
राजस्थान हाईकोर्ट ने जेन-जी, जेन-अल्फा और जेन-बीटा के कल्याण, सुरक्षा, शिक्षा और स्वास्थ्य को लेकर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए स्वप्रेरणा से जनहित याचिका दर्ज की है। कोर्ट ने ग्रामीण व दूरदराज के सरकारी स्कूलों में आधारभूत सुविधाओं के अभाव, लगातार हो रहे पेपर लीक, अत्यधिक स्क्रीन टाइम, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआइ) के दौर में मौलिक लेखन-पठन कौशल के ह्रास और स्कूलों में बिकने वाले जंक फूड से बच्चों के स्वास्थ्य पर पड़ रहे प्रतिकूल प्रभावों पर सख्त रुख अपनाया है।
न्यायाधीश अनूप कुमार ढंढ की एकल पीठ ने मामले में केंद्रीय शिक्षा एवं मानव संसाधन सचिव, केंद्रीय उपभोक्ता मामले एवं खाद्य मंत्रालय, राज्य के मुख्य सचिव, अतिरिक्त मुख्य सचिव (शिक्षा), खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति सचिव, भारतीय खाद्य संरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआइ) तथा राजस्थान राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग को नोटिस जारी कर आठ सप्ताह में जवाब तलब किया है। साथ ही मुख्य सचिव की अध्यक्षता में एक त्रैमासिक मॉनिटरिंग सेल गठित करने और जिला कलक्टरों व बाल अधिकार संरक्षण आयोग को आठ सप्ताह के भीतर ग्रामीण स्कूलों का औचक निरीक्षण कर रिपोर्ट पेश करने के निर्देश दिए हैं।
पीठ ने कहा कि वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए एआइ और डिजिटल लर्निंग जरूरी है, लेकिन तकनीक पर अत्यधिक व एकांगी निर्भरता से हस्तलेखन, किताबें पढ़ने की आदत और मौलिक चिंतन की क्षमता समाप्त हो सकती है। इसलिए शिक्षा नीति में आधुनिक तकनीक के साथ-साथ हस्तलिखित परीक्षाओं व पारंपरिक पठन-पाठन का संतुलन बनाना अनिवार्य है। इसके अलावा, पेपर लीक जैसी समस्या पर चिंता जताते हुए पीठ ने कहा कि इससे जेन-जी के मानसिक स्वास्थ्य, शैक्षणिक समय-सारिणी और सार्वजनिक व्यवस्था के विश्वास पर आघात पहुंचता है। इस पर रोक लगाने के लिए फूलप्रूफ तंत्र की दरकार है। कोर्ट ने तीनों पीढ़ियों के व्यापक हितों पर कोर्ट का सहयोग करने के लिए अधिवक्ताओं को न्याय मित्र नियुक्त किया है। याचिका को उचित पीठ के समक्ष सूचीबद्ध करने के लिए कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश के समक्ष रखने के निर्देश दिए गए हैं।