
किलपॉक.
यहां स्थित एससी शाह भवन में चातुर्मासार्थ विराजित मुनि तीर्थचैतन्य विजय ने कहा कि मनुष्य के भीतर से निकलने वाली आवाज दो प्रकार की होती है, एक बुद्धि से और दूसरी हृदय से। बुद्धि के शब्दों में हिसाब, तर्क और अपेक्षा होती है, जबकि हृदय से निकले शब्दों में संवेदना, सच्चाई और आत्मीयता होती है। आज जीवन में कैलकुलेशन बढ़ गया है, इसलिए रिश्तों में भी आत्मीयता कम होती जा रही है। धर्म का तत्व कभी नहीं बदलता, केवल उसे समझाने की पद्धति बदल सकती है। मंजिल वही रहती है, मार्ग बदल सकता है। हमने धर्म बहुत सुना है, लेकिन प्रश्न यह है कि सुने हुए में से कितना जीवन में उतारा? सद्गुरु की वाणी का उद्देश्य केवल ज्ञान बढ़ाना नहीं, बल्कि ज्ञान को अनुभूति और आचरण में बदलना है।
मोक्ष का महत्व समझाते हुए कहा कि मोक्ष बहुत सरल है। लेकिन हम सरल चीज़ को भी कठिन बना देते हैं। हम सोचते हैं कि मोक्ष के लिए बहुत कुछ करना पड़ेगा, बहुत साधना करनी होगी, बहुत नियम करने होंगे, बहुत कुछ प्राप्त करना होगा। लेकिन वास्तविकता में पहला कदम है स्वीकार करना। ”स्वीकार का अर्थ है जो परिस्थिति सामने आई है, उसे बिना अपनी इच्छा थोपे स्वीकार करना। मोक्ष का अर्थ केवल इच्छा पूरी होना नहीं है। मोक्ष की दिशा में कदम है, इच्छा के बंधन से मुक्त होना। शास्त्र हमें केवल जीने की कला नहीं सिखाते, बल्कि मृत्यु को समझने की दृष्टि भी देते हैं। इसलिए धर्म केवल जानकारी नहीं है, धर्म जीवन को देखने की दृष्टि है।