
बांसवाड़ा. दक्षिण राजस्थान के जनजाति बहुल और पिछड़े इलाकों में गहराई तक पैठी नाता प्रथा का सबसे स्याह पक्ष मासूम बच्चों का भविष्य बर्बाद कर रहा है। पति से अनबन, आर्थिक तंगी, बीमारी, विकलांगता या पति की मौत के बाद महिलाएं नया घर बसाने के लिए नाता कर लेती हैं। लेकिन नया पति और उसका परिवार पहले पति से जन्मे बच्चों की जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं होता। ऐसे में मां के जाते ही बच्चे बेबस और बेसहारा हो जाते हैं।
एक अनुमान के मुताबिक बांसवाड़ा, डूंगरपुर, प्रतापगढ़ और उदयपुर के कुछ पिछड़े इलाकों में पिछले एक दशक में 10 हजार से अधिक नाते हुए हैं। इनमें हजारों बच्चों का घर-बार और पारिवारिक सहारा छूट गया। कोई दादा-दादी के भरोसे है तो कहीं बड़ा भाई या बहन छोटी उम्र में ही मां-बाप की भूमिका निभा रहा है।
डूंगरपुर, बांसवाड़ा, प्रतापगढ़ और उदयपुर जिले के जनजाति बहुल और पिछड़े क्षेत्र।
केस-01: गढ़ी क्षेत्र के 13 वर्षीय अनिल (परिवर्तित नाम) ने खुद चाइल्ड लाइन से मदद मांगी। मां नाते चली गई, पिता और सौतेली मां से प्रताड़ना का आरोप है। चार छोटे भाई-बहनों के बीच वह पढ़ाई जारी रखना चाहता है।
केस-02: घाटोल क्षेत्र में पति की मौत के बाद महिला तीन बच्चों को छोड़ नाते चली गई। 14 वर्षीय बड़ी बेटी और उसके भाई-बहनों को बुजुर्ग दादा-दादी पाल रहे हैं।
केस-03: पेड़ से गिरकर पिता के स्थायी रूप से दिव्यांग होने के बाद पत्नी चार बच्चों को छोड़ चली गई। 13-14 वर्षीय दो बच्चे गुजरात में काम कर रहे हैं।
केस-04: गांगड़तलाई की 17 वर्षीय किशोरी पिता की मौत के बाद तीन छोटे भाई-बहनों को पाल रही है। मां नाते चली गई। दो भाई मामा के घर हैं, छोटी बहन चाचा के घर काम करती है।
नया परिवार अक्सर महिला के पहले पति से जन्मे बच्चों को स्वीकार नहीं करता। कई मामलों में दूधमुंहे बच्चों तक को रिश्तेदारों के भरोसे छोड़ना पड़ता है। बच्चे पढ़ाई छोड़कर मजदूरी, पशु चराने और घरेलू काम करने को मजबूर हो रहे हैं। बालगृहों में ऐसे करीब 250 बच्चे हैं, लेकिन 90 फीसदी वहां तक पहुंच ही नहीं पाते।
"ऐसे बच्चों को सरकारी मदद और योजनाओं से जोड़ा जा सकता है, लेकिन ज्यादातर बच्चों और परिवारों को इसका रास्ता ही पता नहीं होता। जानकारी और प्रक्रिया की अड़चन के कारण बहुत कम तक सरकारी मदद पहुंचती है।" — कमलेश बुनकर, समन्वयक, चाइल्ड हेल्प लाइन-109
"परिवारों में टूटन का सबसे बुरा असर बच्चों पर पड़ता है। वे शारीरिक, मानसिक और आर्थिक परेशानियां झेलते हैं। इस प्रथा की सामाजिक स्वीकार्यता ही सबसे बड़ी समस्या है। जागरुकता और शिक्षा के जरिए समाधान तलाशना होगा।" — डॉ. गायत्री तिवारी, एमेरिटस प्रोफेसर, मानव विकास एवं पारिवारिक अध्ययन विभाग, एमपीयूएटी, उदयपुर