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Ramgarh Dam: हाईकोर्ट में सुनवाई आज, मामला चलते 15 साल हुए पूरे, अब लोगों की बांध के साथ ही कोर्ट के आदेश पर भी नजर

रामगढ़ बांध मामले में हाईकोर्ट की जनहित याचिका पर गुरुवार को सुनवाई होगी। 15 साल पुराने मामले में जयपुर कलेक्टर को अतिक्रमण और जल-प्रवाह में रुकावटों को लेकर रिपोर्ट पेश करनी है।
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Ramgarh Dam catchment area featuring illegal constructions and encroachments in Jaipur

रामगढ़ बांध के प्रवाह में बने निर्माण (पत्रिका फोटो)

हाईकोर्ट ने राजस्थान पत्रिका में मर गया रामगढ़ शीर्षक से प्रकाशित फोटो स्टोरी के आधार पर ठीक 15 साल पहले 12 अगस्त को ही स्वत: संज्ञान लेकर जनहित याचिका दर्ज की, अब इसी याचिका पर गुरुवार को फिर सुनवाई होनी है। कोर्ट ने बीते माह के अंत में टिप्पणी की थी कि मीटिंग में चाय बिस्किट खाते हो, नाम लाओ बांध के प्रवाह क्षेत्र में किसके होटल, रिसोर्ट और फॉर्म हाउस पानी आने के रास्ते में बाधा बने हुए हैं। इस सख्त टिप्पणी के बाद अब जयपुर कलक्टर की बारी है, जिनकी ओर से हाईकोर्ट में अतिक्रमण व पानी में रुकावटों को लेकर रिपोर्ट पेश की जानी है। प्रशासन की रिपोर्ट और हाईकोर्ट के आदेश दोनों पर ही जयपुर वासियों व रामगढ़ बांध क्षेत्र और उसके प्रवाह क्षेत्र के आसपास के लोगों की निगाह रहेगी।

इन सभी परिस्थितियों को लेकर कोर्ट के सामने जो विकल्प हो सकते हैं, उनको राजस्थान पत्रिका ने वरिष्ठ विधिवेत्ताओं से बात कर विजुअलाइज करने (धरातल पर उतारने) का प्रयास किया है।

अब कोर्ट के सामने क्या मुद्दे होंगे?

  • रिपोर्ट में होटल, रिसोर्ट, फार्म हाउस आदि जैसे पक्के निर्माणों का उल्लेख न होना, जबकि पिछली सुनवाई में कोर्ट ने खुद इन्हीं नामों को उजागर करने के निर्देश दिए थे।
  • रिपोर्ट मौके पर जाकर तैयार की गई या दफ्तर में बैठकर, इस पर स्पष्टता का अभाव।
  • वर्ष 2011 में दर्ज इस याचिका पर हाईकोर्ट ने मई 2012 में विस्तृत आदेश दिया था कि सरकार अतिक्रमण हटाने, अवैध आवंटन निरस्त करने, 2 मीटर से ऊंचे एनीकट तोड़ने, कैचमेंट एरिया का डिमार्केशन करने को लेकर नियमित अनुपालन रिपोर्ट पेश करे। इसका पालन नहीं हो रहा।
  • बारिश हो चुकी है, ऐसे में प्रशासन मौके पर जाता तो जल-प्रवाह क्षेत्र और अतिक्रमण की वास्तविक तस्वीर सामने आ सकती थी।

पर्यावरण विशेषज्ञों और अधिवक्ताओं ने दी राय..

  • राजस्थान पत्रिका की जमीनी पड़ताल में प्रशासनिक अधिकारियों, पर्यावरण विशेषज्ञों और अधिवक्ताओं ने भी कलक्टर रिपोर्ट की सीमाओं और आगे के रास्ते पर स्पष्ट राय दी है।
  1. कोर्ट रिपोर्ट को अधूरा या असंतोषजनक मानते हुए लौटा सकता है या स्वतंत्र सर्वे कराने का निर्देश दे सकता है। कोर्ट सैटेलाइट इमेजिंग व ड्रोन के जरिए बहाव क्षेत्र को मानचित्र पर चिन्हित कराने का निर्देश भी दे सकता है, ताकि मैनुअल सर्वे की खामियां दोबारा सामने न आएं।
  2. फिजिकल सत्यापन के लिए कोर्ट कमिश्नर/स्वतंत्र अधिवक्ताओं की नियुक्ति कर उनको मौका रिपोर्ट के लिए भेज सकता है, जिससे प्रशासनिक रिपोर्ट और जमीनी हकीकत की सत्यता सामने आ सके।
  3. बीसलपुर जैसे बाहरी स्रोतों से पानी लाना स्थायी समाधान नहीं है, इसलिए बहाव क्षेत्र की बहाली पर जोर दे सकता है।
  4. होटल-रिसोर्ट संचालकों व अन्य अतिक्रमियों के नाम उजागर करने का आदेश है, ऐसे में स्पष्ट समय-सीमा के साथ नाम, स्वामित्व और एनओसी की स्थिति मांगी जा सकती है।
  5. जिन अधिकारियों ने रिपोर्ट तैयार की, उनकी जवाबदेही तय करने के लिए स्पष्टीकरण मांगा जा सकता है कि पक्के निर्माणों को रिपोर्ट में शामिल क्यों नहीं किया गया और सर्वे मौके पर जाकर हुआ या नहीं। कोर्ट पहले भी दोषी अधिकारियों की सूची सीलबंद लिफाफे में मांगता रहा है; ऐसी सख्ती दोहराई जा सकती है।
  6. कोर्ट यह निर्देश दे चुका कि जो अतिक्रमण नहीं, सिर्फ बहाव अवरुद्ध है, वहां पाइपलाइन डालकर पानी का रास्ता बनाने जैसे विकल्प अपनाए जा सकते हैं। अमरीका के हूवर डैम के लिए इस मॉडल को अपनाया गया। उस आदेश की पालन की जानकारी भी मांग सकता है। इसी तरह चंडीगढ़ की सुकना लेक, तेलंगाना के हाईकोर्ट की ओर से एक जलस्रोत के मामले में की गई पहल या केरल की झील के मामले में प्रयास किए गए, जिनसे ये जलस्रोत पुनर्जीवित होने का रास्ता खुल गया।
  7. पूर्व आदेशों का पालन जानबूझकर टाला गया या रिपोर्ट भ्रामक तरीके से तैयार की गई, तो कड़ी टिप्पणी या भविष्य में अवमानना की चेतावनी दी जा सकती है।

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