-मां ताप्ती परिक्रमा पदयात्रा में जुड़ रही आस्था, प्रकृति और संस्कारों की अविरल धारा बैतूल। आस्था, संयम और प्रकृति से जुड़ाव का जीवंत उदाहरण बनकर मां ताप्ती परिक्रमा पदयात्रा सेवा समिति की पदयात्रा इन दिनों हजारों किलोमीटर का कठिन सफर तय कर रही है। गुजरात के सूरत जिले के हजीरा से 15 जनवरी को शुरू […]
बैतूल। आस्था, संयम और प्रकृति से जुड़ाव का जीवंत उदाहरण बनकर मां ताप्ती परिक्रमा पदयात्रा सेवा समिति की पदयात्रा इन दिनों हजारों किलोमीटर का कठिन सफर तय कर रही है। गुजरात के सूरत जिले के हजीरा से 15 जनवरी को शुरू हुई यह पदयात्रा 10 दिनों की निरंतर साधना के बाद 27 जनवरी को महाराष्ट्र के जलगांव जिले के अजंतीसिम पहुंच चुकी है। पदयात्रा का अंतिम समापन 17 फरवरी को मध्यप्रदेश के पवित्र तीर्थ मुलताई में होगा, जहां मां ताप्ती का उद्गम स्थल स्थित है। पदयात्रियों ने 27 जनवरी को जैतपुर और भोरटेक जैसे गांवों से गुजरते हुए अजंतीसिम में रात्रि विश्राम किया। यात्रा से आरंभ से जुड़े राजेश दीक्षित बताते हैं कि 23 जनवरी को यह पदयात्रा जूना कुकरमुण्डा और बहरूपा होते हुए प्रकाशा नंदूरवार पहुंची, जिसे दक्षिण काशी के नाम से जाना जाता है। यहां ताप्ती नदी में गौतमी और पुलंदा नदियों का संगम संगमेश्वर महादेव मंदिर के समीप त्रिवेणी संगम का स्वरूप लेता है। यह स्थल श्रद्धालुओं के लिए आध्यात्मिक ऊर्जा का केंद्र माना जाता है। यात्रा से जुड़ी प्रो. उषा द्विवेदी बताती हैं कि ताप्ती तट पर ताप्ती पदयात्रियों और नर्मदा परिक्रमा बस यात्रियों का भावुक मिलन होता है। दोनों यात्राओं के साधक आपस में संवाद कर नदियों के सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महत्व को साझा करते हैं। केदारेश्वर मंदिर में ताप्ती तट पर चौबीस घंटे राम नाम जाप की गूंज वातावरण को भक्तिमय बना देती है। पदयात्रियों का कहना था कि मां ताप्ती ने मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात के ग्रामीण क्षेत्रों को एक सूत्र में जोड़ दिया है। 28जनवरी को पदयात्रा अजंतीसिम जलगांव महाराष्ट्र से शुरू होगी और बाल्की होते हुए नीमगव्हान पहुंचकर रात्रि में विश्राम के लिए रूकेगी। यह पदयात्रा केवल पैरों से तय किया गया सफर नहीं, बल्कि मां ताप्ती के प्रति श्रद्धा, संरक्षण और नदी संस्कृति को जीवित रखने का मौन संकल्प है, जो हर पड़ाव पर लोगों के हृदय को छू रहा है।