
Saurav Das Ashutosh Ranka: दिल्ली हाईकोर्ट की विशेष पीठ ने CJP एक्टिविस्ट सौरव दास और आशुतोष रांका की हिरासत और न्यायिक हिरासत बढ़ाने के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई की। इस दौरान कॉकरोच जनता पार्टी के नेताओं से दिल्ली हाईकोर्ट ने तल्ख सवाल भी किए हैं। वहीं, CJP के वकील ने कोर्ट में दलील देते हुए कहा कि 19 अक्टूबर का आदेश मनमाना था। इसमें तय प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया। हाईकोर्ट ने कहा कि जमानतदारों को खारिज करने का मामला अलग है। हाईकोर्ट ने इस दौरान पूछा कि जब कानून में अपील का विकल्प मौजूद है तो याचिकाकर्ताओं ने उस वैकल्पिक उपायों का इस्तेमाल क्यों नहीं किया। इस पर कॉकरोच जनता पार्टी ने कोर्ट में दलील दी कि 19 अक्टूबर का आदेश पूरी तरह मनमाना है और प्रक्रिया का उल्लंघन करता है। CJP ने कोर्ट में दलील में धारा 414 का जिक्र किया। जानकारी सामने आई है कि दोनों ने हाईकोर्ट से अपनी याचिका वापस ले ली।
कॉकरोच जनता पार्टी के वकील ने कहा कि 19 अक्टूबर के आदेश में दिमाग का इस्तेमाल नहीं किया गया। यह आदेश बुनियादी रूप में गलत है। CJP के वकील ने दलील दी कि स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट को याचिकाकर्ताओं की हिरासत बढ़ाने का अधिकार ही नहीं था। SEM ने मनामाने तरीके से फैसले लिए। CJP के वकील ने कहा कि जमानतदारों को चार बार खारिज किया गया है और उन्हें इस मामले में दोबारा हाईकोर्ट आना पड़ेगा। CJP के दलीलों पर HC ने कहा कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता को बेहद अहम बताते हुए सवाल किया कि जब कानून में राहत पाने का उपाय मौजूद है, तो याचिकाकर्ता उसका इस्तेमाल क्यों नहीं करते और अपील क्यों नहीं दाखिल करते।
हाई कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि यदि शाम 4 बजे तक एसईएम कोर्ट का फैसला याचिकाकर्ताओं के पक्ष में आ जाता है, तो विवाद वहीं समाप्त हो जाएगा। वहीं, यदि फैसला उनके पक्ष में नहीं आता है, तो वे पहले सक्षम रिवीजन कोर्ट का रुख कर सकते हैं। दिल्ली हाई कोर्ट ने सौरव दास और आशुतोष रांका को संबोधित करते हुए कहा कि आपने बॉन्ड तोड़ा है, आप ऐसे व्यक्ति हैं जिन्होंने बॉन्ड का उल्लंघन किया है। क्या बॉन्ड की शर्तों पर जोर देना इतना गैरकानूनी हो सकता है? डीनोटिफिकेशन के बाद बिना अनुमति जंतर-मंतर गए। डीनोटिफिकेशन को चुनौती देने वाली याचिका सुप्रीम कोर्ट में लंबित है, उस पर रोक नहीं लगी है। आप सबसे आगे रहते हैं, जब आप बैरिकेड तोड़ते हैं तो बड़ी संख्या में दूसरे लोगों के भी ऐसा करने की संभावना होती है।
दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि कुछ लोग ऐसे भी हो सकते हैं जो आपके नियंत्रण में न हों। हमने देश के बाहर भी ऐसा होते देखा है। दूसरी बार बॉन्ड तोड़ने पर क्या अधिकारी सख्त बॉन्ड की शर्त रखने के हकदार नहीं हैं? दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा कि जब आप जुलाई में पहले विरोध प्रदर्शन के दौरान आए थे, तब संगठन तो वही था, लेकिन मुद्दा बदल गया था। इसलिए सवाल यह उठता है कि जब ऐसे लोग हों जिनके मुद्दे लगातार बदलते रहते हैं, तो अगला सवाल यह होगा कि आप कौन हैं? आप क्या हैं? आपका संगठन क्या है और आपके संगठन का उद्देश्य क्या है?
कोर्ट ने उम्र पूछने के बाद सौरव और आशुतोष के लिए की टिप्पणी कि दोनों जेन जी नहीं हैं। दिल्ली हाई कोर्ट ने दास और रांका के वकील को सुझाव दिया कि वे याचिका वापस लेकर आज एसईएम कोर्ट में सुनवाई का इंतजार कर सकते हैं। इसके पहले सीजेपी नेताओं सौरव दास और आशुतोष रांका ने याचिका दाखिल कर हाई कोर्ट से तत्काल सुनवाई की मांग की थी।
यह कदम एसईएम कोर्ट द्वारा दोनों की न्यायिक हिरासत को 21 अक्टूबर तक बढ़ाए जाने के बाद उठाया गया है। कोर्ट ने कहा था कि उनका बर्ताव कानून के प्रति कोई सम्मान नहीं दिखाता और इससे पता चलता है कि वे प्रतिबंधित इलाकों में विरोध-प्रदर्शन करने के आदी हैं। जांच के बाद एसईएम कोर्ट ने इन दोनों नेताओं की ओर से दी गई जमानत को भी अमान्य करार दिया। कोर्ट ने कहा कि पहचान दस्तावेजों में विसंगतियां थीं और जमानत देने वाले लोग उन व्यक्तियों के बारे में बुनियादी जानकारी भी नहीं दे पाए, जिनके लिए उन्होंने जमानत ली थी।
बता दें कि 13 अक्टूबर को जंतर-मंतर पर निजी परिसर से प्रवेश करने और पुलिसकर्मियों को उनकी ड्यूटी करने से रोकने के आरोप में 14 लोगों को हिरासत में लिया गया था, जिनमें सौरव दास और रांका के साथ-साथ पार्टी सदस्य अजिंक्य शिंदे भी शामिल थे। सीजेपी सदस्य मतदाता सूची के 'विशेष गहन पुनरीक्षण' (एसआईआर) में अनियमितताओं के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन कर रहे थे और उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ नारे भी लगाए थे।