Big Warning : पश्चिमी विक्षोभ के व्यवहार में मौलिक और संरचनात्मक बदलावों के कारण हिमालय में भू-स्खलन और बाढ़ का खतरा बढ़ सकता है। इसके कारण भविष्य में जल संसाधनों की उपलब्धता भी प्रभावित होने का खतरा मंडराने लगा है। ये बदलाव पूरे उत्तर भारत की जलवायु सहनशीलता और आपदा प्रबंधन रणनीतियों के लिए बड़ी चुनौती साबित हो सकते हैं
Big Warning : हिमालय पर भू-स्खलन का खतरा और भी अधिक बढ़ गया है । रुड़की स्थित भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) ने हिमालयी क्षेत्र की सुरक्षा और जल प्रबंधन को लेकर गंभीर चेतावनी जारी की है। आईआईटी ने हिमालयी क्षेत्र में बाढ़ और भूस्खलन की आशंका जताई है। कुछ समय पूर्व ही आईआईटी रुड़की ने हिमालयी क्षेत्र पर पड़ रहे मौसम के प्रभाव को लेकर एक अध्ययन किया था। इसकी रिपोर्ट प्रतिष्ठित इंटरनेशनल जर्नल ऑफ क्लाइमेटोलॉजी में प्रकाशित हुई है। आईआईटी की रिपोर्ट के अनुसार,हिमालयी मौसम प्रणाली को नियंत्रित करने वाले ‘पश्चिमी विक्षोभ’ के व्यवहार में मौलिक और संरचनात्मक बदलाव आ रहे हैं। यह बदलाव उत्तर भारत की जलवायु सहनशीलता और आपदा प्रबंधन रणनीतियों के लिए बड़ी चुनौती साबित हो सकते हैं। हालांकि विशेषज्ञों ने इस खतरे से निपटने के लिए तमाम सुझाव भी दिए हैं। सुझावों पर अमल करने से खतरा कम हो सकता है। शोधकर्ताओं ने आगाह किया है कि बदलती मौसम प्रणालियों के कारण पुराने पूर्वानुमान मॉडल आपदा प्रबंधन रणनीतियों की तत्काल समीक्षा करने की जरूरत है।
आईआईटी रुड़की के अध्ययन में पाया गया कि पश्चिमी विक्षोभ, जो पारंपरिक रूप से केवल सर्दियों में हिमपात के लिए जिम्मेदार होते थे, अब प्री-मानसून काल (मार्च से मई) में भी अत्यधिक सक्रिय हो रहे हैं। आईआईटी में जल विज्ञान विभाग के प्रो.अंकित अग्रवाल के मुताबिक, मौसमी चक्र में बदलाव भविष्य में जल संसाधनों की उपलब्धता को भी प्रभावित करेगा। इधर, जीबी पंत राष्ट्रीय हिमायन संस्थान के वैज्ञानिक भी सीजन शिफ्टिंग की ओर इशारा पूर्व में ही कर चुके हैं।
विशेषज्ञों ने पाया कि विक्षोभों के मार्ग और उनकी तीव्रता में तेजी से बदलाव आ रहा है। प्री मानसून के दौरान इन विक्षोभों नाजुक पर्वतीय क्षेत्रों में अचानक आई बाढ़ और भू-स्खलन के जोखिम को कई गुना अधिक बढ़ा देती है। शोध ने 2023 में हिमाचल और 2025 में उत्तराखंड में आई बाढ़ जैसी चरम घटनाओं को इन वायुमंडलीय बदलावों का प्रत्यक्ष परिणाम बताया है।