आजाद भारत के पहले संन्यासी सांसद स्वामी ब्रह्मानंद, लोधी समाज मना रहा 125वीं जयंती, देखें वीडियो

-वीरांगना अवंतीबाई लोधी के बाद स्वामी ब्रह्मानंद का नाम लिया जाता है

-लोधी समाज पूरे देश में मना रहा 125वीं जयंती, कभी पैसा नहीं छुआ

-बुंदेलखंड की अशिक्षा एवं पिछड़ेपन को दूर करने में दिया अहम योगदान

-आजादी के आंदोलन में कई बार जेल गए, हमीरपुर से दो बार सांसद बने

By: Bhanu Pratap

Published: 03 Dec 2019, 03:34 PM IST

वीरांगना अवंतीबाई लोधी के बाद लोधी समाज में सबस बड़ा नाम है स्वामी ब्रह्मानंद का। स्वामी ब्रह्मानंद ने समाज सुधार के लिए अने कार्य किए। देश की स्वतंत्रता के लिए उन्होंने स्वयं को समर्पित कर कई आंदोलनों में जेल काटी। आजादी के बाद देश की राजनीति में भी उनका खासा योगदान रहा है। स्वामी जी ने शिक्षा के क्षेत्र में बहुत ही कार्य किए। समाज के लोगों को शिक्षा की ओर ध्यान देने का आहवान किया। स्वामी ब्रह्मानंद महाराज का जन्म चार दिसंबर, 1894 को उत्तर प्रदेश के हमीरपुर जिले की राठ तहसील के बरहरा गांव में साधारण किसान परिवार में हुआ था। स्वामी ब्रह्मानंद के पिता का नाम मातादीन लोधी तथा माता का नाम जशोदाबाई था। स्वामी ब्रह्मानंद के बचपन का नाम शिवदयाल था। स्वामी ब्रह्मानंद ने बचपन से ही समाज में फैले हुए अंधविश्वास और अशिक्षा जैसी कुरीतियों का डटकर विरोध किया। वे आजाद भारत के पहले संन्यासी सांसद थे।

Swami brahmanand

24 वर्ष की आयु में साधु

स्वामी ब्रह्मानंद जी की प्रारम्भिक शिक्षा हमीरपुर में ही हुई। इसके पश्चात् स्वामी ब्रह्मानंद जी ने घर पर ही रामायण, महाभारत, गीता, उपनिषद और अन्य शास्त्रों का अध्ययन किया। इसी कारण लोग उन्हें स्वामी ब्रह्मानंद से बुलाने लगे। कहा जाता है कि बालक शिवदयाल के बारे में संतों ने भविष्यवाणी कि थी कि यह बालक या तो राजा होगा या प्रख्यात संन्यासी। बालक शिवदयाल का रुझान आध्यात्मिकता की तरफ ज्यादा होने के कारण पिता मातादीन लोधी को डर सताने लगा कि कहीं वे साधु न बन जाएं। इस डर से मातादीन लोधी ने स्वामी ब्रह्मानंद का विवाह सात वर्ष की उम्र में हमीरपुर के ही गोपाल महतो की पुत्री राधाबाई से करा दिया। आगे चलकर राधाबाई ने एक पुत्र और एक पुत्री को जन्म दिया। लेकिन स्वामी जी का चित्त अब भी आध्यात्मिकता की तरफ था। स्वामी ब्रह्मानंद जी ने 24 वर्ष की आयु में पुत्र और पत्नी का मोह त्याग गेरुए वस्त्र धारण कर परम पावन तीर्थ स्थान हरिद्वार में भागीरथी के तट पर ‘‘हर की पैड़ी’’ पर संन्यास की दीक्षा ली। संन्यास के बाद शिवदयाल लोधी संसार में ‘‘स्वामी ब्रह्मानंद’’ के रूप में प्रख्यात हुए।

महात्मा गांधी से संपर्क

संन्यास ग्रहण करने के बाद स्वामी ब्रह्मानंद ने सम्पूर्ण भारत के तीर्थ स्थानों का भ्रमण किया। उनका अनेक महान साधु संतों से संपर्क हुआ। इसी बीच उन्हें गीता रहस्य प्राप्त हुआ। पंजाब के बटिंडा में स्वामी ब्रह्मानंद जी की महात्मा गाँधी जी से भेंट हुई। गाँधी जी ने उनसे मिलकर कहा कि अगर आप जैसे 100 लोग आ जायें तो स्वतंत्रता अविलम्ब प्राप्त की जा सकती है। स्वामी ब्रह्मानंद ने पंजाब में अनेक हिन्दी पाठशालाएं खुलवायीं और गौवध बंदी के लिए आंदोलन चलाये। अनेक सामजिक कार्य किये। स्वामी जी सन् 1921 में गाँधी जी के संपर्क में आकर स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े। स्वतंत्रता आन्दोलन में भी स्वामी ब्रह्मानंद जी ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। 1928 में गाँधी जी स्वामी ब्रह्मानंद के प्रयासों से राठ पधारे। 1930 में स्वामी जी ने नमक आंदोलन में हिस्सा लिया। इस बीच उन्हें दो वर्ष का कारावास हुआ। उन्हें हमीरपुर, हरदोई और कानपुर की जेलों में रखा गया।

आजादी के आंदोलन में जेल

स्वामी ब्रह्मानंद ने पूरे उत्तर भारत में अग्रेजों के खिलाफ लोगों में अलख जगाई। स्वतंत्रता आन्दोलन के समय स्वामी जी का नारा था उठो! वीरो उठो!! दासता की जंजीरों को तोड फेंको। उखाड़ फेंको इस शासन को। एक साथ उठो। आज भारत माता बलिदान चाहती है। उन्होंने कहा था कि दासता के जीवन से मृत्यु कही श्रेयस्कर है। बरेली जेल में स्वामी ब्रह्मानंद की भेंट पंडित जवाहर लाल नेहरू जी से हुई। जेल से छूटकर स्वामी ब्रह्मानंद शिक्षा प्रचार में जुट गए। स्वामी जी ने सम्पूर्ण बुन्देलखंड में शिक्षा की अलख जगाई आज भी उनके नाम से हमीरपुर में डिग्री कॉलेज चल रहा है। जिसकी नींव स्वामी ब्रह्मानंद ने 1938 में ब्रह्मानंद विद्यालय के रूप में रखी। 1942 में स्वामी जी को पुनः भारत छोडडो आंदोलन में जेल जाना पड़ा। 1956 में स्वामी ब्रह्मानंद को अखिल भारतीय साधु संतों के अधिवेशन में आजीवन सदस्य बनाया गया और उन्हें कार्यकारिणी में भी शामिल किया गया। इस अवसर पर देश के प्रथम राष्ट्रपति स्वर्गीय डॉ. राजेंद्र प्रसाद सम्मिलित हुए।

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गौहत्या के खिलाफ आंदोलन

1966 में गौहत्या निषेध आंदोलन में स्वामी ब्रह्मानंद ने 10-12 लाख लोगों के साथ संसद के सामने आंदोलन किया। गौहत्या निषेध आंदोलन में स्वामी ब्रह्मानंद को गिरफ्तार कर तिहाड़ जेल भेज दिया गया। तब स्वामी ब्रह्मानंद ने प्रण लिया कि अगली बार चुनाव लड़कर ही संसद में आएंगे। स्वामी ब्रह्मानंद भारत के पहले सन्यासी थे जो आजाद भारत में सांसद बने एवं जिन्होंने बुंदेलखंड की अशिक्षा एवं पिछड़ेपन को दूर करने के लिए सशक्त कदम उठाए। जेल से मुक्त होकर स्वामी जी ने हमीरपुर लोकसभा सीट से जनसंघ से 1967 में चुनाव लड़ा और भारी मतों से जीतकर संसद भवन पहुंचे। स्वामी जी 1967 से 1977 तक सांसद रहे। देश की संसद में स्वामी ब्रह्मानंद जी पहले वक्ता थे जिन्होंने गौवंश की रक्षा और गौवध का विरोध करते हुए संसद में करीब एक घंटे तक अपना ऐतिहासिक भाषण दिया था। 1972 में स्वामी जी पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी के आग्रह पर कांग्रेस से चुनाव जीतकर संसद पहुंचे। पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी और राष्ट्रपति वीवी गिरि से स्वामी ब्रह्मानंद के काफी निकट संबंध थे।

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पैसा न छूने का प्रण आजीवन निभाया

स्वामी जी की निजी संपत्ति नहीं थी। संन्यास ग्रहण करने के बाद उन्होंने पैसा न छूने का प्रण लिया था और इस प्रण का पालन मरते दम तक किया। स्वामी ब्रह्मानंद अपनी पेंशन छात्र-छात्राओं के हित में दान कर दिया करते थे। समाज सुधार और शिक्षा के प्रसार के लिए उन्होंने अपना जीवन अर्पित कर दिया। वह कहा करते थे मेरी निजी संपत्ति नहीं है, यह तो सब जनता की है। कर्मयोगी शब्द का जीवंत उदाहरण यदि भारत देश में है तो स्वामी ब्रह्मानंद का नाम अग्रिम पंक्ति में लिखा है। कर्म को योग बनाने की कला अगर किसी में थी तो वो स्वामी ब्रह्मानंद ही थे।

रहता नाम अमर उन्हीं का जो दे जाते अनुपम थाती

आगरा के युवा लेखक ब्रह्मानंद राजपूत कहते हैं- स्वामी जी का वैराग्य नैसर्गिक था उनका वैराग्य स्वयं या अपने आप तक सीमित नहीं था। बल्कि उनके वैराग्य का लाभ सारे समाज को मिला। हमेशा गरीबों की लड़ाई लड़ने वाले बुन्देलखण्ड के मालवीय नाम से प्रख्यात, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, त्यागमूर्ति, सन्त प्रवर, स्वामी ब्रह्मानंद ऑ 13 सितम्बर 1984 को ब्रह्मलीन हो गए। लेकिन उनका जीवन और शिक्षाएं आज भी हमें राह दिखाती हैं। त्यागमूर्ति, सन्त प्रवर, स्वामी ब्रह्मानंद को उनकी 125वीं जन्म-जयंती 04 दिसम्बर 2019 पर नमन करते हुए कह सकते हैं-

‘‘लाखों जीते लाखों मरते याद कहा किसी की रह जाती,

रहता नाम अमर उन्हीं का जो दे जाते अनुपम थाती’’

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