योगपतियों का तंत्र बन गया है। अडानी और अंबानी केवल दो परिवारों का ही भारत में राज चलता है। नदी को प्रदूषित करने, दोहन करने, नदी क्षेत्र पर कब्जा करने वालों को ही सबसे बड़ी मालाएं पहनाई जाती हैं।

उन्होंने विदिशा सांसद सुषम स्वराज द्वारा बेतवा की अनदेखी पर पूछे गए सवाल पर कहा कि जो विदेशों में कामकाज संभाल रहीं हैं, उन्हें अपने संसदीय क्षेत्र की सुध लेने का समय कहां। उनकी आंखों में पानी बचेगा तभी वे अपने संसदीय क्षेत्र की नदी के लिए कुछ कर पाएंगी।

डॉ. सिंह ने केन्द्र सरकार की बेतवा-केन लिंक परियोजना को रिजेक्ट करते हुए कहा कि ये परियोजना सामाजिक न्याय के खिलाफ है। यह मप्र और उप्र के बीच संबधों, दोनों राज्यों की अर्थव्यवस्था, कृषि और पर्यावरण के लिए शुभ नहीं है।

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