
योग का अर्थ जीवन में संतुलन है। गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं ‘समत्वं योग उच्यते’। समत्वं का अर्थ संतुलन है। सुख-दुख, लाभ-हानि, जय-पराजय, मान-अपमान, ठण्ड-गर्मी प्रत्येक स्थिति में संतुलन बनाए रखना ही योग का मुय लक्ष्य है। योग के जरिए ही तन, मन व आत्मा में संतुलन लाकर आप बहुआयामी विकास के पथ पर बढ़ सकते हैं। योग से कार्य उत्पादकता व कुशलता बढ़ती है।
योग को किसी धर्म से न जोड़ें। यह एक विज्ञान है और सभी के लिए सार्थक है। योग करने के लिए शरीर लचीला होना चाहिए यह भ्रान्ति है। योग करने वाले शरीर से अकड़न चली जाती है। इससे दर्द होना भी भ्रान्ति है। जबकि यह दर्द से राहत देता है। योग कसरत नहीं, सहजता से किया जाने वाला प्रयोग है।
इसके आठ अंग हैं-यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान व समाधि
योग की विशेषता है कि यह शरीर की चेतना को एक लय में लाता है। इसमें कुछ सावधानियां भी बरतें। योग हमेशा खाली पेट ही करें। जगह समतल हो, आसन बिछाकर योग करें। मस्तिष्क शांत रखें। यदि भोजन किया है तो उसके 3-4 घंटे बाद योग करें। इस समय आरामदायक कपड़े पहनें। योग का स्थान हवादार व शांति वाला हो। माइंडफुलनेस के साथ योगाभ्यास करें। पहले शिथिल करने वाले आसन के साथ प्रारभ करें, कठिन आसन से कभी प्रारभ न करें। योगासन में श्वास पर ध्यान दें।
डॉ. नागेंद्र कुमार नीरज
मुख्य चिकित्सा प्रभारी व निदेशक, पतंजलि योगग्राम, हरिद्वार