
Global Private Space Race India Sector Leap Follows : जब भी अंतरिक्ष की बात आती है, तो हमारे दिमाग में नासा या इसरो जैसी बड़ी सरकारी एजेंसियों की तस्वीरें घूमने लगती हैं। लेकिन पिछले कुछ बरसों के दौरान इस फील्ड में बहुत बड़ा बदलाव आया है। अब आसमान पर अब सिर्फ सरकारों का हक नहीं रह गया है; प्राइवेंट कंपनियां भी अब सीधे सितारों से बात कर रही हैं। प्राइवेट विमान बनाना दीगर बात है और प्राइवेट रॉकेट बनाना दूसरी बात है। इस लिस्ट में सबसे नया और सबसे चमकता हुआ नाम है भारत की स्काईरूट एयरोस्पेस (Skyroot Aerospace) का, जिसने अपने 'विक्रम-1' (Vikram-1) रॉकेट के साथ दुनिया में तहलका मचाया है।
क्या आप जानते हैं कि विक्रम-1 के लॉन्च होने से पहले दुनिया के कितने देशों के पास यह ताकत थी ? और यह स्काईरूट एयरोस्पेस आखिर क्या बला है, जिसे मीडिया 'स्पेस की कैब (ओला-उबर)' कह रहा है? आइए बहुत ही आसान शब्दों में इस पूरी दिलचस्प कहानी को समझते हैं।
इतिहास गवाह है कि अंतरिक्ष में जाना हमेशा से एक महंगा और केवल सरकारों के बस का सौदा माना जाता था मगर कुछ देशों ने इस सोच को बदला। विक्रम-1 के ऑर्बिटल (धरती की कक्षा में चक्कर लगाने वाला) लॉन्च से पहले दुनिया में सिर्फ 2 ही ऐसे देश थे, जिनकी प्राइवेट कंपनियां सफलतापूर्वक ऑर्बिटल रॉकेट लॉन्च कर चुकी थीं:
अमेरिका में एलन मस्क की SpaceX (फॉल्कन 9 रॉकेट) और Rocket Lab (इलेक्ट्रॉन रॉकेट) जैसी कंपनियों ने पूरी दुनिया का मार्केट बदल कर रख दिया। इसके अलावा Blue Origin और ULA जैसी कंपनियां भी इस लिस्ट में शामिल हैं।
अमेरिका को टक्कर देने के लिए चीन ने भी अपनी प्राइवेट कंपनियों को भारी बढ़ावा दिया। वहां की Galactic Energy, iSpace, और Orienspace जैसी कंपनियों ने सरकारी मदद के साथ लेकिन प्राइवेट कॉर्पोरेट के तौर पर अंतरिक्ष में अपने झंडे गाड़े हैं।
स्काईरूट एयरोस्पेस के विक्रम-1 की कामयाबी के साथ ही भारत दुनिया का तीसरा ऐसा देश बन गया है, जिसके पास अपनी खुद की प्राइवेट ऑर्बिटल रॉकेट बनाने और लॉन्च करने की क्षमता है। यह भारत के लिए सिर्फ एक तकनीकी जीत नहीं, बल्कि बहुत बड़ा भू-राजनीतिक (Geopolitical) मुकाम है।
भारत,अमेरिका और चीन के प्राइवेट रॉकेट में अंतर। ( फोटो : ChatGPT)
सरल शब्दों में कहें तो, स्काईरूट एयरोस्पेस भारत की एक प्राइवेट स्पेस-टेक कंपनी है, जिसका मुख्यालय हैदराबाद में है। इसे साल 2018 में इसरो (ISRO) के ही दो पूर्व वैज्ञानिकों-नागा भरत डाका और पवन कुमार चंदना ने मिलकर शुरू किया था।
स्काईरूट का मुख्य मकसद अंतरिक्ष में सैटेलाइट भेजना उतना ही आसान और किफायती बनाना है, जितना फोन से एक राइड-शेयरिंग कैब बुक करना। आज यह कंपनी 1 बिलियन डॉलर ( भारतीय मुद्रा में तकरीबन 8,300 करोड़ रुपये) से ज्यादा की वैल्यूएशन के साथ एशिया के सबसे बड़े स्पेस स्टार्टअप्स में से एक यानि'यूनिकॉर्न'बन चुकी है।
स्काईरूट अपने रॉकेट्स का नाम भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम के जनक डॉ. विक्रम साराभाई के सम्मान में 'विक्रम' रखता है। इस सीरीज में दो मुख्य रॉकेट्स ने सुर्खियां बटोरीं:
विक्रम-एस (Vikram-S): नवंबर 2022 में इस छोटे रॉकेट ने इतिहास रचा। यह भारत का पहला प्राइवेट सब-ऑर्बिटल रॉकेट था। इस मिशन का नाम था 'प्रारंभ' (Prarambh), जिसने साबित कर दिया कि स्काईरूट की तकनीक बिल्कुल सही काम कर रही है।
विक्रम-1 (Vikram-1): यह एक असली 'गेम चेंजर' है। यह लगभग सात मंजिला ऊंची इमारत जितना बड़ा एक ऑर्बिटल-क्लास रॉकेट है। इसका मतलब है कि यह सिर्फ ऊपर जाकर वापस नहीं आता, बल्कि सैटेलाइट्स को सीधे धरती की कक्षा (Low Earth Orbit) में स्थापित कर देता है। यह अपने साथ करीब 350 किलोग्राम तक का वजन अंतरिक्ष में ले जा सकता है।
स्काईरूट ने पारंपरिक रॉकेट बनाने के तरीकों को छोड़ कर कुछ बहुत आधुनिक और अनोखे तरीके अपनाए हैं:
स्काईरूट का विक्रम-1 सिर्फ एक रॉकेट नहीं, बल्कि आत्मनिर्भर भारत की वो उड़ान है जो यह बताती है कि अब हमारे देश के युवा सिर्फ सरकारी नौकरियों के भरोसे नहीं, बल्कि खुद की कंपनियां खड़ी कर के अंतरिक्ष जैसे जटिल क्षेत्रों में भी दुनिया का नेतृत्व कर सकते हैं। अमेरिका और चीन के दबदबे वाले इस बाजार में भारत की यह प्राइवेट एंट्री आने वाले समय में पूरी दुनिया के सैटेलाइट लॉन्च मार्केट को बदलने वाली है।
अमेरिका के प्राइवेट रॉकेट फाल्कन की विशेषता के संबंध में जानकारी। ( फोटो: ChatGPT)
चीन के प्राइवेट रॉकेट ज़ुके की विशेषता के संबंध में जानकारी।( फोटो: ChatGPT)
भारत के प्राइवेट रॉकेट'विक्रम-1'की विशेषता के संबंध में जानकारी। ( फोटो : ChatGPT)
Updated on:
18 Jul 2026 02:48 pm
Published on:
18 Jul 2026 02:47 pm
