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पति ने छोड़ी दुनियां : छह बेटियों को कैसे पालेगी मां, रोजगार का नहीं कोई जरिया

प्रवासी मजदूर पति की कुछ दिनों पहले हो गई मौत, विधवा बीवी व बच्चों के भूखे मरने की नौबत, लॉकडाउन के चलते कहीं मिल नहीं रही मजदूरी,विधायक ने सहायता का दिया आश्वासन,लेकिन कोई लाभ नहीं

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पति ने छोड़ी दुनियां : छह बेटियों को कैसे पालेगी मां, रोजगार का नहीं कोई जरिया

धौलपुर जिले के बसेड़ी गांव में अपनी छह बेटियों के साथ प्रवासी महिला श्रमिक।

ajmer अजमेर/धौलपुर. मुसीबत आती है तो वह किसी को कहकर नहीं आती। संकट के समय अपने भी पराए हो जाते हैं। एक हाथ-दूसरे को खाने दौड़ता है। मुसीबत का मारा इंसान सहायता के लिए हाथ फैलाने को मजबूर हो जाता है।

ऐसा ही एक मामला धौलपुर जिले के बसेड़ी निवासी प्रवासी एक बेवा श्रमिक महिला का है। इसकी छह बेटियां छोटी है। पति की मौत हो गई। घर के नाम कच्चा झौंपड़ा है। लॉकडाउन की अवधि तो जैसे-तैसे निकाल,लेकिन अब आर्थिक तंगी सता रही है। सरकारी सहायता भी नहीं मिल रही।

पीडि़ता ने जिला कलक्टर से कहा...साहब भूखे मरने की नौबत आ गई है... कोई भी हमें सहारा देने वाला नहीं मिल रहा....छोटी-छोटी छह बच्चियों की ङ्क्षचता सता रही है....आगे कैसे होगा हमारा गुजारा...ऐसी गुहार लगाकर यह महिला सहायता मांग रही है।

पैसों की कमी से पति का नहीं हुआ इलाज

उल्लेखनीय है कि बसेड़ी क्षेत्र के गांव नौनेरा निवासी श्रमिक राजेश शर्मा अपने परिवार के साथ फर्रुखाबााद में पत्थरों का काम कर रहा था। इस दौरान 23 मार्च को देश में लॉकडाउन के बाद फैक्ट्री बंद कर दी गई। राजेश अपनी पत्नी व छह पुत्रियों को लेकर गांव बसेड़ी आ गया। यहां उसकी तबीयत खराब हो गई। पैसों की कमी के चलते इलाज समय पर नहीं हो पाया। इसके चलते 10 मई को राजेश ने दम तोड़ दिया।

दर-दर भटकने को मजबूर मजदूर परिवार

प्रवासी श्रमिक राजेश की मृत्यु के बाद उसके परिवार में छह पुत्रियों की जिम्मेदारी पत्नी पर आ गई है। गांव व घर के आसपास रहने वालों ने कुछ दिनों तक तो सहयोग भी दिया, लेकिन समय के साथ धीरे-धीरे सभी दूर होते चले गए। ऐसे में प्रवासी श्रमिक का परिवार भूखे मरने की नौबत पर है।

सता रही भविष्य की चिंता

प्रवासी श्रमिक की बेबा ने बताया कि उसकी 8 बेटियां है। इनमें से दो बेटियों की शादी हो गई है। वर्तमान में उसके साथ 6 बेटियां रहती है। इनमें सबसे बड़ी बेटी की उम्र 12 साल और सबसे छोटी बेटी 6 महीने है।

लॉकडाउन के चलते कहीं भी काम नहीं मिल रहा है। इसके चलते घर में अब तो राशन के लिए पैसे नहीं बचे हैं। घर का चूल्हा कभी जलता है तो कभी नहीं। प्रवासी मजदूरों के लिए कुछ समाजसेवी खाना वितरित कर रहे हैं। इससे फिलहाल पेट भर रहे हैं। बाद में क्या होगा। यहीं चिंता सता रही है।

सरकारी योजनाओं का नहीं मिला लाभ

सरकार से मिलने वाली सरकारी योजनाओं से प्रवासी श्रमिक का परिवार वंचित है। प्रवासी श्रमिक का जो घर गांव में है उसमें एक कमरा है, जिसकी छत पर भी टीन की है। खाद्य सुरक्षा योजना में मृतक राजेश के माता-पिता का नाम है। राशन कार्ड में जुड़ा होने से 15 किलो गेहूं मात्र ही परिवार को दिए जा रहे हैं ।

कह तो गए विधायक...पर करें कौन

विधायक खिलाड़ी लाल बैरवा ने प्रवासी श्रमिक की बेवा ने प्रशासनिक अधिकारियों से राशन सामग्री उपलब्ध कराने व दस्तावेज तैयार करा मनरेगा में कार्य दिलाने की बात कही है। इसके बावजूद 10 किलो आटा, आधा किलो तेल व आधा किलो दाल प्रवासी श्रमिक के परिवार को उपलब्ध जरूर कराया गया जो खत्म हो गया।

जिला कलक्टर से आस

तमाम परेशानियों से घिरे प्रवासी श्रमिक के परिवार को अब जिला प्रशासन से आस है। पीडि़ता का कहना है कि जिला कलक्टर ही उन्हें काम दिला सकते हैं, वह उनसे मिलने जाएगी। परिवार की परेशानी उन्हें बताएगी। अगर काम मिल जाता है तो परिवार लालन-पालन हो सकेगा।

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