केंद्र सरकार के अनुसार, 2024-25 में खाद्य सुरक्षा और मिलावट से जुड़ी 7700 से अधिक शिकायतें दर्ज हुईं। 2022-23 में यह संख्या लगभग 4330 थी, जो अगले वर्ष बढक़र 4735 तक पहुंच गई। शिकायतों में वृद्धि को केवल जागरूकता का परिणाम मान लेना पर्याप्त नहीं होगा। बाजार में नकली और मिलावटी खाद्य पदार्थों का कारोबार नए रूपों में फैल रहा है। सबसे अधिक चिंता दूध और दुग्ध उत्पादों को लेकर सामने आती है।
बलवंत राज मेहता, वरिष्ठ पत्रकार
देश में खाद्य पदार्थों में मिलावट का सवाल अब केवल उपभोक्ता अधिकार या बाजार नियंत्रण का मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि यह सार्वजनिक स्वास्थ्य और सामाजिक नैतिकता से जुड़ा राष्ट्रीय संकट बनता जा रहा है। केंद्र और राज्य सरकारें लगातार जीरो टॉलरेंस की बात कर रही हैं। त्योहारों पर विशेष अभियान चलाए जा रहे हैं। दूध, मावा, तेल, मसाले और मिठाइयों के नमूने लिए जा रहे हैं, लेकिन इसके बावजूद मिलावट का जाल टूटता दिखाई नहीं देता। मिलावटखोरों की सक्रियता यह संकेत देती है कि कानून का डर अभी भी उतना प्रभावी नहीं बन पाया है, जितना होना चाहिए। पिछले कुछ वर्षों के आंकड़े इस चिंता को और गहरा करते हैं।
7700 से अधिक शिकायतें दर्ज हुईं
केंद्र सरकार के अनुसार, 2024-25 में खाद्य सुरक्षा और मिलावट से जुड़ी 7700 से अधिक शिकायतें दर्ज हुईं। 2022-23 में यह संख्या लगभग 4330 थी, जो अगले वर्ष बढक़र 4735 तक पहुंच गई। शिकायतों में वृद्धि को केवल जागरूकता का परिणाम मान लेना पर्याप्त नहीं होगा। बाजार में नकली और मिलावटी खाद्य पदार्थों का कारोबार नए रूपों में फैल रहा है। सबसे अधिक चिंता दूध और दुग्ध उत्पादों को लेकर सामने आती है। उत्तर भारत के कई राज्यों में दूध, मावा, घी और पनीर के नमूनों में भारी गड़बडिय़ां मिली हैं। दूसरी ओर, केरल और तमिलनाडु जैसे राज्यों में शिकायतें अपेक्षाकृत कम हैं। वहां स्थानीय निगरानी व्यवस्था, सहकारी मॉडल और उपभोक्ता जागरूकता बेहतर मानी जाती है। यह अंतर बताता है कि केवल कानून बनाना पर्याप्त नहीं, बल्कि उसकी स्थानीय और सामाजिक स्तर पर प्रभावी क्रियान्विति भी जरूरी है। राजस्थान ने हाल के वर्षों में ‘शुद्ध आहार-मिलावट पर वार’ जैसे अभियान चलाकर इस दिशा में सक्रिय पहल की है। कई जिलों में मावा, मसाले और तेल के नमूने फेल पाए गए। सैकड़ों मामलों में दोष सिद्ध होना यह दर्शाता है कि मिलावट का नेटवर्क कितना गहरा और संगठित है। कुछ राज्यों के प्रयोग उम्मीद भी जगाते हैं।
इन उदाहरणों से समझें- बदलाव संभव है
गुजरात का ‘फूड सेफ्टी ऑन व्हील्स’ मॉडल उल्लेेखनीय माना जा रहा है। मोबाइल प्रयोगशालाओं के जरिए गांवों और कस्बों में मौके पर जांच की व्यवस्था ने निगरानी को अधिक प्रभावी बनाया। केरल ने होटल और खाद्य प्रतिष्ठानों की डिजिटल रेटिंग प्रणाली शुरू कर उपभोक्ताओं को स्वच्छता और गुणवत्ता की जानकारी देना शुरू किया। तमिलनाडु ने स्कूलों में फूड सेफ्टी क्लब बनाकर बच्चों को जागरूक करने का प्रयास किया। ये उदाहरण बताते हैं कि यदि प्रशासनिक इच्छाशक्ति और सामाजिक भागीदारी साथ हो, तो बदलाव संभव है। लेकिन मूल प्रश्न बना हुआ है कि आखिर मिलावटखोरी रुक क्यों नहीं रही? इसका पहला कारण है तेजी से बढ़ता उपभोक्तावाद और आसान मुनाफे की मानसिकता। कम लागत में अधिक कमाई की लालसा समाज के एक हिस्से को अपराध की ओर धकेल रही है। दूसरा कारण निगरानी तंत्र की सीमाएं हैं। देश में खाद्य कारोबार करने वाली इकाइयों की संख्या लाखों में है, लेकिन निरीक्षकों और प्रयोगशालाओं की संख्या सीमित है। तीसरी और सबसे गंभीर समस्या उपभोक्ता स्तर पर है। लोग सस्ते सामान के आकर्षण में बिना गुणवत्ता जांच वाले खाद्य पदार्थ खरीद लेते हैं। जब तक उपभोक्ता स्वयं सजग नहीं होंगे, तब तक सरकारी अभियान अकेले निर्णायक परिणाम नहीं दे पाएंगे।
दोषियों के लाइसेंस स्थायी रूप से रद्द किए जाएं
इस समस्या का स्थायी समाधान व्यापक सामाजिक परिवर्तन में छिपा है। हर जिले में आधुनिक खाद्य परीक्षण प्रयोगशालाओं की स्थापना हो। मोबाइल टेस्टिंग वैन को गांवों तक पहुंचाया जाए। शिक्षण संस्थानों में बच्चों को मिलावट पहचानने के सरल तरीके सिखाना आने वाली पीढ़ी को सुरक्षित बनाने की दिशा में बड़ा कदम हो सकता है। साथ ही, दोषी कारोबारियों के उजागर करने की नीति लागू होनी चाहिए। दोषियों के लाइसेंस स्थायी रूप से रद्द किए जाएं। खाद्य उत्पादों की डिजिटल ट्रैकिंग और क्यूआर आधारित पारदर्शी आपूर्ति प्रणाली आवश्यकता बन चुकी है। दरअसल, मिलावट केवल कानून का उल्लंंघन नहीं, बल्कि समाज के विश्वास और स्वास्थ्य पर हमला है। जिस देश की संस्कृति अन्न को ब्रह्म मानती हो, वहां भोजन सामग्री में मिलावट करना केवल अपराध नहीं, बल्कि नैतिक पतन का संकेत भी है। इसलिए सरकार, बाजार और समाज, तीनों को मिलकर यह सुनिश्चित करना होगा कि मिलावट लाभ का नहीं, बल्कि कठोर दंड और सामाजिक शर्म का कारण बने। तभी जीरो टॉलरेंस का नारा वास्तविक अर्थों में सफल माना जाएगा।