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CJP नेताओं की हिरासत फिर बढ़ी, कौन हैं SEM जिनकी शक्तियों पर हाईकोर्ट भी उठा चुका है सवाल?

CJP नेताओं की हिरासत बढ़ने के बीच SEM की शक्तियां चर्चा में हैं। जानिए, इन अधिकारियों के अधिकारों पर हाईकोर्ट पहले क्या सवाल उठा चुका है।
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Cockroach Janta Party

सौरव दास (Photo: IANS/File)

Saurav Das: कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) नेताओं सौरव दास और आशुतोष रांका की हिरासत बढ़ने के बाद विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट (SEM) की शक्तियां एक बार फिर चर्चा में हैं। एहतियाती कार्रवाई के तहत लोगों को हिरासत में रखने से लेकर बंधपत्र भरवाने तक, SEM के अधिकारों पर अदालतें पहले भी सवाल उठा चुकी हैं। मेधा पाटकर से जुड़े मामले में भी हाईकोर्ट ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को लेकर अहम टिप्पणी की थी।

क्या हैं पूरा मामला?

हाल ही में CJP के नेता आशुतोष रांका और सौरव दास को सुरक्षा व्यवस्था का उल्लंघन करने और जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के दौरान प्रवेश करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। दिल्ली पुलिस के एसीपी रैंक के अधिकारी और SEM ऋतुराज द्वारा दिए गए आदेश में कहा गया कि इन नेताओं के आचरण से कानून के प्रति सम्मान नजर नहीं आता। इसके चलते उनकी हिरासत को सात दिन तक बढ़ा दिया गया। हिरासत के दौरान नेताओं ने इस पूरी प्रक्रिया और SEM की भूमिका को लेकर तीखी प्रतिक्रिया दी। दूसरी ओर, AISA अध्यक्ष नेहा बोरा को भी शांति बनाए रखने के लिए बंधपत्र भरने का नोटिस मिला है, जिसके बाद से यह मामला और ज्यादा बढ़ गया है।

क्या होते हैं विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट (SEM) और न्यायिक मजिस्ट्रेट से कैसे हैं अलग?

आम तौर पर लोग मजिस्ट्रेट को न्यायपालिका से जोड़कर देखते हैं, लेकिन कार्यकारी मजिस्ट्रेट सरकार और पुलिस के अधीन काम करते हैं। दिल्ली पुलिस अधिनियम के तहत केंद्र सरकार पुलिस कमिश्नर और एसीपी रैंक या उससे ऊपर के अधिकारियों को मजिस्ट्रेट की शक्तियां देती है।
इन अधिकारियों का मुख्य काम सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखना और एहतियाती कदम उठाना होता है। हालांकि, ये अदालतों की तरह किसी मुकदमे की सुनवाई नहीं कर सकते। इसके अलावा, न्यायिक मजिस्ट्रेट पूरी तरह न्यायपालिका यानी हाईकोर्ट के नियंत्रण में होते हैं और उन्हें मुकदमों की सुनवाई करने का अधिकार होता है।

सदियों पुराना कानून, आज भी भारतीय न्याय व्यवस्था का हिस्सा

एहतियाती गिरफ्तारी और सुरक्षा से जुड़े इन प्रावधानों की जड़ें बहुत पुरानी हैं। इनका इतिहास साल 1361 के 'जस्टिस ऑफ पीस एक्ट' से जुड़ा है, जिसे इंग्लैंड की संसद ने लागू किया था। उस दौरान 'शांति के न्यायाधीशों' को उपद्रवियों को रोकने और उनसे अच्छे व्यवहार की गारंटी के रूप या बंधपत्र लेने का अधिकार दिया गया था। यही व्यवस्था ब्रिटिश काल से होते हुए भारत की आपराधिक प्रक्रिया का हिस्सा बनी, जो आज नए कानून यानी भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) में भी चली आ रही है।

सालों पुरानी कमियां और अदालतों की चिंताएं

विभिन्न अदालतों ने समय-समय पर इन शक्तियों के दुरुपयोग पर गहरी चिंता जताई है। साल 1984 में तिहाड़ जेल से आए एक मामले में दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा था कि पुलिस बिना उचित कारण के लोगों को गिरफ्तार कर लेती है और तय प्रक्रिया का पालन नहीं किया जाता। उस वक्त भी यह बात सामने आई थी कि अधिकारी एक ही छपे-छपाये प्रोफॉर्मा का इस्तेमाल करके आदेश जारी कर देते हैं।

इसके कई साल बाद 2018 में भी अदालत ने पाया कि हालात में ज्यादा बदलाव नहीं आया है और आज भी वैसे ही प्रोफॉर्मा का इस्तेमाल हो रहा है। अदालत ने उस समय यह भी सुझाव दिया था कि इन अधिकारियों को 'मजिस्ट्रेट' की बजाय 'विशेष कार्यकारी अधिकारी' (SEM) कहा जाना चाहिए, ताकि आम लोग भ्रमित न हों। इसके अलावा, मध्य प्रदेश हाईकोर्ट द्वारा 'नर्मदा बचाओ आंदोलन' के दौरान मेधा पाटकर और अन्य प्रदर्शनकारियों की गिरफ्तारी को भी अनुचित ठहराते हुए मुआवजे का निर्देश दिया जा चुका है।