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कॉर्पोरेट जवाबदेही के लिए कोर्ट का कड़ा संदेश

सर्वोच्च अदालत ने बैंक को वार्षिक ब्याज के भुगतान को भी बॉन्ड के मूल दस्तावेजों में निर्धारित शर्तों के अनुसार जारी रखने की बात कही।
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Updated: 23 Oct 2026, 6:20 PM IST
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सर्वोच्च न्यायालय का यस बैंक के संबंध में बीते दिनों दिया गया निर्णय भविष्य में भारत में निवेशकों के हितों को सर्वोपरि रखेगा और व्यवसाय में लेखांकन व्यवहारों में उनके हितों पर मनमर्जी से किए गए कुठाराघात पर एक निर्णायक दिशा-निर्देश के रूप में समझा जाएगा। 8,415 करोड़ रुपए के एटी-1 बॉन्ड विवाद में सर्वोच्च न्यायालय का 15 अक्टूबर, 2026 का फैसला बैंकिंग व्यवस्था में कानून के शासन और निवेशकों के अधिकारों के लिए महत्वपूर्ण पुष्टि है। शीर्ष अदालत ने मुंबई उच्च न्यायालय के उस निर्णय को बरकरार रखा, जिसने मार्च, 2023 में इन बॉन्ड को राइट-ऑफ करने की कार्यवाही निरस्त कर दी थी। इस फैसले ने न केवल बैंक की कार्यवाही की वैधानिकता पर सवाल उठाया, बल्कि यह भी रेखांकित किया कि वित्तीय संकट के समय नुकसान का बोझ निवेशकों पर डालने से पहले कानून और नियामकीय नियमों का पालना अनिवार्य है। इस निर्णय ने ये स्पष्ट कर दिया कि यस बैंक ने बहुत बड़े स्तर पर वित्तीय गलतियां कीं और उनके संबंध में बैंक का लेखांकन व्यवहार बहुत अनियमित पाया गया जो कि कॉर्पोरेट गवर्नेंस का उल्लंघन भी है।

बैंक ने दिसंबर, 2016 में 3,000 करोड़ रुपए और अक्टूबर 2017 में 5,415 करोड़ रुपए के बॉन्ड जारी किए थे। जब 2020 में पुनर्गठन की शुरुआत हुई तो बैंक ने फिर एकाउंटिंग में मनमर्जी करते हुए मार्च, 2020 में एटी-1 बॉन्ड की पूरी 8,415 करोड़ रुपए की राशि बट्टे खाते में स्थानांतरण करके उसे समाप्त कर दिया। ये लेखांकन व्यवहार अवैधानिक था और इसीलिए 13 मार्च, 2020 को केंद्र सरकार द्वारा बैंक की पुनर्गठन की अधिसूचित अंतिम योजना में एटी-1 बॉन्ड राइट-ऑफ के प्रावधान को शामिल नहीं किया था। बावजूद इसके बैंक ने इसे बट्टे खाते में डालकर समाप्त कर दिया। इसी के चलते मुंबई उच्च न्यायालय ने वर्ष 2023 में बैंक के इस निर्णय को स्थगित कर दिया था और अब उच्चतम न्यायालय ने भी अपने हाल के फैसले में इसी बात की पुष्टि की है।

ज्ञात रहे कि एटी-1 बॉन्ड सामान्य बैंक जमा नहीं होते हैं । इनमें निर्धारित परिस्थितियों में निवेशकों की पूरी पूंजी समाप्त होने का जोखिम होता है। इस संबंध में उच्चतम न्यायालय ने अपना निर्णय बहुत स्पष्ट कर दिया कि जोखिमपूर्ण निवेश होने का अर्थ यह नहीं है कि बैंक या उसका प्रशासक मनमर्जी से जोखिम को नियंत्रित करे और घाटा जबरदस्ती निवेशकों पर डाल दे। इसलिए इस विवाद में यस बैंक को ऐसा करने का वैधानिक अधिकार नहीं था। सर्वोच्च अदालत ने बैंक को वार्षिक ब्याज के भुगतान को भी बॉन्ड के मूल दस्तावेजों में निर्धारित शर्तों के अनुसार जारी रखने की बात कही। हालांकि, भुगतान की वास्तविक समयसीमा और प्रक्रिया अभी स्पष्ट नहीं है। लेकिन यह निर्णय निवेशकों को राहत देने के मामले में ऐसे सिद्धांत स्थापित करता है जिसमें किसी भी वित्तीय संकट के दशा में कानून की अनदेखी का औचित्य नहीं बन सकता।

यस बैंक का मामला व्यापक कॉर्पोरेट सुशासन की समस्या की ओर भी ध्यान खींचता है। इससे पहले भी हमारे देश में सत्यम कंप्यूटर का लेखांकन घोटाला, किंगफिशर एयरलाइंस के बैंक ऋणों का संकट, अनिल अंबानी समूह की कंपनियों की वित्तीय परेशानियां और भूषण स्टील के बड़े कर्जों के चलते आईडीबीआई के दिवालिया कगार पर पहुंचना जैसी अलग-अलग परिस्थितियां सामने आईं। इन मामलों के कानूनी परिणाम एक जैसे नहीं थे, लेकिन इनसे एक साझा सबक मिलता है कि कारोबार का बड़ा आकार और तेज वृद्धि जिम्मेदार प्रबंधन की गारंटी नहीं हैं। जब जोखिम प्रबंधन कमजोर पड़ता है और जवाबदेही समय पर तय नहीं होती तो उसकी कीमत निवेशकों, बैंकों और व्यापक अर्थव्यवस्था को चुकानी पड़ती है। यस बैंक प्रकरण का निष्कर्ष स्पष्ट है कि बैंक की गलतियों की जवाबदेही तय करना और निवेशकों के अधिकारों की रक्षा करना, दोनों अनिवार्य हैं। मजबूत बैंकिंग व्यवस्था के लिए जिम्मेदार प्रबंधन, प्रभावी नियामकीय निगरानी और कानून का समान अनुपालन सुनिश्चित करना होगा। यस बैंक का वित्तीय संकट अचानक पैदा नहीं हुआ था। वर्ष 2014 में बैंक के ऋण और अग्रिम लगभग 55,633 करोड़ रुपए थे, जो मात्र पांच वर्षों में बढ़कर वर्ष 2019 तक लगभग 2.42 लाख करोड़ रुपए हो गए। इसके अलावा 31 मार्च, 2019 को बैंक ने अपने सकल गैर-निष्पादित कर्ज/एनपीए 7,883 करोड़ रुपए का बताया था, जबकि आरबीआई के तब के आकलन में एनपीए की राशि लगभग 11,160 करोड़ रुपए थी। अर्थात 3,277 करोड़ रुपए का अंतर बैंक के वित्तीय विवरणों में पाया गया था जो कि बैंक द्वारा मनमर्जी से की गई एकाउंटिंग के कारण था और जिससे बैंक के वित्तीय विवरणों की विश्वसनीयता पर तब सवाल उठा था। इस कारण एक वर्ष बाद मार्च, 2020 तक बैंक आवश्यक पूंजी जुटाने में विफल रहा। परिणामस्वरूप बैंक पर जमा राशि के भुगतान का दबाव बढ़ा और उसके पुनर्गठन की नौबत आ गई।

भारतीय कॉर्पोरेट जगत की विश्वसनीयता केवल कंपनियों के आकार, मुनाफे या बाजार मूल्य से नहीं, बल्कि उनके व्यावसायिक आचरण और जवाबदेही से भी तय होती है। जब किसी बड़ी कंपनी के वित्तीय विवरणों की विश्वसनीयता पर सवाल उठते हैं अथवा संकट के समय नुकसान का बोझ निवेशकों पर डाल दिया जाता है, तो प्रभावित केवल कुछ निवेशक नहीं होते, बल्कि पूरे बाजार में भरोसा कमजोर पड़ता है। इसका असर भविष्य में कंपनियों की पूंजी जुटाने की क्षमता और देश के निवेश वातावरण पर भी पड़ सकता है। छोटे निवेशकों के लिए यह चुनौती और गंभीर है, क्योंकि उनके पास बड़े संस्थागत निवेशकों जैसे संसाधन और कानूनी क्षमता प्राय: नहीं होती। ऐसे में न्यायपालिका की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। वह यह सुनिश्चित करती है कि आर्थिक संकट किसी संस्था को कानून और निर्धारित नियमों की अनदेखी करने का अधिकार न दे। सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय इसी सिद्धांत को मजबूत करता है कि निवेश में जोखिम स्वीकार करना और किसी संस्था की मनमानी स्वीकार करना दो अलग बातें हैं। हालांकि, न्यायिक संरक्षण तभी वास्तविक राहत में बदलेगा, जब निवेशकों को उनकी वैधानिक देनदारियों का भुगतान समय पर मिले। अंतत: भारत के कॉर्पोरेट क्षेत्र की साख इस बात से बनेगी कि कंपनियां अपने निवेशकों के साथ कितनी पारदर्शिता और निष्पक्षता से व्यवहार करती हैं, नियामक कितनी प्रभावी निगरानी करते हैं और कानून का उल्लंघन होने पर जवाबदेही कितनी दृढ़ता से तय होती है।

डॉ. पी.एस. वोहरा,(आर्थिक मामलों के जानकार)

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23 Oct 2026, 6:20 PM IST
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