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इंसानों की मौजूदगी से बदल रहा है वन्यजीवों का व्यवहार, 4,500 से अधिक जानवरों पर रिसर्च का खुलासा

Wildlife Study: 4,581 वन्यजीवों के अध्ययन में पता चला कि इंसानों की शारीरिक मौजूदगी भी जानवरों के आवास और आवाजाही को प्रभावित करती है। अध्ययन बताता है कि संरक्षण रणनीतियों में सिर्फ़ सड़क, शहर और भूमि परिवर्तन नहीं, बल्कि मानव गतिविधियों को भी शामिल करना होगा।
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Aug 28, 2026
Wildlife Study News
4,581 वन्यजीवों के अध्ययन में सामने आया कि मानव मौजूदगी भी जानवरों के आवास और आवाजाही को प्रभावित कर सकती है। (फोटो:AI.)

नई रिसर्च में 4,581 स्तनधारियों और पक्षियों के GPS डेटा का विश्लेषण किया गया। वैज्ञानिकों ने पाया कि वन्यजीव केवल शहरों, सड़कों और खेतों जैसे बदले हुए पर्यावासों पर ही प्रतिक्रिया नहीं देते, बल्कि इंसानों की शारीरिक मौजूदगी भी उनके आवागमन और रहने की जगह को प्रभावित करती है। पेश है एक्सक्लूसिव रिपोर्ट:

मनुष्यों की मौजूदगी भी बदलती है वन्यजीवों की दुनिया

हम अक्सर मानते हैं कि जंगल और वन्यजीवों पर इंसानी असर का मतलब सड़क, शहर, खेती या इमारतों जैसे बदलावों से है। लेकिन नए अध्ययन ने इस तस्वीर का एक और महत्वपूर्ण पहलू सामने रखा है। इंसान स्वयं भी वन्यजीवों के लिए एक पर्यावरणीय कारक बन सकते हैं।

कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, सांता बारबरा (UCSB), स्मिथसोनियन के नेशनल ज़ू एंड कंज़र्वेशन बायोलॉजी इंस्टीट्यूट और येल विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने अमेरिका में 37 पशु प्रजातियों के GPS ट्रैकिंग डेटा का विश्लेषण किया। इसे इंसानों की आवाजाही से जुड़े गुमनाम मोबाइल-फोन लोकेशन डेटा के साथ जोड़ा गया। अध्ययन Science जर्नल में प्रकाशित हुआ है।

① रिसर्च : एक नजर

4,581 जानवर

37 प्रजातियां

GPS ट्रैकिंग + मोबाइल लोकेशन डेटा

② मुख्य Findings

57% प्रजातियां
मानव मौजूदगी + भूदृश्य बदलाव से प्रभावित

67% स्तनधारी
मानव मौजूदगी से पर्यावास उपयोग में बदलाव

68% पक्षी
मानव मौजूदगी से पर्यावास/निकेत में बदलाव

③ सबसे अहम संदेश

भेड़िया → अलग प्रतिक्रिया

सफेद-पूंछ वाला हिरण → मानव मौजूदगी बढ़ी, क्षेत्र घटा

सैंडहिल क्रेन → विपरीत पैटर्न

निष्कर्ष: हर प्रजाति के लिए अलग संरक्षण रणनीति जरूरी

4,581 जानवरों पर हुई रिसर्च

शोधकर्ताओं ने 2019 और 2020 की समान अवधियों के दौरान महाद्वीपीय अमेरिका में 4,581 अलग-अलग स्तनधारियों और पक्षियों के साप्ताहिक GPS रिकॉर्ड देखे।

कोविड-19 महामारी के दौरान लॉकडाउन के कारण लोगों की आवाजाही में अचानक बड़ा बदलाव आया। वैज्ञानिकों के लिए यह एक तरह का प्राकृतिक प्रयोग बन गया। इससे उन्हें यह समझने का अवसर मिला कि जब किसी क्षेत्र में इंसानों की मौजूदगी अचानक घटती या बदलती है, तो वन्यजीवों का व्यवहार किस तरह बदलता है। इस अवधि को वैज्ञानिक शोध में अक्सर “एंथ्रोपॉज़” (Anthropause) कहा गया है।

पहली बार मानव मौजूदगी को सीधे मापने की कोशिश

वन्यजीवों की गतिविधियों का GPS डेटा मिलना संभव है, लेकिन किसी क्षेत्र में वास्तव में कितने लोग मौजूद थे, इसका सटीक डेटा हासिल करना कठिन होता है।

अब तक कई अध्ययनों में शहरीकरण, कृषि भूमि, सड़कें या लॉकडाउन जैसे अप्रत्यक्ष संकेतकों के आधार पर मानव प्रभाव का अनुमान लगाया जाता था।

इस अध्ययन में शोधकर्ताओं ने गुमनाम सेलफोन जियोलोकेशन डेटा का इस्तेमाल किया। इससे लोगों की वास्तविक आवाजाही और वन्यजीवों की गतिविधियों के बीच संबंध को अधिक सीधे तरीके से समझने में मदद मिली।

शोधकर्ताओं के मुताबिक, इस तरह के डेटा का इस्तेमाल कर मानव मौजूदगी और वन्यजीवों की गतिविधियों के संबंध का अध्ययन करना संरक्षण विज्ञान के लिए महत्वपूर्ण कदम है।

57% प्रजातियों पर दिखा दोनों तरह का असर

अध्ययन में पाया गया कि 57% अध्ययन की गई प्रजातियां मानव मौजूदगी और भूदृश्य में हुए बदलाव—दोनों से प्रभावित थीं।

स्तनधारियों में करीब 67% और पक्षियों में करीब 68% मामलों में मानव मौजूदगी उनके इस्तेमाल किए जाने वाले क्षेत्र या पर्यावासीय निकेत (ecological niche) में बदलाव से जुड़ी थी।

शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि कई प्रजातियों ने मानव मौजूदगी और भूदृश्य परिवर्तन के संयुक्त प्रभाव के कारण अपने इस्तेमाल किए जाने वाले आवास का क्षेत्र घटाया।

यह असर अपेक्षाकृत कम विकसित इलाकों, जैसे राष्ट्रीय उद्यानों, में अधिक स्पष्ट दिखाई दिया। इसका एक संभावित कारण यह है कि ऐसे स्थानों में वन्यजीवों की इंसानों से दूरी और प्राकृतिक व्यवहार अपेक्षाकृत अधिक बना रहता है।

भेड़िये, हिरण और सारस की प्रतिक्रिया अलग

हर प्रजाति ने इंसानों की मौजूदगी पर एक जैसी प्रतिक्रिया नहीं दी।

भेड़ियों का व्यवहार कई अन्य जानवरों से अलग पाया गया। मानव मौजूदगी के प्रति उनकी प्रतिक्रिया में उनके आवास उपयोग में बढ़ोतरी देखी गई। शोधकर्ताओं का मानना है कि इसका संबंध मनुष्यों के साथ उनके लंबे इतिहास और मानव गतिविधियों से बचने की उनकी प्रवृत्ति से हो सकता है।

सफेद-पूंछ वाले हिरणों ने अलग पैटर्न दिखाया। भूदृश्य में बदलाव बढ़ने पर उनके पर्यावासीय क्षेत्र का विस्तार हुआ, लेकिन मानव मौजूदगी बढ़ने के साथ यह क्षेत्र सिकुड़ गया।

सैंडहिल क्रेन ने इसके उलट प्रतिक्रिया दिखाई

यही अंतर संरक्षण वैज्ञानिकों के लिए महत्वपूर्ण है। इसका मतलब है कि सभी प्रजातियों के लिए मानव गतिविधियों को कम करने का एक ही तरीका प्रभावी नहीं हो सकता।

संरक्षण नीति में बदलाव की जरूरत

UCSB की सह-प्रमुख लेखिका और पर्यावरण विज्ञान एवं प्रबंधन की सहायक प्रोफेसर रूथ ओलिवर के अनुसार, वन्यजीवों पर इंसानों का प्रभाव केवल पर्यावास बदलने तक सीमित नहीं है। इंसानों की प्रत्यक्ष मौजूदगी भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

अध्ययन का संदेश साफ़ है—यदि किसी प्रजाति के संरक्षण की योजना बनानी है, तो सिर्फ़ यह देखना पर्याप्त नहीं कि जंगल कितना बचा है या सड़कें कितनी बनी हैं। यह भी समझना होगा कि लोग उस क्षेत्र में कब, कहां और कितनी संख्या में मौजूद रहते हैं।

इससे वन्यजीवों के लिए संवेदनशील क्षेत्रों में पर्यटन, मनोरंजन, सड़क यातायात और दूसरी मानवीय गतिविधियों के समय और स्थान को बेहतर तरीके से तय किया जा सकता है।

क्या यह बदलाव जानवरों के लिए अच्छा है या नुकसानदेह?

शोध में जानवरों के व्यवहार और पर्यावास उपयोग में बदलाव तो स्पष्ट हुआ, लेकिन वैज्ञानिक अभी यह नहीं कह सकते कि ये बदलाव उनके लिए फायदेमंद हैं या नुकसानदेह।

किसी जानवर का इंसानों से दूर चले जाना तत्काल तौर पर उसे सुरक्षित लग सकता है, लेकिन अगर इसके कारण उसे भोजन, पानी या प्रजनन के लिए बेहतर स्थान छोड़ना पड़े, तो लंबे समय में इसका नुकसान हो सकता है।

इसीलिए शोधकर्ताओं का अगला सवाल है कि मानव दबाव के कारण अपना व्यवहार बदलने वाले जानवरों के जीवित रहने की संभावना बढ़ती है या घटती है।

GPS और मोबाइल डेटा से मिलेगी नई दिशा

यह अध्ययन कोविड-19 बायो-लॉगिंग इनिशिएटिव का हिस्सा है। इस अंतरराष्ट्रीय सहयोग में करीब 600 साझेदार शामिल रहे और लगभग 13,000 जानवरों से करीब 1 अरब लोकेशन रिकॉर्ड एकत्र किए गए।

GPS से मिले वन्यजीव डेटा और इंसानों की आवाजाही से जुड़े डेटा को साथ देखने से वैज्ञानिक मानव निर्मित ढांचे के प्रभाव और केवल इंसानों की मौजूदगी के प्रभाव में अंतर कर सकते हैं।

भविष्य में यह जानकारी वन्यजीव गलियारों, राष्ट्रीय उद्यानों, पर्यटन क्षेत्रों और मानव-वन्यजीव सह-अस्तित्व की योजनाओं को अधिक सटीक बनाने में मदद कर सकती है।

वन्यजीवों पर हमारी मौजूदगी से भी होता है असर

बहरहाल,यह अध्ययन एक अहम बात सामने रखता है-वन्यजीवों पर इंसानी असर सिर्फ़ हमारी बनाई हुई चीज़ों से नहीं होता, हमारी मौजूदगी से भी होता है। इसलिए संरक्षण की अगली पीढ़ी की रणनीतियों में यह तय करना उतना ही महत्वपूर्ण हो सकता है कि जानवरों को कहां जगह दी जाए, जितना यह कि इंसानों को वहां कब और कितनी देर मौजूद रहना चाहिए।

Updated on:
28 Aug 2026 12:43 pm
Published on:
28 Aug 2026 12:20 pm