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विदेश में पढ़ने वाले भारतीय छात्र, क्या बदल रहा है ट्रेंड और भारत के लिए इसका क्या मतलब है?

Indian Students Studying Abroad : विदेश में पढ़ने वाले भारतीय छात्रों के आंकड़ों में बदलाव, नए पसंदीदा गंतव्यों की तलाश और भारत के शिक्षा परिदृश्य पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा? पढ़ें विस्तृत रिपोर्ट।
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Indian Students Studying Abroad

Indian Students Studying Abroad : विदेश में पढ़ने वाले छात्रों की क्यों घट रही संख्या, PC- Chatgpt

विदेश में उच्च शिक्षा हासिल करने का सपना लंबे समय से भारतीय छात्रों को आकर्षित करता रहा है। लेकिन हाल के आंकड़े एक दिलचस्प बदलाव की ओर इशारा कर रहे हैं। विदेश जाने वाले भारतीय छात्रों की संख्या में जहां पिछले कुछ वर्षों में तेज वृद्धि देखी गई थी, वहीं अब इस रफ्तार में कुछ कमी दिखाई दे रही है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या यह केवल अस्थायी गिरावट है या भारतीय शिक्षा परिदृश्य में किसी बड़े बदलाव का संकेत?

विदेश जाने वाले भारतीय छात्रों की संख्या में आई नरमी

हालिया सरकारी और शोध रिपोर्टों के अनुसार, वर्ष 2024 में विदेश में पढ़ रहे भारतीय छात्रों की संख्या लगभग 13.35 लाख थी। वहीं 2025 की शुरुआत तक यह संख्या करीब 12.5 लाख रही, जो पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 5.7 प्रतिशत कम है।

इसी तरह, वर्ष 2025 में विदेश जाने वाले भारतीय छात्रों की संख्या घटकर 6,19,264 रह गई, जबकि 2024 में यह 7,60,060 थी। लगातार दूसरे वर्ष दर्ज हुई यह गिरावट बताती है कि विदेश में शिक्षा की मांग पूरी तरह कम नहीं हुई है, लेकिन उसकी गति जरूर धीमी पड़ी है।

बदल रहे हैं पसंदीदा गंतव्य

कनाडा, अमेरिका, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया लंबे समय से भारतीय छात्रों के प्रमुख गंतव्य रहे हैं। 2023–24 के दौरान इन चार देशों में लगभग 8.5 लाख भारतीय छात्र अध्ययनरत थे, जिन्होंने शिक्षा और जीवन-यापन पर अरबों डॉलर खर्च किए।

हालांकि अब तस्वीर बदल रही है। जर्मनी, फ्रांस और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) जैसे देशों की लोकप्रियता तेजी से बढ़ रही है। जर्मनी में भारतीय छात्रों की संख्या 2016 के लगभग 10,820 से बढ़कर 2024 में 42,997 तक पहुंच गई। वहीं ब्रिटेन में यह संख्या 16,559 से बढ़कर करीब 1.85 लाख हो गई।

यह बदलाव बताता है कि भारतीय छात्र अब केवल पारंपरिक गंतव्यों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि बेहतर लागत, रोजगार अवसरों और वीजा नीतियों के आधार पर नए विकल्प तलाश रहे हैं।

क्या यह ब्रेन ड्रेन है या नया अवसर?

विदेश में पढ़ाई को अक्सर "ब्रेन ड्रेन" से जोड़कर देखा जाता है, क्योंकि इससे प्रतिभा और विदेशी मुद्रा दोनों का प्रवाह देश से बाहर होता है। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के आंकड़ों के अनुसार, शिक्षा संबंधी विदेश यात्रा पर होने वाला भुगतान 2015 के 2.46 अरब डॉलर से बढ़कर 2024 में 6.3 अरब डॉलर तक पहुंच गया।

हालांकि विशेषज्ञ अब इसे केवल ब्रेन ड्रेन के नजरिए से नहीं देखते। कई विश्लेषक इसे "ब्रेन सर्कुलेशन" का दौर मानते हैं, जहां विदेश में शिक्षित छात्र वैश्विक नेटवर्क, निवेश, शोध सहयोग और कौशल के माध्यम से भारत को भी लाभ पहुंचा सकते हैं।

क्या भारत अवसर को पहचान रहा है?

नीति आयोग के अनुसार, भारत के केवल लगभग 3 प्रतिशत छात्र ही विदेश में पढ़ाई के लिए जाते हैं, जबकि 97 प्रतिशत छात्र देश में ही शिक्षा प्राप्त करते हैं। इसलिए भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती और अवसर दोनों घरेलू उच्च शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करना है।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 ने शिक्षा के अंतरराष्ट्रीयकरण पर विशेष जोर दिया है। इसी दिशा में भारत विदेशी छात्रों को आकर्षित करने और वैश्विक स्तर की शिक्षा सुविधाएं विकसित करने का प्रयास कर रहा है।

नीति आयोग ने 2030, 2035 और 2047 तक भारत में विदेशी छात्रों की संख्या बढ़ाने के महत्व पर भी बल दिया है, ताकि देश एक प्रमुख वैश्विक शिक्षा केंद्र के रूप में उभर सके।

विदेशी विश्वविद्यालयों की बढ़ती दिलचस्पी

भारत में विदेशी विश्वविद्यालयों की मौजूदगी धीरे-धीरे बढ़ रही है। कई अंतरराष्ट्रीय संस्थानों ने भारतीय शहरों में कैंपस स्थापित करने में रुचि दिखाई है। यदि ये योजनाएं सफल होती हैं, तो भारतीय छात्रों को अंतरराष्ट्रीय डिग्री और वैश्विक शिक्षण अनुभव देश में ही उपलब्ध हो सकता है।

इससे एक ओर छात्रों का विदेश जाने का दबाव कम हो सकता है, वहीं दूसरी ओर भारत विदेशी छात्रों को आकर्षित करने में भी सक्षम हो सकता है।

छात्रों और अभिभावकों के लिए क्या संकेत हैं?

विदेश में पढ़ाई आज भी एक महत्वपूर्ण विकल्प है, लेकिन निर्णय लेते समय केवल देश की लोकप्रियता नहीं, बल्कि कुल लागत, वीजा नियम, रोजगार अवसर और शिक्षा की गुणवत्ता जैसे पहलुओं पर भी ध्यान देना जरूरी है।

साथ ही, भारत में उभरते अंतरराष्ट्रीय कैंपस, शोध अवसर और वैश्विक साझेदारियां उन छात्रों के लिए नए विकल्प तैयार कर रही हैं, जो विश्वस्तरीय शिक्षा चाहते हैं लेकिन विदेश जाना आवश्यक नहीं मानते।

क्यों आ रही गिरावट

विदेश में पढ़ने वाले भारतीय छात्रों की संख्या में हालिया गिरावट को केवल नकारात्मक संकेत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यह वैश्विक शिक्षा बाजार में बदलती प्राथमिकताओं, सख्त वीजा नीतियों और भारत में उभरते नए अवसरों का संयुक्त परिणाम भी हो सकता है।

भारत के सामने चुनौती यह है कि वह अपनी उच्च शिक्षा प्रणाली को इतना मजबूत बनाए कि प्रतिभा को बेहतर अवसर देश के भीतर ही मिल सकें। यदि ऐसा होता है, तो भारत केवल छात्रों को विदेश भेजने वाला देश नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक शिक्षा के प्रमुख केंद्रों में भी अपनी जगह बना सकता है।