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सोशल मीडिया ने मार डाली हमारी यह परंपरा

संजा बाई तु थारे घर जा, थारी बाई मारेगी-कुटेगी जैसे गीतों से पहले शाम होते ही हर गांव शहर के गली-मोहल्ले गूंज उठते थे,
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अगार मालवा

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Lalit Saxena

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Updated: 27 Sep 2018, 9:00 AM IST

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संजा बाई तु थारे घर जा, थारी बाई मारेगी-कुटेगी जैसे गीतों से पहले शाम होते ही हर गांव शहर के गली-मोहल्ले गूंज उठते थे,

आगर-मालवा. संजा बाई तु थारे घर जा, थारी बाई मारेगी-कुटेगी जैसे गीतों से पहले शाम होते ही हर गांव शहर के गली-मोहल्ले गूंज उठते थे, अब सोशल मीडिया के जमाने में धीरे-धीरे हमारी प्राचीन संस्कृति तथा परंपराएं लुप्त होती जा रही हैं। उत्सवों के अवसर पर सुनाई देने वाले लोक गीतों में झलकती हमारे देश की गौरवशाली संस्कृति नई पीढ़ी को सुनने को नहीं मिल रही है। कुछ इसी प्रकार की स्थिति संजा पर्व की निर्मित हो चुकी है। इन दिनों श्राद्ध पक्ष चल रहा है साथ ही संजा पर्व भी इस समय चल रहा है लेकिन संजा बनाने की परंपरा अब जैसे खत्म सी हो गई है। शहरों के साथ कस्बों और गांवों में यह परंपरा मानो गायब सी हो गई है अब यदा-कदा ही बालिकाएं संजा बनाती और गीत गुन-गुनाती हुई दिखाई देती हैं।
कुछ वर्षों पूर्व श्राद्ध पक्ष में शाम होते ही संजा के लोकगीत सुनाई देने लग जाते थे लेकिन नई पीढ़ी मानो तो संजा पर्व मनाना ही भूल गई है साथ ही इनको इस पर्व की महत्ता भी समझ नहीं आती है कि यह पर्व क्यों मनाया जाता है बच्चियों, युवतियों के पास वक्त नहीं है। उन्हें पढ़ाई का टेंशन है जिससे उनका पूरा ध्यान कॅरियर की ओर रहता है फिर संजा बनाना, मनाना, गीत गाना अब पिछड़ेपन की निशानी मानी जाने लगी है यही कारण है कि शहर की पाश कॉलोनियों सहित निम्न व मध्यमवर्गीय ॉलोनियों में रस्म अदायगी के लिए पर्व मन रहा
है पर गोबर से बनी हुई संजा के स्थान पर कागज पर उकेरी गई संजा को दीवारों चिपकाकर काम चला लेते हैं।
पहले रहती थी रौनक
एक वक्त था जब श्राद्ध पक्ष में संजा ढलने को होती और बालिकाएं व युवतियां आरती की तैयारी करने लगती थी। घर की दीवार पर वर्गाकार में संजा बनाना शुरू करती उस पर फूल, पंखुडिय़ां व चमक आदि लगाती, सजाती और पूरे मोहल्ले की सहेलियों को बुलाकर गीत गाती, आरती उतारती, प्रसाद बांटती और फिर दूसरी सहेली के घर जाकर वहां भी इस क्रम को दोहराती। दूसरे दिन फिर से दीवार पर उस स्थान को लिपा जाता जहां संजा बनाई जाती थी और फिर से नई आकृति में संज्ञा बनाई जाती यही क्रम १६ दिनों तक चलता था।
अब प्रिंटेड की होती है आरती
वक्त के साथ लोगों का नजरिया बदला और गोबर से बनने वाली संजा का स्थान प्रिंटेड संजा ने ले लिया। इसमें रोज-रोज अब नई संजा बनाने की आवश्यकता नहीं पड़ती। दीवार पर चिपकाया गया कागज रोज काम में आ जाता है। इधर परंपरा का निर्वहन करते हुए इन दिनों शहर के कुछ क्षेत्रों में महिलाओं व बालिकाएं जरूर शाम होने के बाद संजा बनाती हैं। जब इस संबंध में महिलाओं से चर्चा की गई तो उन्होंने बताया इस प्रकार गतिविधि से परंपराएं जीवित रहेंगी।