
Hunger Strike Timeline : आमरण अनशन (Hunger Strike) अहिंसक प्रतिरोध का सबसे कठोर और नैतिक हथियार माना जाता है। व्यक्ति अपनी मांगों की पूर्ति के लिए स्वेच्छा से भोजन का त्याग करता है और आवश्यकता पड़ने पर प्राणों का बलिदान देने का संकल्प लेता है। इसका उद्देश्य हिंसा का सहारा लिए बिना सरकार, समाज या सत्ता के विवेक को जगाना होता है। इतिहास में अनेक ऐसे उदाहरण मिलते हैं, जब आमरण अनशन ने सरकारों को झुकने पर मजबूर किया तो कई बार अनशनकारियों ने अपने प्राणों की आहुति देकर इतिहास रच दिया।
आधुनिक राजनीतिक भूख हड़ताल (Political Hunger Strike) का विकास मुख्य रूप से 19वीं और 20वीं शताब्दी में हुआ। रूस के राजनीतिक कैदियों, ब्रिटेन की महिला मताधिकार कार्यकर्ताओं (Suffragettes) और आयरिश स्वतंत्रता सेनानियों ने इसे राजनीतिक संघर्ष का प्रभावी हथियार बनाया।
Sonam Wangchuk Hunger Strike: सोनम वांगचुक को 18 जुलाई 2026 को पुलिस जंतर मंतर से उठाकर ले गई और सफदरजंग में दाखिल करा दिया। आज उनके आमरण अनशन का 20 वां दिन था। वे कॉकरोच जनता पार्टी के साथ मिलकर नई दिल्ली के जंतर मंतर पर धरना पर बैठे थे और नीट के पेपर लीक मामले में केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद प्रधान के इस्तीफे (Dharmendra Pradhan Resignation Demand) की मांग कर रहे थे।
भारत में वैदिक और उत्तरवैदिक काल से प्रायोपवेशन (Prayopavesha) न्याय प्राप्त करने के लिए धरना देने की परंपरा प्रचलित थी। यदि किसी राजा, साहूकार या प्रभावशाली व्यक्ति द्वारा अन्याय किया जाता था, तो पीड़ित व्यक्ति उसके द्वार पर बैठकर उपवास करता था। इसे नैतिक दबाव का प्रभावी माध्यम माना जाता था।
इसी प्रकार प्राचीन आयरलैंड में भी ट्रोस्कैड (Troscad) नामक परंपरा थी। यदि किसी व्यक्ति के साथ अन्याय होता था, तो वह दोषी व्यक्ति के घर के बाहर उपवास करता था। उस समय यह माना जाता था कि यदि उपवास करने वाले की मृत्यु हो जाए, तो दोषी व्यक्ति सामाजिक और धार्मिक रूप से कलंकित हो जाएगा। इसलिए आधुनिक इतिहासकार मानते हैं कि आमरण अनशन की अवधारणा भारत और आयरलैंड दोनों की प्राचीन परंपराओं से विकसित हुई है।
महात्मा गांधी (Mahatma Gandhi) ने अनशन को केवल राजनीतिक हथियार नहीं माना, बल्कि आत्मशुद्धि, सत्य और अहिंसा का माध्यम बताया। उनका विश्वास था कि अनशन का प्रयोग केवल न्यायपूर्ण उद्देश्य और आत्मसंयम के साथ ही होना चाहिए। उन्होंने अपने जीवन में लगभग 17 प्रमुख अनशन किए। उनके पांच अनशन के बारे में नीचे बताया जा रहा है।
1- 1918 – अहमदाबाद मिल मजदूर आंदोलन
अवधि : लगभग 3 दिन
उद्देश्य : मजदूरों को उचित वेतन दिलाना।
2- 1924 – हिंदू-मुस्लिम एकता
अवधि : 21 दिन
उद्देश्य : सांप्रदायिक सद्भाव स्थापित करना।
3- 1932 – पूना समझौता
अवधि : लगभग 6 दिन
उद्देश्य : दलितों के लिए पृथक निर्वाचन के ब्रिटिश प्रस्ताव का विरोध और सामाजिक एकता बनाए रखना।
4- 1933 – अस्पृश्यता विरोधी अभियान
अवधि : 21 दिन
उद्देश्य : छुआछूत समाप्त करने के लिए जनजागरण।
5- 1947–48 – सांप्रदायिक हिंसा रोकने के लिए
अवधि : 3 से 5 दिन
उद्देश्य : दिल्ली और कोलकाता में शांति स्थापित करना।
गांधीजी के अनशन का प्रभाव केवल भारत तक सीमित नहीं रहा। बाद के दिनों में विश्वभर के अनेक आंदोलनों के दौरान नेताओं और कार्यकताओं ने आमरण अनशन के जरिए सरकार से अपनी मांग मनवाने की कोशिश की।
जतिन Jatin Das ने 1929 में लाहौर जेल में 63 दिनों तक आमरण अनशन किया। 13 सितंबर 1929 को उनकी मृत्यु हो गई। उनकी अंतिम यात्रा में लाखों लोग शामिल हुए और वे स्वतंत्रता आंदोलन के अमर शहीद बन गए।
क्या था उद्देश्य
टेरेंस मैकस्वाइनी (Terence MacSwiney) आयरलैंड के कॉर्क शहर के महापौर थे।
अवधि : 74 दिन (1920)
आयरलैंड की स्वतंत्रता के लिए दे दी जान
बॉबी सैंड्स (Bobby Sands) ने 1981 में 66 दिनों तक आमरण अनशन किया। अनशन के दौरान वे ब्रिटिश संसद के सदस्य भी चुने गए, लेकिन 66वें दिन उनकी मृत्यु हो गई। उनके बाद नौ अन्य कैदियों की भी अनशन के दौरान मृत्यु हुई।
राजनीतिक कैदी का दर्जा दिलाने की लड़ी लड़ाई
ब्रिटिश सरकार से आयरिश रिपब्लिकन कैदियों को राजनीतिक कैदी का दर्जा दिलाना।
अवधि : 58 दिन (1952)
उद्देश्य : तेलुगु भाषी लोगों के लिए अलग आंध्र राज्य।
पोट्टी श्रीरामुलु की मृत्यु के बाद केंद्र सरकार ने अलग आंध्र राज्य बनाने की घोषणा की। यही घटना आगे चलकर भारत में राज्यों के भाषाई पुनर्गठन का आधार बनी।
अवधि : 5,757 दिन (करीब 16 वर्ष)
इरोम शर्मिला ने 2 नवंबर 2000 से लेकर 9 अगस्त 2016 तक आमरण अनशन किया।
मणिपुर और पूर्वोत्तर राज्यों से AFSPA हटाने की मांग
इरॉम शर्मिला (Irom Sharmila) को लगातार हिरासत में रखा गया और नाक में डाली गई ट्यूब के माध्यम से पोषण दिया जाता रहा। इस कारण कुछ विशेषज्ञ इसे "जबरन चिकित्सकीय पोषण के साथ जारी अनिश्चितकालीन अनशन" कहते हैं। हालांकि, इसके बावजूद इसे आधुनिक इतिहास का सबसे लंबा और सबसे चर्चित राजनीतिक अनशन माना जाता है।
अवधि: 12 दिन (2011)
उद्देश्य: जन लोकपाल कानून लागू कर भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाना।
अन्ना हज़ारे (Anna Hazare) उनके आंदोलन ने पूरे देश में भ्रष्टाचार के विरुद्ध अभूतपूर्व जनसमर्थन जुटाया और संसद को लोकपाल कानून पर आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया।
मेधा पाटकर (Medha Patkar) ने नर्मदा बचाओ आंदोलन के दौरान कई बार अनशन किए।
अवधि: लगभग 20 दिन (2006)
उद्देश्य: नर्मदा नदी पर बन रहे बांध के चलते प्रभावित परिवारों का उचित पुनर्वास तथा विस्थापितों के अधिकारों की रक्षा।
बाबा रामदेव: भ्रष्टाचार के खिलाफ कठोर कानून बनाना
अवधि : लगभग 9 दिन (2011)
विदेशों से ब्लैक मनी की वापसी
विदेशों में जमा काला धन वापस लाना।
भ्रष्टाचार के विरुद्ध कठोर कानून बनाना।
शावेज़ ने तीन प्रमुख अनशन किए
1968 – 25 दिन
1972 – 24 दिन
1988 – 36 दिन
किसानों के हित की लड़ी लड़ाई
आमरण अनशन इतिहास में केवल विरोध का साधन नहीं, बल्कि नैतिक शक्ति, आत्मबल और लोकतांत्रिक चेतना का प्रतीक रहा है। अनशन करने वालों में से कुछ ने अपने प्राणों का बलिदान दिया, कुछ ने जनमत जगाया, कुछ ने सरकारों को नीतियां बदलने के लिए विवश किया और कुछ ने आने वाली पीढ़ियों के लिए न्याय, अधिकार और अहिंसक संघर्ष की नई मिसाल कायम की। यही कारण है कि आमरण अनशन आज भी दुनिया भर में लोकतांत्रिक प्रतिरोध का सबसे प्रभावशाली नैतिक हथियार माना जाता है।